ट्रंप की टैरिफ ब्लैकमेलिंग – ऐसा न हो यह अमेरिका के लिए ही भारी पड़ जाए
अमेरिका अपनी शर्तों पर हमें अपना पिछलग्गू बनाना चाहता है और इसे दोस्ती का नाम देता है। लेकिन 21वीं सदी का भारत इसके लिए कभी तैयार नहीं होगा। अमेरिका जिस तरह की टैरिफ ब्लैकमेलिंग कर रहा है, उसका असर हमसे ज्यादा अमेरिका पर भारी पड़ सकता है। क्योंकि भारत में हाल के सालों में अपने कई व्यापार सहयोगी खोज लिए हैं। लेकिन अमेरिका को हमारा असहयोग बहुत भारी पड़ेगा। हम 145 करोड़ के देश हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा जीवंत उपभोक्ता बाजार है। हम मैन्युफैक्चरिंग, डिजिटल टेक्नोलॉजी, फार्मा और सर्विस सेक्टर की वैकल्पिक शक्ति हैं।
अंतत अपनी सनकभरी घोषणाओं के लिए विख्यात हो चुके अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने 30 जुलाई 2025 को ऐलान कर दिया कि 1 अगस्त 2025 से अमेरिका, भारत पर 25 फीसदी टैरिफ लगाने जा रहा है। साथ ही उन्होंने भारत द्वारा रूस से हथियार और तेल खरीदने पर अमेरिका की चेतावनियों पर कान न देने के लिए 10 फीसदी का जुर्माना और लगा दिया है। इस तरह अमेरिका ने भारत पर 25 नहीं 35 फीसदी का टैक्स ठोक दिया है।
दुर्भाग्य देखिए कि भारत और अमेरिका के संबंधों के लिए यह कड़वाहटभरी खबर तब आती है, जब दोनों देशों के विज्ञान संगठन, इसरो और नासा ऐतिहासिक साझेदारी के चलते दुनिया का अब तक का सबसे ताकतवर सैटेलाइट निसार लांच कर रहे हैं। यह भारत और अमेरिका के वैज्ञानिकों की सबसे महान और विश्वसनीय दोस्ती का नतीजा है। लेकिन जिस दिन यह दोस्ती परवान चढ़ रही थी, उसी दिन डोनल्ड ट्रंप ने टैरिफ ब्लैकमेलिंग का हम पर हंटर चला दिया और साबित कर दिया कि वे हमें भले झूठ-मूठ का अपना दोस्त कहते रहते हों, लेकिन उनके मन में दबी इच्छा है कि भारत, अमेरिका का पिछलग्गू बनकर रहे।
इसलिए जब बार-बार उनकी चेतावनियों का हम पर कोई असर नहीं पड़ा कि हमने रूस से तेल और हथियार न खरीदें, तब उन्होंने बड़ी निर्लज्जता से इसे हमारा अपराध बताकर 10 प्रतिशत टैक्स ठोक दिया। जबकि आजादी के बाद से ही भारत अपनी निरगुट नीति के लिए जाना जाता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब दुनिया साफ-साफ दो खेमों में बंट गई थी, तब भी हमने अपनी नॉन अलाइनमेंट की इस नीति को बरकरार रखा और किसी भी खेमे के अंध अनुयायी नहीं बने।
भारत पर कृषि बाज़ार खोलने का अमेरिकी दबाव
लेकिन ट्रंप चाहते हैं कि जो कभी नहीं हुआ वो हो जाए। इसलिए सारी राजनीतिक और कूटनीतिक शर्मोहया या प्रोटोकॉल को धता बताते हुए वो हम पर इस तरह चाबुक चलाने की कोशिश कर रहे हैं जैसे हम कोई संप्रभु देश न हों, अपितु अमेरिका के गुलाम हों। जो लोग सोचते हैं कि ये महज व्यापार घाटे और भारत के उपभोक्ता बाजार तक अमेरिका की अपनी पहुंच बनाने की रणनीति है, वह धोखे में हैं।
दरअसल अमेरिका चाहता है कि भारत उसके लिए अपने कृषि उत्पादों, डेयरी प्रोडक्ट और नट बाजार पूरी तरह से खोल दे। इससे अमेरिका हमारे यहां अपने इन उत्पादों को डम्प कर दे, क्योंकि अमेरिका में ये उत्पादन उन्नत बायोटेक्निक और किसी तरह के सांस्कृतिक पक्षों की परवाह न करते हुए तैयार होते हैं और इतनी बड़ी मात्रा में तैयार होते हैं कि एक क्या दस अमेरिका भी खुद अपने बाजार में उन्हें नहीं खपा सकता।
जबकि भारत की आबादी 145 करोड़ से ज्यादा है, इस संख्या और उपभोक्ता बाजार का लालच ट्रंप नहीं छोड़ पा रहे और चाहते हैं कि भारत अपनी सभी तरह की सांस्कृतिक मान्यताओं को एक तरफ करते हुए उससे निरंकुश कृषि और डेयरी उत्पादों को अपने बाजार में खपा दे। इसके लिए ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकाल में भी भारत पर बहुत ज्यादा दबाव डालने की कोशिश की थी।
भारतीय कृषि संस्कृति बनाम अमेरिकी व्यापार दबाव
यहां तक कि इसके लिए अमेरिका ने भारत से विशेष व्यापार दर्जा 2019 में छीन लिया था। इसके कारण कुछ भारतीय उत्पाद जो पहले अमेरिका में टैक्स मुक्त हुआ करते थे, वो काफी महंगे हो गये। लेकिन अमेरिका की इस ब्लैकमेलिंग और दादागिरी के बावजूद भारत ने अपना कृषि बाजार अमेरिकी उत्पादों के लिए नहीं खोला। दरसअल भारत में कृषि भले हमारे सकल घरेलू उत्पाद में अभी 17 से 18 फीसदी की ही भूमिका निभाती हो, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में कृषि कोई व्यापार या जीविकाभर नहीं है बल्कि यह हमारी जीवन संस्कृति है।
देश के 50 फीसदी से ज्यादा लोगों की आजीविका का साधन आज भी कृषि है। ऐसे में भला हम मशीनी तकनीक से अपार अमेरिकी कृषि उपजों के लिए अपना बाजार कैसे खोल दें? भारत में गाय को माता मानते हैं। हमारे पवित्र कर्मकांडों में दूध का इस्तेमाल होता है। पवित्र पेय के रूप में और अमेरिका में पशुओं को अधिक से अधिक दुधारू बनाने के लिए उन्हें एनिमल डाइट तक दी जाती है।
ऐसे में अमेरिकी डेयरी उत्पादों को धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन जीने वाले आम भारतीय कैसे अपना लेंगे? क्योंकि अमेरिकी डेयरी प्रोडक्ट नॉन वेजीटेबल श्रेणी में आते हैं और जबकि हम व्रत उपवास में भोग पर भी दूध, दही का इस्तेमाल करते हैं, तो सवाल सिर्फ व्यापार का ही नहीं बल्कि हमारी जीवन संस्कृति का भी है। ऐसे में हम महज राजनीतिक दबाव में आकर अपने मूल्यों से सांस्कृतिक समझौता कैसे कर लें?
