भक्ति से बढ़कर संसार में कोई संपत्ति नहीं : बोधायन महाराजजी
हैदराबाद, जिसके हृदय में भक्ति तथा प्रभु नाम रूपी संपत्ति होती है, वह जगत का सबसे बड़ा धनवान होता है। पैसे से सांसारिक वस्तुएँ तो खरीदी जा सकती हैं, लेकिन अलौकिक चीजों को प्राप्त नहीं किया जा सकता। भक्ति के माध्यम से लौकिक तथा अलौकिक दोनों ही प्रकार की संपत्तियों को धारण किया जा सकता है। भक्ति के माध्यम से लौकिक तथा अलौकिक दोनों ही प्रकार की संपत्तियों को धारण किया जा सकता है। इसलिए संसार में भक्ति से बढ़कर कोई संपत्ति नहीं है।

उक्त उद्गार फीलखाना स्थित श्रृंग ऋषि भवन में गोलोकवासी जेठमल एवं रामकंवरी देवी तिवारी (बलुंदा वाला) की स्मृति में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के अंतिम दिन कथा का श्रवण कराते हुए कथावाचक त्रिदंडी स्वामी भक्ति भूषण बोधायन महाराजजी ने व्यक्त किए। बोधायन महाराजजी ने कहा कि जिसके हृदय में भक्ति भाव भरा होता है, उसे ठाकुरजी के पास जाने की आवश्यकता नहीं होती, वरन ठाकुरजी भक्त के पास स्वयं आते हैं। भागवत का सिद्धांत है कि अग्र पूज्य अच्युत भगवान यानी श्री द्वारकाधीश हैं। उनकी पूजा से सभी देवी देवताओं की पूजा हो जाती है। लेकिन सभी देवी देवताओं की पूजा के माध्यम से अच्युत भगवान की पूजा नहीं हो सकती।
बोधायनजी ने विभिन्न प्रसंगों के साथ सत्राजित की कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि वह सूर्यदेव के परम भक्त थे। सूर्यदेव ने उन्हें यह दिव्य मणि दी, जिससे हर दिन सोना मिलता था। सत्राजित मणि पहनकर द्वारका आए, तो उनका तेज इतना था कि लोग उन्हें सूर्यदेव समझने लगे। श्रीकृष्ण ने उनसे यह मणि राजा उग्रसेन को देने का अनुरोध किया, ताकि इसका लाभ सभी को मिले, लेकिन सत्राजित ने मना कर दिया।

एक दिन सत्राजित का भाई प्रसेनजित मणि पहनकर वन में शिकार करने गया, जहाँ शेर ने उन्हें मारकर मणि छीन ली। बाद में रीछराज जाम्बवान ने उस शेर को मारकर मणि अपनी गुफा में ले जाकर बच्चों को को दे दी। जब प्रसेनजित नहीं लौटे, तो सत्राजित ने श्रीकृष्ण पर मणि चुराने और भाई की हत्या करने का आरोप लगाया। आगे के घटनाक्रम में इस कलंक को मिटाने और पश्चाताप स्वरूप सत्राजित ने पुत्री सत्यभामा और स्यमंतक मणि दोनों श्रीकृष्ण को सौंप दिए।
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भागवत कथा से राजा परीक्षित को मृत्यु भय से मुक्ति
बोधायन महाराजजी ने सुदामा चरित्र सहित अन्य प्रसंगों के माध्यम से भागवत कथा के महात्म्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब-जब भक्तों पर विपत्ति आती है, प्रभु उनकी मदद के लिए अवश्य आते हैं। शुकदेवजी द्वारा सात दिन तक सुनाई गई भागवत कथा के प्रभाव से ही राजा परीक्षित को मृत्यु तक्षक नाग द्वारा डसे जाने का भय दूर हो जाता है और वह परमधाम को प्राप्त हुए। उन्होंने कहा कि वंचितों की विभिन्न माध्यमों से सेवा करना अवश्य धर्म है, लेकिन इस धर्म को सर्वश्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता।
इसका कारण है कि सांसारिक आवश्यकताएँ फिर से जागृत हो जाती हैं, लेकिन आत्मा को श्रीहरि नाम रूपी खुराक देने से किसी प्रकार की आवश्यकता नहीं रह जाती। बोधायन महाराजजी ने कथा आयोजकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह जन्म जन्मांतर को सार्थक बनाने वाली कथा है। हमारे जीवन का उद्देश्य श्रीमद् भागवत कथा के सार को जीवन में आत्मसात करना होना चाहिए।
श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिवस का आकर्षण गौरहरि की कथा पर आधारित नाटिका रही। अवसर पर बड़ी संख्या में भागवत प्रेमियों में कथा तथा अन्य आयोजनों का आनंद लिया। आयोजन में रामानंद, भगवानदास, जगदीश, मोतीलाल, विष्णुगोपाल, पवन, श्याम, द्वारका प्रसाद, रामकिशोर, गजानंद, रामनारायण, कार्तिक, रोहित, वासुदेव, हरिनारायण, अमन, देवांश, समस्त तिवारी परिवार (बलुन्दा वाला) एवं अन्य ने योगदान प्रदान किया।
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