तुबे का बहना
भगवान महावीर के गणधर सुधर्मा स्वामी ने ‘ज्ञात सूत्र’ में अंकित एक दृष्टांत के संदर्भ से बताया कि भगवान ने कहा था कि एक व्यक्ति तुंबे पर मिट्टी का लेप लगाकर सुखा देता था। उसने यह क्रिया आठ बार अपनाई। उसके बाद तुंबे को पानी की सतह पर छोड़ दिया। लेप से आवृत्त तुंबा सरोवर के जल में बहने लगा, जिससे उस पर लगा मिट्टी का लेप गलने लगा। लेप धीरे-धीरे नष्ट हो गया। फिर भी तुंबा पानी की सतह पर बहने लगा। तुंबे का स्वभाव पानी की सतह पर बहने का है, डूबना नहीं।
इसलिए मिट्टी का लेप लगा होने पर भी वह बहता रहा। उसका स्वभाव नष्ट नहीं हुआ। इस दृष्टांत के द्वारा भगवान महावीर अपने शिष्य गौतम के प्रश्न का समाधान करते हुए कहते हैं कि गौतम जो अनंत आत्माएं संसार सागर में डूबी हुई हैं, वह अपने स्वभाव से नहीं डूबी हैं। यदि स्वभाव से डूबतीं तो सदा के लिए डूब जातीं। एक आत्मा भी मुक्त नहीं होती। उनका स्वभाव तो मुक्त होने का है, उनका निज स्वरूप नष्ट नहीं हुआ है।
यही बात आत्मा के साथ रहे, क्रोध, मान, माया, लोभ, राग-द्वेष के लिए भी लागू होती है। महत्व निज स्वरूप को अनावृत्त करने का है। ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहिनी और अंतराय इन चार घातिक कर्मों का आवरण टूटते ही आत्मा जीवन मुक्त हो जाती है, यही परमात्मा दर्शन है, यही मोक्ष है।
-जसराज जैन देवड़ा धोका
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