आप क्या ग्रहण करते हैं

जब गन्ने की खेती होती है, तब क्या आप मीठे जल से सींचते हैं? वह जल जो करेले की खेती की सिंचाई के लिए उपयोग में लिया जाता है, वही मिर्च तथा गन्ने की सिंचाई के लिए भी उपयोग में लिया जाता है। खेत भी वही है, जल भी वही है, परंतु उस जल से क्या ग्रहण करना है, यह बीज तय करता है। इस सामर्थ्य को पहचानना आवश्यक है।

इस अध्याय के प्रश्न को अच्छी तरह समझें। आप क्या ग्रहण करते हैं? किसे ग्रहण करते हैं? इस संसार में ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँ सकारात्मक ऊर्जा नहीं है एवं जहाँ नकारात्मक ऊर्जा भी नहीं है। दोनों एक साथ उपलब्ध हैं। आप क्या ग्रहण करते हैं? आप जैसे हैं, वही सहजता से ग्रहण करते हैं। जो आपके अंदर है, आप बाहर से भी वही ग्रहण करते हैं।

एक बार श्रीकृष्ण तथा दुर्योधन के मध्य सज्जन तथा दुर्जन की चर्चा चली। दुर्योधन की जिज्ञासा का समाधान करने के लिए श्रीकृष्ण ने धर्मराज से कहा, द्वारिका में कौन उपद्रवी है, कौन पापी है, कौन दुराचारी है, इसकी सूची बनाएँ।
दुर्योधन से कहा, द्वारिका में कौन सन्त है, कौन सज्जन है, कौन शालीन है, कौन कुलीन है, इसकी सूची बनाएँ।

दृष्टि वही, परिणाम अलग

जब लौटे तब दोनों के हाथ रिक्त थे। संपूर्ण द्वारिका में दुर्योधन को कोई सज्जन नहीं मिला तथा धर्मराज को कोई दुर्जन नहीं मिला। इसका रहस्य केवल इतना ही है कि आप जैसे हैं, आपको वैसा ही दिखता है। जो आपको दिखता है, उसे ही आप ग्रहण करते हैं। हम सभी के जीवन में प्रतिपल इसी तरह लेश्या का संचार चलता रहता है।

जिनके साथ आपके गहरे संबंध हैं, उनकी लेश्या बिना बुलाए आती है। यह संबंध वैर के हो सकते हैं। हर व्यक्ति की नकारात्मक ऊर्जा को आप ग्रहण कर रहे हैं। मैत्री का अर्थ है कि उस व्यक्ति की सकारात्मक ऊर्जा को आप ग्रहण कर रहे हैं। प्रसिद्ध उदाहरण आपके समक्ष है। श्रीकृष्ण का जीवन जहाँ अर्जुन के लिए अपार संभावनाएँ एवं अथाह सकारात्मकता लिए हुए था, वहीं दुर्योधन उनसे कुछ भी लाभ प्राप्त नहीं कर सका।

अन्तर इतना ही था कि अर्जुन के मन में श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा तथा प्रेम के भाव थे, वहीं दुर्योधन के मन में उनके प्रति द्वेष तथा खिन्नता के भाव थे। श्रीकृष्ण वही थे, किन्तु दोनों ने उनसे भिन्न-भिन्न ग्रहण किया। जैसा ग्रहण किया, वैसा जीवन जीया। एक का कल्याण हुआ तथा दूसरे का विनाश। किसी भी व्यक्ति के प्रति आपका क्या दृष्टिकोण है, कैसे मनोभाव हैं, इसे समझें।

दोष देने से पहले, ग्रहण देखिए

इसी के आधार पर आप एक से सकारात्मकता ग्रहण करते हैं तथा दूसरे से नकारात्मकता। यह भी समझ लें कि न आशीर्वाद फलता है और न ही द्वेष। फलता वही है जिसे आप ग्रहण करते हैं। जिसे ग्रहण नहीं करते, वह नहीं फलेगा। इस सूत्र का स्मरण रहे – आपके मन में जब किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति द्वेष या अविश्वास है तब वहाँ से नकारात्मकता ग्रहण होगी।

यदि मैत्री तथा आस्था है तब वहाँ से सकारात्मकता ही ग्रहण होगी। आप सदैव कोप देने वाले को उत्तरदायी मानते हैं, परन्तु असली उत्तरदायित्व देने वाले का नहीं, लेने वाले का है। लेने वाला यदि कृपा लेगा तब कृपा फलती है और कोप लेगा तब कोप फलता है। प्रभु महावीर पर नाग चण्डकौशिक ने अपने क्रोध का विष उगल दिया। परन्तु महावीर ने अपने अन्दर क्रोध को ग्रहण करने वाली व्यवस्था समाप्त कर दी थी।

ध्यानमग्न व्यक्ति, जो लेश्या के माध्यम से आत्मपरिवर्तन कर रहा है।
प्रवीण ऋषि

आपके अन्दर कौन-सी व्यवस्था जीवन्त है, क्रोध को स्वीकार करने की या प्रेम को स्वीकार करने की? अत्यधिक क्रोध के कारण चण्डकौशिक के अंदर प्रेम को ग्रहण करने की क्षमता सुप्त अवस्था में थी। परन्तु महावीर ने उसकी क्षमता को सक्रिय किया, अत वह उसी क्षण ग्रहणशील हो गया। अपने जीवन में आप भी इस क्षमता को सक्रिय करें, संचालित करें।

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