आध्यात्मिक उन्नति के लिए करें ज्ञान का प्रयोग : रमेशजी

हैदराबाद, जो व्यक्ति अपने भीतर की दुर्गा रूपी दुर्ग में टिकना सीख जाता है, वह वर्तमान के आनंद में जीता है। अपने भीतर में जीवन जीना ही सबसे आनंददायक स्थिति है। ज्ञानशक्ति का प्रयोग बंधन के स्थान पर आध्यात्मिक उन्नति के लिए करना चाहिए। उक्त उद्गार नामपल्ली स्थित होटल क्वालिटी इन रेसीडेंसी में आयोजित नवरात्रि विशेष सत्संग में सद्गुरु रमेशजी ने व्यक्त किए। रमेशजी ने कहा कि नवरात्रि में नौ देवियों की उपासना होती है।

यह देवियाँ एक ही माँ दुर्गा के स्वरूप हैं। दुर्गा शब्द का अर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि यह दुर्ग से बना है, जिसे किला भी कहा जाता है। सभी देवियाँ ब्रह्मांड सहित हमारे भीतर समाहित हैं। सारी सृष्टि की प्रकृति इन नौ देवियों के स्वरूप में आ जाती हैं। इनकी पूजा-उपासना करने का आर्थ इन शक्तियों को अपने भीतर जागृत करना है। हम सब शक्तियों का असीम भंडार हैं, लेकिन अज्ञानतावश उन्हें जान नहीं पाते। हमारे जीवन का उद्देश्य भीतर की शक्तियों की पहचान कर उनको जागृत करना है।

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आत्मशक्ति जागरण से भयमुक्त और दिव्य जीवन

हम साधारण जीव बनकर जन्म लेते हैं और साधारण जीव बनकर मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। अगर हम अपने अंदर की शक्तियों को जागृत करेंगे, तो जीवन में किसी प्रकार का भय नहीं होगा। जब तक हम बाह्य दुनिया में जिएँगे, भय रहेगा। अंर्तयात्रा जब तक नहीं करेंगे, जीवन भय और चिंता में जिएँगे। जब तक हम अपनी अंतर की शक्तियों के नहींपहचानेंगे, जीवन का आनंद सही मायनों में नहीं ले पाएँगे।

रमेशजी ने कहा कि भगवान को जानने और मानने में अंतर है। जानने का अंतर केवल उनके बारे में बाह्य सूचना प्राप्त करने जैसा होता है। मानने का अर्थ अपने भीतर उस दिव्यता की अनुभूति करना होता है। नवरात्रि में अपनी ज्ञान शक्तियों को जगाने का प्रयास करना चाहिए। मुक्ति का मार्ग ज्ञान शक्ति द्वारा ही प्रशस्त होता है। प्राप्त ज्ञान शक्ति को बंधन में न लगाकर मुक्त होने के लिए मोक्ष या आनंद की ओर लगाना चाहिए।

गुरु माँ ने कहा कि हम सभी में देवी-देवताओं का वास है। उनकी शक्तियाँ भी हमारे अंदर समाहित हैं, बस उन्हें जागृत करने के लिए हमें साधना तथा गुरु ज्ञान को ग्रहण करना पड़ता है। इससे हम भी मारुति से हनुमान तथा जीव से शिव बन सकते हैं।

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