भ्रष्टाचार जो कराये सो कम…!
अधिकतर गांवों में तथाकथित समाजसेवी महिलाओं का बैंक खाता इस वायदे से खुलवाता है कि उन्हें सरकारी लाभ मिलेगा। इन खातों को संबंधित महिलाएं कभी ऑपरेट नहीं करती हैं। फिर सरकारी कागज़ों में चढ़ा दिया जाता है कि इन महिलाओं ने बच्चे को जन्म दिया है या इनकी नसबंदी हुई है। फलस्वरूप इनके खाते में सरकारी योजनाओं का पैसा ट्रांसफर हो जाता है, जिसे निकालकर घोटालेबाज़ आपस में बांट लेते हैं। जिनके नाम पर यह घोटाला होता है उन्हें कुछ नहीं मिलता बल्कि उन्हें तो मालूम भी नहीं होता कि उनके नाम का दुरूपयोग हो रहा है।
आगरा जिला के गांव नागला कादियान की 35 वर्षीय कृष्णा कुमारी ने फतेहाबाद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) पर 2017 में अपने बच्चे को जन्म दिया था। लेकिन उन्हें मालूम न था कि वह इसी केंद्र पर 2021 व 2023 के बीच 30 महीनों के भीतर 25 अन्य बच्चों को जन्म देंगीं और इस दौरान उनकी 5 बार नसबंदी भी हो जायेगी। हाल के वित्तीय ऑडिट में यह असंभव डाटा प्रकाश में आया है।
सरकारी योजनाओं में घोटाला: फर्जी कागज़ात और धोखाधड़ी
जाहिर है यह कागज़ी खानापूर्ति केंद्र में तैनात सरकारी कर्मचारियों ने नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) द्वारा संचालित योजनाओं में घोटाला करके पैसा ऐंठने के लिए की। बेचारी कृष्णा कुमारी को तो यह भी नहीं मालूम कि फर्जी कागज़ात के ज़रिये उसके नाम से बैंक खाता खोला गया जिसमें सरकारी योजना के तहत 45,000 रूपये आये, जिन्हें घोटालेबाजों ने निकाल लिया।
इस सिलसिले में पांच व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है, जिनमें से चार स्वास्थ्य विभाग के ही कर्मचारी हैं और पांचवां कृष्णा कुमारी के गांव का व्यक्ति है, जिसने उनके नाम का बैंक खाता खोला और सरकारी पैसा निकाला।
अगर बात स़िर्फ इतनी ही रहती तो यह राष्ट्रीय सुर्खी के लायक खबर न होती। लेकिन यह तो मात्र हिमशैल की नोक है। इस घोटाले की परतें धीरे-धीरे खुलती जा रही हैं। यह स्वीकार करना कठिन है कि घोटालेबाजों ने स़िर्फ चंद महिलाओं के नाम पर फ्रॉड किया। आगरा जिले में ही तीन अन्य महिलाओं का मामला प्रकाश में आया है, जिन्होंने 2021 व 2023 के बीच 53 बच्चों को जन्म दिया और 9 बार उनकी नसबंदी हुई।
सुनीता सिंह (55), मछला देवी (45) व राजकुमारी (44) को भी नहीं मालूम कि उन्होंने यह चमत्कार किया है और इसके लिए उन्हें 90,000 रूपये से अधिक सरकार ने जननी सुरक्षा योजना व महिला नसबंदी पहल योजनाओं के तहत दिए हैं। इन योजनाओं में आमतौर से ग्रामीण डिलीवरी के लिए 1,400 रूपये, 1,000 रूपये शहरी डिलीवरी के लिए और 2,000 रूपये नसबंदी के लिए आर्थिक सहयोग दिया जाता है।
सरकारी योजनाओं में घोटाले और कैश ट्रांसफर की समस्या
यह स़िर्फ एक केंद्र की कहानी है और वह भी अभी अधूरी ही है। अनुमान यह है कि देश के अन्य अनेक केंद्रों पर भी इस किस्म के घोटाले हो रहे होंगे क्योंकि इस कोशिश में बहुत लोग लगे रहते हैं कि सरकारी योजनाओं का लाभ हकदारों तक पहुंचने की बजाय उनकी जेब में चला जाये। यह सब सरकारी कर्मचारियों व दलालों की सांठगांठ से होता है और दिलचस्प यह है कि सरकारी कर्मचारी ही इसका पर्दाफाश करते हैं।
बहरहाल, महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या कैश ट्रांसफर जन स्वास्थ्य बेहतर करने का विकल्प है? यह प्रश्न इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि अब लगभग सभी चुनाव कैश ट्रांसफर के वायदों पर लड़े जा रहे हैं, जिन्हें मुफ्त की रेवड़ियां भी कहा जाता है। सोचने की बात यह भी है कि क्या गरीबों की पहचान का दुरूपयोग करके भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी केवल स्वास्थ्य योजनाओं में ही घोटाला कर रहे होंगे या अन्य कल्याणकारी योजनाओं का भी यही हाल है?
