संघर्ष-विराम के उचित कारणों को समझने की जरूरत

भारत ने अमेरिका के दबाव में नहीं अपितु अपनी आगामी युद्धक रणनीति को पहले से अधिक सुरक्षित व मारक बनाने की दृष्टि से ही युद्ध में परिवर्तित होते रहे, संघर्ष-विराम की स्वीकृति प्रदान की और साथ ही कठोर शब्दों में स्पष्ट किया है कि भविष्य में पाक प्रायोजित आतंकवाद की किसी भी घटना और हमले को युद्ध ललकार समझा जायेगा और भारत-पाकिस्तान या विश्व समुदाय को कोई भी स्पष्टीकरण दिए बिना उसके विरुद्ध अपना सैन्य प्रतिकार करेगा। इसके अतिरिक्त भारत ने सिंधु जल संधि और अन्य प्रतिबंधों को यथावत रखा है।

ऑपरेशन सिंदूर के भारतीय सैन्य-प्रतिशोध को पाकिस्तान के विरुद्ध घोषित व निर्णायक युद्ध समझ बैठे भारतप्रेमियों को संघर्ष-विराम के समाचार से वैसा ही आघात लगा, जैसा पहलगाम नरसंहार के बाद लगा था। प्रधानमंत्री ने पहलगाम की घटना के बाद बिहार की जनसभा में जो वक्तव्य दिया था, उसके अनुरूप तो भारतीय सेनाओं ने अपना सैन्यकर्म पूरा ही कर दिया था।

यह तो भारतीय मिसाइलों के गिरने के बाद मारे गये आतंकवादियों और उनके ध्वस्ताधूत ठिकानों को देखकर पाकिस्तान की उकसावे वाली सैन्य व आतंकी गतिविधियां थीं, जिनकी प्रतिक्रिया में भारत ने पाक की राजधानी समेत वहां के प्रमुख नगरों पर मिसाइलों से प्रहार किया और उनके सैन्य ठिकानों, परमाणु केंद्रों के सहायक उपामों को ध्वस्त करके उसे त्राहि-त्राहि करने को विवश कर दिया।

दोनों देशों की ओर से वायु मार्गों और स्थलीय क्षेत्रों में जो भी सैन्य संघर्ष हो रहा था वह किसी की भी या दोनों तरफ से घोषित युद्ध के अंतर्गत नहीं हो रहा था। यह अघोषित संघर्ष था। इस संघर्ष में अमेरिका के हस्तक्षेप के बाद आधिकारिक रूप में तो विराम आ चुका है, किंतु धरातल पर अर्थात सीमा-क्षेत्रों पर विराम तत्काल फलीभूत नहीं हुआ है और ना ही ऐसा हो सकता है।

अमेरिका के हस्तक्षेप से और अन्य देशों द्वारा समझाए जाने के बाद ऐसा ही संघर्ष-विराम (सीजफायर) इजरायल-फिलीस्तीन और रूस-यूक्रेन के मध्य भी हुआ था, किंतु हम सभी प्रत्यक्ष देखते आए हैं और हर स्तर पर साक्षी रहे हैं कि उक्त चारों ही देशों की भू व वायु सीमाओं पर सीजफायर का बार-ंबार उल्लंघन हुआ और अब भी हो रहा है।

भारत का IMF के खिलाफ कड़ा विरोध

शासकीय और राजनयिक स्तर पर पारित, स्वीकृत तथा अंगीकृत नीतियां धरातल पर अक्षरश लागू नहीं हो पाती हैं या लागू होती भी हैं तो विलंब से होती हैं अथवा नियमित अंतराल पर होती रहने वाली दोतरफा उकसावे वाली सैन्य गतिविधियों से खंडित भी होती रहती हैं। पाकिस्तान जैसे देश के संदर्भ में ये मान लेना कि वहां के प्रधानमंत्री द्वारा भारत के सैन्य पराम से पस्त होकर झुकना स्वीकार कर लिये जाने तथा अमेरिकी नेतृत्व में पराजय बोध प्रकट कर दिये जाने के बाद, वह किंचित आदर्श स्थिति में आकर अपने सैन्य प्रमुख और सेना की अराजकता पर नियंत्रण कर लेगा, अनुचित आकलन ही होगा।

संघर्ष-विराम केवल अमेरिकी राष्ट्रपति, विदेश मंत्री, उप-राष्ट्रपति और अन्य पदाधिकारियों के कहे अनुसार नहीं हुआ है। ऐसा होने के आसार तब ही हो गये थे, जब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने पाकिस्तान को 13 हजार करोड़ का कर्ज देना स्वीकृत कर दिया था। आईएमएफ का मुख्यालय अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डी.सी. में स्थित है। स्वाभाविक है कि इस प्रतिष्ठान के कार्यकारी निर्णयों पर अमेरिकी नियंत्रण ही अधिक होगा।

भारत ने हालांकि आईएमएफ को पहले ही सावधान कर दिया था कि वह पाकिस्तान को कर्ज न दे। भारत के अनुसार उसे 34 बार पहले भी कर्ज दिया जा चुका है। भारतीय अनुरोध को अस्वीकार कर दिया गया। हालांकि कर्ज देने की औपचारिक प्रािढयाओं में एक प्रक्रिया आईएमएफ के संस्थापक सदस्यों द्वारा कर्ज लेनेवाले देश को कर्ज देने अथवा न देने के संबंध में मतदान के माध्यम से पूरी होती है।

