ऐतिहासिक है पिल्लला मर्री बरगद का पेड़

महबूबनगर, महबूबनगर शहर से स़िर्फ 4 किलोमीटर पश्चिम में स्थित पिल्लला मर्रा , जिसका शाब्दिक अर्थ है बच्चों का बरगद, भारत के सबसे बड़े, सबसे पुराने और सबसे फैले हुए बरगद के पेड़ों में से पिल्ललामर्री बरगद वृक्ष एक है। 13वीं शताब्दी की शुरुआत में लगाए गए इस पेड़ ने 700 से ज़्यादा सालों का इतिहास देखा है और अपनी विशाल छतरी और हवा में झूलती जड़ों से आगंतुकों को आकर्षित करता है।

आज पिल्ललामर्री का लगभग 4 एकड़ में फैला हुआ है, जिसका पूर्व-पश्चिम छोर लगभग 405 फ़ीट और उत्तर-दक्षिण छोर लगभग 408 फ़ीट है। पेड़ की कुल परिधि 1,263 फ़ीट है, जो इसे एशिया के सबसे बड़े बरगद के पेड़ों में से एक बनाती है। शुरू में इस पेड़ में एक केंद्रीय तना था जिसके चारों ओर अनगिनत हवा में झूलती जड़ें होती थीं।

संरक्षण के लिए पिल्ललामर्री की चुनौतियाँ और प्रयास

वर्षों गुजरने के बाद ये जड़ें मिट्टी में गहराई तक बढ़ती गईं, मोटी होती गईं और अपने स्वयं के तने में विकसित कर लिया, जिससे परस्पर जुड़े हुए तनों का एक जटिल जाल बन गया। इस वृक्ष के भीतर दो सूफी संतों जमाल हुसैन और कमाल हुसैन की कब्रें हैं। सात शताब्दियों से अधिक समय से अपने आपको विस्तार दे रहे पिल्ललामर्रा बरगद का पेड़ अब प्राकृतिक और मानव संबंधित कारकों के कारण गंभीर पारिस्थितिकी तनाव में है।

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पेड़ को कई खतरों का सामना करना पड़ता है, जिसमें दीमक का संक्रमण, पानी की कमी, भारी शाखाओं के कारण वजन और प्राकृतिक उम्र बढ़ना शामिल है। तेलंगाना सरकार ने कई संरक्षण पहलें की हैं, जिसमें पर्यावरण के अनुकूल कीटनाशकों के साथ दीमक के संक्रमण का उपचार करना, जड़ों में वायु संचार को बेहतर बनाने के लिए मिट्टी की खुदाई करना, शाखाओं को गिरने से रोकने के लिए धातु और कंक्रीट के सहारे लगाना, और पेड़ के स्वास्थ्य की निरंतर निगरानी करना शामिल है।

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