पूर्व में हम बिहार का चारा घोटाला, अनेक राज्यों में मिड-डे मील घोटाले, सरकारी योजना का लाभ उठाने के लिए विवाहितों को कुंवारा दिखाकर उनका पुन: विवाह करा देना आदि देख चुके हैं। बहरहाल, जो बातें प्रकाश में आ रही हैं उनसे मालूम होता है कि गांवों में तथाकथित समाजसेवी महिलाओं का बैंक खाता इस वायदे से खुलवाता है कि उन्हें सरकारी लाभ मिलेगा।
इन खातों को संबंधित महिलाएं कभी ऑपरेट नहीं करती हैं। फिर सरकारी कागज़ों में चढ़ा दिया जाता है कि इन महिलाओं ने बच्चे को जन्म दिया है या इनकी नसबंदी हुई । फलस्वरूप इनके खाते में सरकारी योजनाओं का पैसा ट्रांसफर हो जाता है, जिसे निकालकर घोटालेबाज़ आपस में बांट लेते हैं।
कल्याण योजनाओं में घोटाले और डिजिटल बदलाव की समस्या
जिनके नाम पर यह घोटाला होता है उन्हें कुछ नहीं मिलता बल्कि उन्हें तो अक्सर मालूम भी नहीं होता कि उनके नाम का दुरूपयोग किया जा रहा है। अब सबसे पहले वही पुराना सवाल – इस प्रकार की योजनाओं का वार्षिक ऑडिट कितना ठोस व ईमानदारी से होता है? यह कौन चेक कर रहा है कि यह पैसा कहां जा रहा है? गौरतलब है कि भारत की सामाजिक कल्याण योजनाओं में डिजिटल परिवर्तन लाने का उद्देश्य बीच में से दलालों को निकालना था ताकि सीधे लाभार्थी तक कैश पहुंच सके लेकिन जिन लोगों तक इस लाभ को पहुंचाना था उनमें टेक साक्षरता की स्थिति दयनीय है, जिसका अर्थ है कि डाटा एंट्री की टेक दुकानें नई दलाल बन गई हैं।
डिजिटलीकरण ने कल्याण प्रािढया को व्यक्ति से ऑनलाइन एप्लीकेशन में बदल दिया, जिससे सरकार और लाभार्थी के बीच का सीधा संपर्क हट गया – नतीजतन घोटालेबाजों के लिए शिकार करना आसान हो गया। दूसरी समस्या योजनाओं की भरमार है। केंद्र सरकार 2024 से मातृत्व स्वास्थ्य के लिए 12 योजनाएं चला रही है।
जननी स्वास्थ्य योजना तो 2005 से चल रही है, जिसका फायदा भी हुआ है कि मातृत्व मृत्यु दर (मातृत्व मृत्यु प्रति लाख जीवित जन्म) 384 (2000) से घटकर 97 (2020) रह गई है -लेकिन उत्तर प्रदेश में भारत के मातृत्व मृत्यु दर का बोझ 35 प्रतिशत है। इससे ज़ाहिर है कि लीकेज को रोका नहीं जा सका है। इतनी सारी योजनाओं के होने के बावजूद हाल के दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान गर्भवती महिलाओं के लिए अतिरिक्त कैश ट्रांसफर का वायदा किया गया था।
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चुनावी वायदों और कैश ट्रांसफर की राजनीति
बीजेपी ने गर्भवती महिला को 21,000 रूपये देने का वायदा किया है। यह मिलेगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता। हर महिला के लिए प्रतिमाह 2500 रूपये का भी वायदा है और लड़की की शादी करते समय 1,00,000 रूपये का वायदा है। बहरहाल, जो घोटाला प्रकाश में आया है उससे यह प्रश्न भी उठता है कि जन स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक मज़बूत करना या कैश ट्रांसफर करना?
राजनीतिक पार्टियाँ एक ऐसे चुनावी मॉडल की तरफ जा रही हैं जो सार्वजनिक विकास की बजाय निजी लाभ को वरीयता देता है। इसके गंभीर परिणाम होने जा रहे हैं – दोनों लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए और अर्थव्यवस्था के लिए भी। सबसे पहली बात तो यह है कि हम सीधे कैश ट्रांसफर टेक सफलता का दूसरा पहलू देख रहे हैं, जिसने स्थायी तौरपर राज्य का नागरिकों से संपर्क को बदल दिया है।
राजनीतिक पार्टियों और नागरिकों के बीच में यह अनैतिक व्यवस्था स्थापित हो गई है कि अगर आपने मेरे साथ कुछ ऐसा किया तो मैं भी आपके साथ ऐसा ही कुछ करूंगा यानी अगर आप वोट देंगे तो आपको कैश मिलेगा। न सिर्फ चुनाव जीतने के लिए हर वैध-अवैध हथकंडा अपनाया जाता है बल्कि सत्ता में आने के बाद राज्य के खज़ाने में गोता लगाकर, सभी मौलिकताओं को एक किनारे लगाते हुए, मुफ्त की रेवड़ियां बाँट दी जाती हैं। बस चुनावी राजनीति ही अपने आपमें अंतिम लक्ष्य बनकर रह गया है।
अपना काम बनता, भाड़ में जाये जनता। दूसरा यह कि इन मुफ्त की रेवड़ियों के लिए फंड्स कहां से आयेंगे? गौरतलब है कि महाराष्ट्र के संदर्भ में नितिन गडकरी ने कहा था कि महिलाओं को जो मुफ्त में कैश ट्रांसफर किया जा रहा है उससे सरकार के कल्याणकारी कार्पाम प्रभावित होंगे।
-डॉ.अनिता राठौर
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