संयुक्त राष्ट्र की 22 मई, 2025 को जारी रिपोर्ट से यों तो युद्धोन्मादी दुनिया को शर्मसार होना चाहिए। लेकिन शर्म बची हो, तब न? रिपोर्ट में कहा गया है कि युद्धग्रस्त इलाकों में नागरिकों की रक्षा के लिए बनाए गए अंतरराष्ट्रीय नियम-कायदे अब काम नहीं कर रहे। 2024 में 14 युद्धों में 36,000 से ज्यादा नागरिकों की मौत हुई और यह संख्या शायद इससे भी ज्यादा हो। यौन हिंसा में भारी बढ़ोतरी और अस्पतालों, स्कूलों, पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की बरबादी ने हालात को और बदतर बना दिया है। उन तमाम देशों के लिए, यह वास्तव में गहरी चिंता और कदम उठाने का आह्वान है, जो शांति और इंसानियत की बात करते हैं।
बताया गया है कि युद्धों में सबसे ज्यादा नुकसान आम लोग, खासकर बच्चे, झेल रहे हैं। 36,000 मौत कोई जड़ आँकड़ा नहीं, बल्कि टूटे हुए परिवारों, अनाथ बच्चों और बरबाद बस्तियों का कारुणिक सच है। ग़ाज़ा और यूक्रेन जैसे इलाकों में हालात भयावह हैं। यौन हिंसा को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। आतंकित लोग घर छोड़कर न भागें, तो क्या करें? पर, भागकर भी जाएँ, तो कहाँ?
युद्ध में मानवाधिकार हनन और भारत की ज़िम्मेदारी
अस्पताल, स्कूल, यहाँ तक कि पानी की टंकियाँ – सब कुछ नष्ट हो रहा है। सबको मालूम है कि यह सब अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है। लेकिन दोषियों को सजा नहीं मिल रही। संयुक्त राष्ट्र ने सुरक्षा परिषद से कार्रवाई की माँग की है। पर दुनिया चुप है। ठाड़ा मारे भी; और रोने भी न दे! कहना ज़रूरी है कि वैश्विक शांति और नियमों की वकालत करने वाले भारत जैसे देशों के लिए यह रिपोर्ट एक चेतावनी है।
भारत ने संयुक्त राष्ट्र मिशनों में बड़ा योगदान दिया है। लेकिन यह देखना दुखद है कि जिन जेनेवा समझौते जैसे नियमों को हम समर्थन देते हैं, वे न केवल असफल बल्कि निरर्थक हो रहे हैं। ग़ाज़ा में महीनों तक राहत सामग्री नहीं पहुँची। यही नहीं, रिपोर्ट में यौन हिंसा की बढ़ोतरी पर खास चिंता जताई गई है। यह असभ्यता और बर्बरता नहीं तो और क्या है कि बलात्कार को युद्ध में हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। मानवता का दुर्भाग्य कि मिलीभगत की वजह से बहुत से समर्थ देश इसे अनदेखा कर रहे हैं!
ऐसे में नैतिकता का तकाजा है कि युद्ध में लैंगिक हिंसा के इन मामलों के खिलाफ भारत कुछ सार्थक हस्तक्षेप करे। भारत को युद्धग्रस्त इलाकों में महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा के लिए जी-20 और ब्रिक्स जैसे मंचों पर आवाज उठानी चाहिए।
यह भी कैसे भुलाया जा सकता है कि इन युद्धों के बीच अकेले 2024 में 12.2 करोड़ लोग जबरन अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर हुए हैं। इन विस्थापितों की चिंता और रक्षा आखिर कौन करेगा?
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भारत की नैतिक भूमिका और वैश्विक नेतृत्व की पुकार
यह किसकी ज़िम्मेदारी है? विश्व बिरादरी की ही न? पर वह है कहाँ? मानव जाति के बीच से बिरादरी भाव का इस तरह लापता होना पृथ्वीवासियों के लिए मंगलकारी खबर नहीं हो सकती न! किसी को तो आगे आना होगा। पीड़ित मानवता भारत की ओर देख रही है। क्या हम वसुधैव कुटुंबकम् के अपने आदर्श को चरितार्थ करने के लिए तैयार हैं, ताकि उन निर्दोष परिवारों, बच्चों, बूढ़ों, महिलाओं और आम नागरिकों की रक्षा हो सके जिन पर नाहक अत्याचार करके लड़ाकू जातियाँ जंग जीतना चाहती हैं?
अंतत, भारत के सामने एक मौका है कि हम दुनिया में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका दिखाएँ। शांति मिशनों को मजबूत करके, यौन हिंसा के खिलाफ आवाज उठाकर और संयुक्त राष्ट्र में सुधार की माँग करके भारत युद्धग्रस्त इलाकों में नागरिक सुरक्षा की ढहती व्यवस्था को फिर से खड़ा कर सकता है। यह समय सिर्फ चिंता करने का नहीं, बल्कि कदम उठाने का है, क्योंकि दाँव पर इनसानी जिंदगियाँ हैं। काश, कोई बशीर बद्र आए और युद्धजीवी प्राणियों को राजी करे कि-
सात संद़ूकों में भर कर दफ़्न कर दो ऩफरतें;
आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत!