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भारत पर दबाव बनाकर ट्रंप की राजनीति
यह बात श्रीमान ट्रंप को समझ में नहीं आ रही है। दरअसल अमेरिका सोचता है कि वह दुनिया का बॉस है, जो अमेरिका के साथ नहीं है, वह उसके खिलाफ है। अमेरिका अपने सहयोगी देशों को अपना आज्ञाकारी, पालतू समझता है, बराबर का साझेदार नहीं। ट्रंप खुद भारत को पिछलग्गू मानने की बातें कई बार कर चुके हैं। 2019 में भी उन्होंने कहा था, भारत हमसे छूट ले रहा है।
2020 में उन्होंने एक बार कहा था, मोदी मेरे दोस्त हैं, लेकिन मैं बराबरी का व्यापार चाहता हूं यानी दोस्ती के नाम पर वो हम पर व्यापारिक दबाव डाल रहे हैं। ट्रंप भारत से सैन्य रणनीति और आर्थिक समर्थन तो चाहते हैं, लेकिन हमें किसी तरह की कोई बराबरी का दर्जा दिये बिना। ट्रंप अमेरिका फर्स्ट की नीति पर जीतकर आये हैं और वह इसे हम पर दबाव डालकर अमेरिकी नागरिकों को दिखाना चाहते हैं कि वो कितने बड़े और मजबूत नेता हैं।
मोदी मेरा दोस्त कहकर वो हम पर दबाव डालते हुए अपने नागरिकों के सामने ज्यादा अमेरिकी साबित होना चाहते हैं। यह संदेश देकर कि वह राष्ट्रहित को अन्य देशों के हितों से ऊपर रखते हैं। लेकिन यही बात जब हम कहते हैं कि हमारे लिए सबसे पहले हमारे निजी हित हैं, तो उन्हें मिर्ची लग जाती है। जब भारत क्वॉड का हिस्सा होते हुए भी रूस से रक्षा समझौते करता है, ईरान और रूस से तेल खरीदता है तो ट्रंप तिलमिला जाते हैं।लेकिन जब हम कहते हैं कि हमें हथियार तो बेचो, पर तकनीक भी दो, तो सबसे चतुर बनिये की तरह मुकर जाते हैं।
भारत की ताकत और अमेरिकी दबाव की नाकामी
30 जुलाई को इसरो के सैटेलाइट व्हीकल से नासा और इसरो के साझे रणनीतिक सहयोग वाले सैटेलाइट को भेजा गया। उसे भेजने के लिए भारत 20 साल इसलिए पिछड़ गया, क्योंकि अमेरिका ने हामी भरकर भी हमें क्रायोजेनिक इंजन की तकनीक देने से मना कर दिया था। चूंकि हमने उसकी बात न मान करके पोखरण परीक्षण भी किया था।
कुल मिलाकर अमेरिका अपनी शर्तों पर हमें अपना पिछलग्गू बनाना चाहता है और इसे दोस्ती का नाम देता है। लेकिन 21वीं सदी का भारत इसके लिए कभी तैयार नहीं होगा। अमेरिका जिस तरह की टैरिफ ब्लैकमेलिंग कर रहा है, उसका असर हमसे ज्यादा अमेरिका पर भारी पड़ सकता है। क्योंकि भारत में हाल के सालों में अपने कई व्यापार सहयोगी खोज लिए हैं। लेकिन अमेरिका को हमारा असहयोग बहुत भारी पड़ेगा। हम 145 करोड़ के देश हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा जीवंत उपभोक्ता बाजार है।

हम मैन्युफैक्चरिंग, डिजिटल टेक्नोलॉजी, फार्मा और सर्विस सेक्टर की वैकल्पिक शक्ति हैं। रक्षा, सेमी कंडक्टर और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भी हमारे वैकल्पिक साझेदार हैं। अगर अमेरिका नहीं तो यूरोप, रूस, मिडल ईस्ट और एशिया ब्लॉक हमारे सहयोग के लिए खुले हुए हैं, जबकि अमेरिकी बाजार सैचुरेशन का शिकार है। अमेरिकी जनसंख्या वृद्धि दर रुकी हुई है और ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इन सबको देखते हुए कहीं ऐसा न हो कि यह टैरिफ ब्लैकमेलिंग अमेरिका को ही भारी पड़ जाए।
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