अभी तक अनुमान ये है कि अगर आज की तारीख में भी युद्ध रुक जाता है, तो भी इस युद्ध से तीनों सीधे शामिल देशों और अप्रत्यक्ष रूप से आधा दर्जन दूसरे देशों की अर्थव्यवस्थाओं को हुए नुकसान के साथ दुनिया के व्यापार, कारोबार और अर्थव्यवस्था को जो चोट पहुंचती है, उसके चलते 30 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की पूंजी तहस-नहस हो चुकी हैं। मतलब एक अमेरिका की अब तक इस युद्ध में बलि चढ़ चुकी है और अगर यह तुरंत नहीं रुका तो अगले कुछ महीनों में कई अमेरिका जलकर राख हो जाएंगे, जिसकी दशकों तक दुनिया को भरपायी करनी पड़ेगी।
बीते 29 मार्च 2026 को पूरे अमेरिका में 80 लाख से ज्यादा लोग 3,300 जगहों में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के विरूद्ध छेड़े गये युद्ध के खिलाफ नो किंग्स रैली के रूप में उतर आये। हालांकि इसका मुख्य विषय ईरान ही था, पूरे अमेरिका में बहुत बड़े पैमाने पर लोग ईरान के विरूद्ध छेड़े गये युद्ध से नाराज हैं और इसे डोनल्ड ट्रंप की मनमर्जी बता रहे हैं। लेकिन उन्होंने युद्ध के साथ ही इसमें ट्रंप के सख्त इमिग्रेशन कानून और महंगाई के मुद्दों को भी शामिल करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप और उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस के इस्तीफे की मांग की।
इससे पहले भी अमेरिका में ईरान युद्ध के विरुद्ध प्रदर्शन हुए हैं, लेकिन कल (रविवार) का प्रदर्शन हैरान करने वाला था। अमेरिकों से प्रेरित होकर अब यूरोप में भी बहुत सी जगहों में इस युद्ध के खिलाफ लोग गोलबंद हो रहे हैं, यह जरूरी भी है क्योंकि अमेरिका-इजराइल-ईरान जंग दो हफ्तों के बाद लग रहा था, अपने अंत के लिए कोई सिरा तलाश रही है। लेकिन ईरान के पलटवार को जिस तरह से ट्रंप और नेतन्याहू ने अपनी नाक का बाल बना लिया और अपनी झेंप मिटाने के लिए हर हाल में ईरान को तहस-नहस करने की नये सिरे से शुरुआत कर दी है, उससे लगता है कि अब यह जंग न केवल फिर से कहीं ज्यादा भड़क उठी है बल्कि हर गुजरते घंटे के साथ इसका दायरा भी बड़ा और खतरनाक होता जा रहा है।
इजराइल-ईरान संघर्ष और हूती विद्रोही की भूमिका
इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जिस तरह इजराइल अपने 50 फाइटर जेट के साथ ईरान के ऐटमिक ठिकानों पर हमला कर रहा था और ईरान के समर्थन में हूती विद्रोही, इजराइल पर बैलेस्टिक मिसाइलों से हमला करके इस आग में घी डालने का काम कर रहे थे, उससे लगता है कि जंग थमने के जो आसार पैदा हुए थे, वह अब दुगुने वेग से जंग को फैलाने वाले हो गये हैं। इस जंग का जो सबसे डरावना संकेत निकलकर आ रहा है, वह यह है कि 1 अप्रैल 2026 से रूस चार महीनों तक पेट्रोल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रहा है, उससे न केवल भारत, चीन, ब्राजील और तुर्किये जैसी तेजी से विकास कर रही अर्थव्यवस्थाओं पर लगाम लगने के आसार बढ़ गये हैं बल्कि विश्व मंदी की जो पदचाप अभी दूर सुनाई पड़ रही थी, अब वह वो काफी नजदीक आ चुकी है।
रूस के उप-प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक ने अपने ऊर्जा मंत्रालय से इस संबंध में प्रस्ताव बनाने के लिए कहा है कि 1 अप्रैल से 31 जुलाई 2026 तक पेट्रोल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। क्योंकि रूस में पेट्रोल की घरेलू सप्लायी के बाधित होने और कीमतों के बढ़ने के आसार हैं। रूस के इस फैसले के पहले ही ऊर्जा संकट से दुनिया की 50 प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं जूझ रही थीं और तमाम वैश्विक एजेंसियों ने 2026 की आर्थिक वृद्धि को 1 से 1.25 फीसदी तक कम कर दिया था, जिसका मतलब था मंदी कम से कम विश्व अर्थव्यवस्था को अगले कई सालों तक परेशान कर सकती है।
रूस की पाबंदी और अमेरिकी मुद्रास्फीति से वैश्विक संकट
लेकिन अब जिस तरह से रूस ने पेट्रोल निर्यात करने पर पाबंदी लगायी है और अमेरिका में मुद्रास्फीति की दर युद्ध शुरु होने के बाद से अब तक 1.5 फीसदी तक बढ़ चुकी है, तो अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि साल 2026 में सकल घरेलू वैश्विक उत्पाद में 10 ट्रिलियन तक की कमी और करीब इतनी ही धनराशि पैदा करने की कोशिशों पर पानी फिर गया है। इससे दुनिया के कम से कम 3 अरब लोगों पर अगले कई महीनों तक लगभग 5000 से 7000 रुपये प्रति माह का दबाव बन रहा है। यह बेहद खतरनाक है।