भारत की मजबूत सैन्य रणनीति और वैश्विक स्थिति

भारत ने कठोर रुष्टता प्रदर्शित करते हुए मतदान प्रक्रिया का ही बहिष्कार कर दिया था। इसके बाद भी पाकिस्तान को कर्ज देने के पक्ष में आईएमएफ के अधिसंख्य संस्थापदक सदस्यों ने सहमति प्रदर्शित की।शहबाज शरीफ द्वारा सैन्य संघर्ष में भारत के आगे झुकने का संसदीय वक्तव्य दिये जाने की समयावधि में उन्होंने स्पष्ट किया था कि भारत-पाक सैन्य संघर्ष में पाक के समर्थन में केवल तुर्की ही खड़ा है और अन्य देशों से उसे किसी किस्म का समर्थन नहीं मिला है।

इस वक्तव्य से स्पष्ट हो जाता है कि इस समय विश्व स्तर पर भारत की उपस्थिति शक्तिशाली है। इस आलोक में यह समझना सुगम हो जाता है कि भारत ने अमेरिका के दबाव में नहीं अपितु अपनी आगामी युद्धक रणनीति को पहले से अधिक सुरक्षित व मारक बनाने की दृष्टि से ही युद्ध में परिवर्तित होते रहे, संघर्ष-विराम की स्वीकृति प्रदान की है और साथ ही कठोर शब्दों में स्पष्ट किया है कि भविष्य में पाक प्रायोजित आतंकवाद की किसी भी घटना और हमले को युद्ध ललकार समझा जायेगा और भारत पाकिस्तान या विश्व-समुदाय को कोई भी स्पष्टीकरण दिए बिना उसके विरुद्ध अपना सैन्य प्रतिकार करेगा।

भारत की संघर्ष रणनीति और राष्ट्रभक्ति की भावना

इसके अतिरिक्त भारत ने सिंधु जल संधि और अन्य प्रतिबंधों को यथावत रखा है। संघर्ष-विराम की घोषणा से भारतीयों को इसलिए आघात लगा क्योंकि वे परामी भाव-विचारों से भरकर और अपनी सेनाओं के अदम्य साहस से अभिभूत होकर भारतभक्ति व राष्ट्रभक्ति से प्रेरित इन महत्वाकांक्षाओं से भर उठे थे कि भारतीय सेना पाकिस्तान को बुरी तरह पस्त कर देगी, पीओके वापस ले लेगी, पाकिस्तान के कई विभाजन कर देगी तथा इस उपाय द्वारा भारत के भीतर बैठे और आए दिन विष-वमन करते प्रति पाकिस्तान की भी ढंग से बखिया उधेड़ दी जाएगी। अधिसंख्य भारतीयों की ऐसी महत्वाकांक्षाएं अनुचित तो नहीं हैं।

देश के शासन पर विराजित राजनीतिक दल भी यही चाहता है, किंतु इस दिशा में व्यावहारिक कर्म-कर्तव्य करने से बचता है। यदि भारत की मूल समस्या की ओर निष्पक्ष दृष्टिपात किया जाय तो समाधान के रूप में यही एकमात्र उपाय भी प्रतीत होता है और ऑपरेशन सिंदूर के अंतर्गत पाकिस्तान के साथ हो रहे सैन्य संघर्ष की समयावधि में देशवासियों में अंदर-बाहर की सभी समस्याओं के निस्तारण हेतु प्रबल राष्ट्रभक्ति भी उत्पन्न हो गई थी।

यह भी पढ़ें… पाक मामले पर सत्र बुलाने की माँग करना हास्यास्पद : रामचंदर राव

संघर्ष विराम: भारत की रणनीति और देशवासियों की भावना

केंद्रीय शासन द्वारा सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों को टेरिटोरियल सेना गठित करने के लिए जनता को आमंत्रित करने के निर्देश दिये जाने के बाद अधिसंख्या में युवा और भारतीय जन टेरिटोरियल सेना का सदस्य बनने को सहर्ष तैयार हो गये थे। केंद्रीय शासन के पास देश की अंदर-बाहर की समस्याओं के निस्तारण के लिए यह एक स्वर्णिम अवसर था। ऐसा अवसर बार-बार नहीं आता।

यदि शासन ने राष्ट्रहित में ही संघर्ष विराम के लिए सहमति प्रदान की है, तो ठीक है, किंतु इतना तो है कि अब देशवासियों में देश, सेना और सेनानियों के प्रति वैसा स्वाभाविक वीरभाव, त्यागभाव और सर्वस्व अर्पण का भाव अब आगे सुगमतापूर्वक उत्पन्न नहीं हो सकेगा। यह संघर्ष-विराम देश के हित में है तो ठीक है पर देशवासियों की भावनाएं तो आहत हुई ही है जो पाकिस्तान को किसी भी कीमत पर मटियामेट हुआ देखना चाहते थे।

विकेश कुमार बडोला
-विकेश कुमार बडोला

वैसे देखा जाए तो हमारी सेना ने पाकिस्तान को मिट्टी में मिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और इसी डर ने पाक को अमेरिका के कदमों में गिरने और संघर्ष विराम की भीख मांगने को मजबूर कर दिया। इसीलिए देशवासियों को इस संघर्ष विराम के मायने भी समझने चाहिए और यह भी कि पाक को हमने उचित सबक सिखा ही दिया है।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button