विवाह पंचमी मन और मर्यादा का संगम है

तिथि मुहूर्त

मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि अंग्रेजी कैलंडर के अनुसार, 24 नवंबर, सोमवार की रात 9 बजकर 22 मिनट से शुरु हो रही है, जो 25 नवंबर, मंगलवार की रात 10 बजकर 56 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर विवाह पंचमी का व्रत व पूजन 25 नवंबर को किया जाएगा।

भारतीय संस्कृति में जितने पर्व व त्योहार हैं, उन सबके पीछे कोई न कोई पौराणिक व आध्यात्मिक कहानी मौजूद है, जो हमें भाव-विभोर कर देती है। विवाह पंचमी भी ऐसी ही शुभ और पवित्र तिथि है, जिसे भगवान राम और माता सीता के दिव्य विवाह की स्मृति में मनाया जाता है। यह दिन केवल एक पौराणिक कथा की उत्सव स्मृति है बल्कि भारतीय समाज के आदर्श विवाह संस्कार, मर्यादा, प्रेम और कर्तव्य के अद्भुत संतुलन का प्रतीक है।

विवाह पंचमी का धार्मिक महत्व अगर पौराणिक ग्रंथों से मानें तो यह मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को संपन्न हुए मिथिला के राजा जनक की पुत्री सीता और अयोध्या के राजा दशरथ के सुपुत्र राजकुमार राम के विवाह की तिथि है। इसे विवाह पंचमी के रूप में इसलिए जाना जाता है, क्योंकि यह तिथि भारतीय वैवाहिक जीवन के लिए एक आदर्श और प्रेरक तिथि मानी जाती है।

वास्तव में भगवान राम और माता सीता का मिलन केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं है बल्कि धर्म और मर्यादा का मिलन है। राम जहां आदर्श पुरुष और आदर्श पुत्र के रूप में पूजे जाते हैं, वहीं माता सीता त्याग, धैर्य और नारी संस्कार की प्रतिमूर्ति हैं। विवाह पचंमी हमें यह स्मरण कराती है कि विवाह केवल सामाजिक अनुबंध ही नहीं है बल्कि दो लोगों द्वारा किया जाने वाला एक दिव्य व्रत है, जिसमें प्रेम के साथ जिम्मेदारी, सम्मान और संयम का भाव निहित है।

विवाह पंचमी : राम–सीता विवाह की भक्ति और उल्लास का पर्व

यह दिन विशेष रूप से विवाह योग्य कन्याओं और कुमारों के लिए मंगलकारी माना जाता है। विवाह पंचमी का उत्सव न सिर्फ देशभर में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है, लेकिन इसका सबसे बड़ा आयोजन भारत नहीं पड़ोसी देश नेपाल में होता है। जहां मौजूदा समय में जनकपुर धाम स्थित है। नेपाल में प्रचलित मान्यताओं के मुताबिक मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नेपाल के जनकपुर धाम में ही राम-सीता का विवाहोत्सव संपन्न हुआ था। इसलिए इस दिन जनकपुर की गलियां फूलों से सजायी जाती हैं। मंदिरों में घंटियां बजती हैं और पूरे शहर में सौभाग्य यात्राएं निकलती हैं।

पूरे जनकपुर धाम के वातावरण में जय सिया राम के उ‌द्घोष का स्वर गूंजता है। भारत में भी इस दिन अयोध्या, वाराणसी, सीतामढ़ी अन्य वैष्णों मंदिरों में भक्ति और उल्लास छाया रहता है। भक्तजन प्रातः स्नान करके राम-सीता का स्मरण और पूजन करते हैं। इस दिन घरों में दीप जलाये जाते हैं तथा भजन, कीर्तन और विवाहोत्सव के दृश्य मंचित किये जाते हैं। कई स्थानों पर सीता-राम विवाह का सांकेतिक नाट्य मंचन होता है, जिसमें बच्चे या कलाकार दूल्हा-दुल्हन के वेश में भगवान राम और माता सीता की भूमिका निभाते हैं।

इस दिन व्रत और पूजन करने वाले लोग सुबह उठकर सबसे पहले स्नान करते हैं, फिर वो रामचरितमानस के बालकांड में स्थित राम-सीता के विवाह का कई लोगों के साथ मिलकर सस्वर पाठ करते हैं। खास करके वह प्रसंग जिसमें धनुष, यज्ञ और विवाह का वर्णन होता है। इसके बाद कलश, दीपक, फूल, फल और तुलसी दल से श्रीराम और सीता का पूजन संपन्न होता है।

विवाह पंचमी: सीता-राम के आदर्श से जीवन में प्रेम और मर्यादा का संचार

पूजा के अंत में भक्त प्रसाद स्वरूप फूल और चावल तथा ताजे फलों का वितरण करते हैं। माना जाता है कि इस दिन सीता-राम का पूजन करने से वैवाहिक जीवन में स्थिरता, सौहार्द और सुख व शांति बनी रहती है, जो लोग अविवाहित हैं, उनके लिए भी यह तिथि बहुत जरूरी और शुभ विवाह के योग का आशीर्वाद देती है।

विवाह पंचमी भारतीय संस्कृति की आत्मा का उत्सव है। यह दिन हमें बताता है कि रिश्तों की पवित्रता तभी तक बनी रहती है, जब तक उनमें विश्वास, आदर और सयंम का भाव रहता है। जब-जब मानव समाज इन मूल्यों से भटकता है, तब-तब यह पंचमी हमें राम और सीता के आदर्श की ओर लौटने की याद दिलाती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि विवाह पंचमी पर एक दीप जलाकर यह कहते हुए अपने व्रत को सार्थक करें, ‘हे सीता-राम हमारे घरों में भी वही प्रेम, वही मर्यादा, वही स्थिरता बनी रहे, जो तुम दोनों के दिव्य मिलन में बनती है।’

‘… जब-जब मानव समाज इन मूल्यों से भटकता है, तब-तब यह पंचमी हमें राम और सीता के आदर्श की ओर लौटने की याद दिलाती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि विवाह पंचमी पर एक दीप जलाकर यह कहते हुए अपने व्रत को सार्थक करें, ‘हे सीता राम हमारे घरों में भी वही प्रेम, वही मर्यादा, वही स्थिरता बनी रहे, जो तुम दोनों के दिव्य मिलन में बनती है।’

आर.सी.शर्मा

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