इससे समूची विश्व अर्थव्यवस्था के न केवल पटरी से उतर जाने की आशंका पैदा हो गई है बल्कि जिस तरह से लगातार शेयर बाजार, प्रॉपर्टी बाजार और सर्राफा बाजार में गिरावट का माहौल है, उससे साफ हो चुका है कि भले इस युद्ध को अभी तक वैश्विक मान्यता न दी गई हो, लेकिन इसका आर्थिक कुप्रभाव तो वैश्विक हो चुका है। रूस रोजाना 1.2 लाख बैरल से लेकर 1.7 लाख बैरल पेट्रोल का निर्यात करता है, जो कि बहुत सारी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की ऊर्जा लाइफलाइन है।
ऐसे में रूस के पेट्रोल निर्यात को रोक देने से ये अर्थव्यवस्थाएं जबर्दस्त ढंग से प्रभावित होगीं। हालांकि भारत जैसे देश में ज्यादा असर शायद न पड़े, क्योंकि हम पेट्रोल का आयात करने की जगह कच्चे तेल का आयात करते हैं। लेकिन रूस जिस तरह से अपने लिए ज्यादा पेट्रोल संरक्षित करने की नीति अपनाने जा रहा है, उससे साफ हो गया है कि वह खुद ही अपने कच्चे तेल का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करेगा। मतलब साफ है कि संकट भारत के लिए भी है।
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रूस के तेल निर्यात में कटौती से भारत पर संकट बढ़ा
क्योंकि भारत को रोजाना लगभग 56 लाख बैरल कच्चा तेल रिफाइन करना पड़ता है और अगर रूस ने कीमत बढ़ाने के साथ-साथ निर्यात में कटौती भी कर दी है तो, भारत को मुश्किल खड़ी होने वाली है, क्योंकि भारत सब कुछ के बावजूद फरवरी 2026 में दुनिया के बाकी सभी देशों से ज्यादा कच्चा तेल रूस से ही आयात कर रहा था। यह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के ऊपर अचानक मंडराया बहुत बड़ा संकट है।
दुनिया की अर्थव्यवस्था जिन तीन सबसे ज्यादा रूसी तेल खरीदारों की बदौलत आगे बढ़ रही हैं, उसमें चीन, भारत और तुर्किये की अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। चीन करीब 63,100 करोड़ रुपये का और भारत करीब 23,000 करोड़ रुपये का तेल, रूस से आयात करता है, जिसका मतलब है कि दुनिया के इन दो सबसे तेज रफ्तार विकास कर रही अर्थव्यवस्थाओं को चलाने में रूस के तेल का भी बड़ा हाथ है। लेकिन जिस तरह से तेल की किल्लत बढ़ रही है, वह वैश्विक तबाही की तरफ बढ़ने का संकेत है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि ईरान इन पंक्तियों के लिखे जाने तक 30 दिनों की बमबारी झेलकर लगभग तहस-नहस हो चुका है। लेकिन सैन्य पलटवार करने की जो उसमें जो फिदाइन जिजीविषा और आत्मविश्वास मौजूद है, उससे वह युद्ध झेलता कभी तक रहे, लेकिन इजराइल और अमेरिका को खत्म नहीं कर सकता। हां, उसकी इस कोशिश में ईरान के साथ-साथ इन दोनो देशों की अर्थव्यवस्थाएं भी तहस-नहस हो जाएंगी और इनका खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ेगा।
अमेरिका-इजराइल की मिसाइल हमलों से ईरान और हथियार संकट
अमेरिका 28 मार्च 2026 तक 850 से ज्यादा टॉम हॉक क्रूज मिसाइलें ईरान पर दाग चुका था और इससे भी ज्यादा मिसाइलें और बम इजराइल ने ईरान पर बरसायी हैं। जिस कारण अमेरिका के इतिहास में पहली बार हथियारों और गोला-बारूद की भारी कमी हो गई है और इजराइल भी भले सार्वजनिक तौरपर स्वीकार न करें, लेकिन ईरान के हौसले के कारण आर्थिक रूप से पस्त हो चुका है।
यह स्थिति इसलिए भी ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि ईरान इस युद्ध का नैरेटिव अमेरिका और इजराइल के हारने और युद्ध विराम के लिए रास्ता तलाश करने की कोशिशों पर सैट कर रहा है, जिससे ये दोनों खिसिया गये हैं और किसी भी कीमत पर अपनी झेंप मिटाने के लिए अपने साथ दुनिया को तबाह करने पर आमादा हो गये हैं। इसलिए वक्त आ गया है कि अब चीन, रूस, भारत और ब्राजील मिलकर इस युद्ध को रुकवाने में हर हालत में सक्रिय हस्तक्षेप करें वर्ना हाथ पर हाथ धरे रहने की कीमत अगले कई सालों तक पूरी दुनिया की जनता को चुकानी पड़ेगी।
क्योंकि अभी तक अनुमान ये है कि अगर आज की तारीख में भी युद्ध रुक जाता है, तो भी इस युद्ध से तीनों सीधे शामिल देशों और अप्रत्यक्ष रूप से आधा दर्जन दूसरे देशों की अर्थव्यवस्थाओं को हुए नुकसान के साथ दुनिया के व्यापार, कारोबार और अर्थव्यवस्था को जो चोट पहुंचती है, उसके चलते 30 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की पूंजी तहस-नहस हो चुकी हैं। मतलब एक अमेरिका की अब तक इस युद्ध में बलि चढ़ चुकी है और अगर यह तुरंत नहीं रुका तो अगले कुछ महीनों में कई अमेरिका जलकर राख हो जाएंगे, जिसकी दशकों तक दुनिया को भरपायी करनी पड़ेगी।
