ट्रंप के बड़बोलेपन को हमारा विपक्ष कुछ ज्यादा ही गंभीरता से लेता है। डोनल्ड ट्रंप की आदत है कि वो अपनी जनता को अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं और हमारा विपक्ष उसे और बड़ा कर देता है। अमेरिकी कंपनियां भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था से दूर नहीं होना चाहती, इसलिए उनका भी ट्रंप पर दबाव है। अमेरिका और भारत स्वाभाविक रूप से सहयोगी देश है, इनके बीच समझौता दोनों के लिए लाभदायक है। अमेरिका से व्यापारिक समझौता प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों की बड़ी जीत है, इसे विपक्ष किसी भी तरह छोटा नहीं कर सकता। इस जीत को हार बताने की कोशिश करने का कोई फायदा नहीं है क्योंकि देश की जनता बहुत समझदार है।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता हो गया है हालांकि अभी उस पर हस्ताक्षर नहीं किये गए हैं। जो लोग आरोप लगा रहे थे कि मोदी के कारण दोनों देशों के बीच समझौता नहीं हो पा रहा है और हमारे देश पर अमेरिका ने 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया हुआ है, वही लोग अब कह रहे हैं कि मोदी झुक गए हैं और देशहित से समझौता कर लिया है। देश के किसान और छोटे व्यापारी इस समझौते से बर्बाद हो जाएंगे।
इस समझौते की अहमियत कम करने के लिए कहा जा रहा है कि अमेरिका ने टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया है जबकि सच्चाई यह है कि भारत पर टैरिफ 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत हुआ है। डोनल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया में कहा है कि भारत ने रूस से तेल खरीदने से मना कर दिया है जबकि भारत सरकार ने ऐसा कोई आश्वासन नहीं दिया है। अजीब बात है कि जो विपक्ष पिछले 6 महीनों से लगातार कह रहा है कि डोनल्ड ट्रंप से डरकर मोदी सरकार ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है, वही विपक्ष अब कह रहा है कि अमेरिका के दबाव में अब भारत रूस से तेल नहीं खरीदेगा। सवाल यह है कि अगर 6 महीने पहले ही भारत ने तेल खरीदना बंद कर दिया था तो अब कैसे दोबारा यही काम होगा ।
सरकार को श्रेय देने की जगह सवाल
भारत में विपक्ष और उसका समर्थक वर्ग झूठ बोलने का इतना आदी हो गया है कि उसे पता नहीं चलता कि उसने कल क्या बोला था। अगर अमेरिका से व्यापार समझौता नहीं हो रहा था तो उसके लिए मोदी सरकार जिम्मेदार है और अब हो गया है तो मोदी सरकार को श्रेय देने की जगह कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। राहुल गांधी बोल रहे हैं कि मोदी ने भारत को बेच दिया है जबकि सच्चाई यह है कि ये बात वो पिछले 11 साल से लगातार बोल रहे हैं।
अगर इस समझौते से भारत को बेचा गया है तो अभी तक भारत नहीं बिका था। एक चीज़ बार-बार तो नहीं बिक सकती। अगर भारत आज बिका है तो पहले नहीं बिका था। राहुल गांधी को जवाब देना चाहिए कि वो 11 साल से किसके बिकने का शोर मचा रहे थे। क्या व्यापार समझौता करके कोई देश बिक सकता है, अजीब बात कही जा रही है। अमेरिका से समझौता नहीं होने से अगर भारत का नुकसान हो रहा था तो समझौता होने से क्यों नुकसान होगा।
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सरकार की हर उपलब्धि पर लगातार आलोचना
विपक्ष को पता ही नहीं है कि वो चाहता क्या है। उसे हर हाल में सरकार का विरोध करना है और हर काम के लिए उसकी आलोचना करनी है। जीत को भी हार बताना है, ताकि सरकार को किसी भी तरह का श्रेय न मिले। विपक्ष का कहना था कि अगर समझौता नहीं हुआ तो भारत में बेरोजगारी पैदा होगी, देश को आर्थिक नुकसान होगा। जब समझौता हो गया है तो फिर कहा जा रहा है कि इससे देश बर्बाद हो जाएगा। विपक्ष तय नहीं कर पा रहा है कि समझौता होने से देश बर्बाद होगा या नहीं होने से होगा।
विपक्ष का कहना है कि मोदी सरकार डोनल्ड ट्रंप के सामने झुक गयी है, इसलिए समझौता हो गया है। इसका मतलब है कि मोदी सरकार अभी तक ट्रंप के सामने नहीं झुकी थी, इसलिए समझौता नहीं हो रहा था। क्या विपक्ष चाहता था कि मोदी सरकार ट्रंप के सामने झुक जाए और व्यापार समझौता कर ले। अगर ऐसा नहीं था तो विपक्ष व्यापार समझौता करने का दबाव क्यों बना रहा था।
