जीवित रहते जीवन-मुक्ति की युक्ति

शैशवावस्था, बालावस्था तथा किशोरावस्था में हमारे मन में कभी मुक्ति का भाव नहीं आता है, क्योंकि इन अवस्थाओं तक हमारा देह-भाव बहुत दृढ़ नहीं होता है। आयु बढ़ाने के साथ-साथ सांसारिक जिम्मेदारियों को हम स्वयं ओढ़ लेते हैं और अपने ही बंधन में फंसते चले जाते हैं, क्योंकि हम इस सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाते कि इस सृष्टि में सब कुछ एकमात्र परम चेतना के द्वारा ही किया जा रहा है। शेष तो सब माध्यम हैं, जिसमें हम भी शामिल हैं।

शरीर-भाव से मुक्त होकर ब्रह्म-भाव में स्थित होना ही जीवन-मुक्ति है और सच्चे साधक का लक्ष्य यही होता है। इसके लिए मुख्य चार मार्ग बताए गए हैं- कर्म योग, भक्ति योग, ध्यान योग और ज्ञान योग। इनमें से मनुष्य कोई भी एक मार्ग या एक से ज्यादा मार्ग या तो एक साथ चारों मार्गों का अनुसरण करके जीवन-मुक्ति को प्राप्त कर सकता है। किसी एक मार्ग का अनुसरण करने वालों को बाकी के मार्गों में अश्रद्धा नहीं होनी चाहिए और दूसरे मार्गों का अनुसरण करने वालों के प्रति हीन भावना भी नहीं होनी चाहिए।

श्रद्धा और स्वभाव के अनुसार साधना का मार्ग चयन

हर मनुष्य अपने स्वभाव, संस्कार और श्रद्धा के अनुसार मार्ग चुनता है। उसे जिस मार्ग में अच्छा लगता है, उसके लिए मुक्ति का द्वार वही मार्ग खोल सकता है। एक मार्ग का अनुसरण करते हुए यदि आपकी श्रद्धा दूसरे मार्ग में भी हो जाए तो उस मार्ग का भी साथ में अनुसरण करना चाहिए। इस प्रकार दो-तीन मार्गों को साथ लेकर चलने से साधना की गति में तीव्रता आती है। चारों योग मार्गों का एक साथ अनुसरण करने वाले को मोक्ष शीघ्र सिद्ध हो जाता है, इसमें कोई शंका नहीं है।

जैसे आजकल के युद्ध में जल, वायु, थल और नौसेना तथा कूटनीति का एक साथ प्रयोग करके दुश्मन पर चारों ओर से आक्रमण करते हैं, उसी तरह मुमुक्षु (मोक्ष की इच्छा रखने वाला) को भी हर तरफ से कोशिश करके शीघ्र ही अपनी मंजिल पर पहुंचना चाहिए। ब्रह्म-भाव का अर्थ यह नहीं है कि केवल हम अपने स्वयं के शरीर को शरीर न समझ कर ब्रह्म समझें, अपितु जहां-जहां हमारी दृष्टि जाती है, जो कुछ हमें सुनाई देता या महसूस होता है, सब कुछ ब्रह्म स्वरूप ही है, यह ज्ञान जीवन में उतरने पर ही ब्रह्म-भाव में स्थित हुआ जा सकता है।

-सद्गुरु रमेश

इस देह का अंत होने पर हम मुक्त नहीं होते हैं, बल्कि जीवित रहते हुए सर्वं ब्रह्मं के भाव में स्थित होते हैं तो मुक्त जीवन जीते हैं और सदा मुक्त ही रहते हैं, क्योंकि मृत्यु के समय हम नहीं मरते हैं, बल्कि पंच भूतों से निर्मित हमारा शरीर मरता है और मुक्त जीवात्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है।

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