वास्तव में डोनल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर टैरिफ लगाए जाने के बाद से मोदी सरकार झुकने की जगह उसका विकल्प तलाश रही थी। सरकार को अच्छी तरह पता था कि टैरिफ के कारण देश को बड़ा आर्थिक नुकसान होगा लेकिन अमेरिका के आगे झुककर समझौता करना ज्यादा घातक साबित होता, इसलिए सरकार दूसरे रास्ते तलाश रही थी। मोदी सरकार अमेरिकी निर्यात में संभावित कमी को पूरा करने के लिए दूसरे देशों में संभावनाएं तलाश रही थी। इसके लिए चीन और रूस के साथ भी वार्ता की गई थी। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ब्रिटेन, ओमान, यूएई और यूरोपियन यूनियन के साथ एफटीए किया गया।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता बड़ी उपलब्धि
विशेष रूप से यूरोपियन यूनियन से समझौता होने के बाद डोनल्ड ट्रंप भारी दबाव में आ गए हैं, इसलिए उन्हें समझौता करने के लिए विवश होना पड़ा है। उन्हें अहसास हो गया है कि भारत उनके अनुचित दबाव में आकर समझौता करने वाला नहीं है। भारत-अमेरिका व्यापार समझौता प्रधानमंत्री मोदी की इस साल की दूसरी बड़ी उपलब्धि है। उनकी पहली बड़ी उपलब्धि यूरोपियन यूनियन के साथ मुक्त व्यापार समझौता है। इन दोनों समझौतों के बाद भारत के लिए पूरी दुनिया के रास्ते खुल गए हैं।
अमेरिका के साथ व्यापार समझौता इसलिए भी बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि इससे पहले भारत अमेरिका के साथ एक तरह से व्यापार युद्ध में उलझा हुआ था। विश्व की सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक शक्ति अमेरिका विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाज़ार है। उसकी जनसंख्या बेशक 32 करोड़ है लेकिन उसकी क्रय शक्ति बहुत ज्यादा है, इसलिए उस बाजार से बाहर होना भारत के लिए बहुत नुकसानदेह है। भारत इस नुकसान को जानता है लेकिन अपने हितों से समझौता नहीं कर सकता, इसलिए मामला लटका हुआ था।
डोनल्ड ट्रंप अब ज्यादा देर तक इस समझौते को रोकना नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने इस समझौते की घोषणा कर दी। वास्तव में भारत ने अपनी तरफ से डील फाइनल कर दी थी लेकिन ट्रंप अड़े हुए थे, इसलिए मामला लटका हुआ था। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बयान दिया था कि हमने अपनी तरफ से अमेरिका को अंतिम प्रस्ताव दे दिया है, अब उन्हें फैसला करना है। जैसा पीयूष गोयल ने कहा था कि गेंद पूरी तरह से अमेरिका के पाले में थी, उसने प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और समझौते का ऐलान कर दिया।
अभी समझौता नहीं, सिर्फ प्रस्ताव स्वीकार
विपक्ष आरोप लगा रहा है कि समझौते का ऐलान ट्रंप द्वारा क्यों किया गया है, ये ऐलान दोनों देशों की तरफ से होना चाहिए था। सच तो यह है कि अभी समझौता हुआ नहीं है, सिर्फ ऐलान हुआ है। ट्रंप ने भारतीय प्रस्ताव को मान लिया है, इसलिए समझौते का ऐलान कर दिया है। वैसे भी टैरिफ भारत ने नहीं बल्कि अमेरिका ने लगाए थे, इसलिए उनको हटाने का ऐलान अमेरिका को ही करना था।
अभी समझौते की पूरी जानकारी सामने नहीं आयी है, लेकिन विपक्ष ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। रूस से तेल खरीद बंद करने का विरोध किया जा रहा है जबकि भारत रूस के तेल का विकल्प मिले बिना ये खरीद बंद नहीं कर सकता। भारत रूस से तेल मित्रता निभाने के लिए नहीं बल्कि सस्ता होने की वजह से खरीद रहा है। अगर भारत को कहीं और से सस्ता तेल मिलता है तो भारत उसे खरीद लेगा।
भारत की तेल के बारे में स्पष्ट नीति है कि जहां से भी सस्ता तेल मिलेगा, हम खरीदेंगे। अगर भारत को वेनेजुएला से सस्ता तेल मिलेगा तो भारत खरीदेगा। वैसे भी भारत अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले वेनेजुएला से तेल खरीद रहा था। विपक्ष इस समझौते से भारत के कृषि और दुग्ध उद्योग को नुकसान होने की आशंका जता रहा है जबकि अभी तक समझौते की पूरी जानकारी बाहर नहीं आयी है। जब तक समझौते की पूरी जानकारी बाहर नहीं आती है, तब तक विपक्ष को सरकार पर भरोसा करना चाहिए कि उसने किसानों के हितों का ध्यान रखा होगा।
