जहां दरवाजे हैं, पर आवाज़ें नहीं

फ्लैट संस्कृति ने दीवारें इतनी ऊंची कर दी हैं कि अब दिलों तक रिश्तों की धूप नहीं पहुंचती। बालकनी में अमेज़न से मंगाया हुआ आर्टिफिशियल बोनसाई पौधा। संवेदनायें वॉलपेपर पर लगी तस्वीर जैसी खूबसूरत पर नकली सी। दरवाजे से वह आवाज़ आनी तो बंद ही हो गई जिसमें पड़ोसन कहा करती थी- बहनजी! एक कटोरी चीनी देना ज़रा। और इस तरह दरवाजे पर ही खड़े-खड़े घंटों संवाद हुआ करता था पर अब वहां सन्नाटा है और एक वीडियो डोरबेल लगी है। पहले पीन पर चेहरा देखो, फिर तय करो कि इनसे मिलना भी है या फिर ना मिलने का कोई अच्छा सा बहाना बनाना है।

आंगन कभी घर का केंद्र हुआ करता जहां दादी सुबह-सुबह तुलसी को पानी देती थीं, बच्चे धींगा-मस्ती करते थे और बिल्लियां दूध चुराने की कोशिश में लगी रहती थीं। आंगन में कभी बच्चे रस्सी कूदते थे, अब फ्लैट में स्पीकर से म्यूजिक पर धमाल और नीचे वॉचमैन की शिकायत आती है- मैडम बच्चे को काबू करो। अब आंगन की जगह लॉबी नाम का एरिया है जहां 55 इंच की एलईडी, जिसके चारों ओर पूरा परिवार एक-दूसरे की पीठ देखता है… चेहरे नहीं।

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आधुनिक जीवनशैली में रिश्तों की बदलती परिभाषा

सब मोबाइल पर झुके हैं। यह लॉबी फर्नीचर का शोरूम लगती है। वहां कांच की मेजें हैं जिस पर न बातचीत टिकती है न चाय के छींटे। अगर बच्चा जोर से हंस दे तो माँ चुप कराती है, कहती है कि सोसायटी वाले क्या कहेंगे? वैसे भी अब समाज नहीं है, सोसायटी है। रिश्ते अब चाय से नहीं चार्जर से चलते हैं। कभी नानी-दादी कहानियां सुनाती थीं अब नेटफ्लिक्स कहानी दिखाता है और वह भी स्किप इंटरो के साथ।

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घरों में प्यार भले कम हो पर अगर इंटरनेट बंद हो जाये तो पूरा परिवार एकजुट होकर राउटर को गाली देता है। कुल सार यह है कि अब आंगन का सूरज एलइडी से चमकता है और रिश्ते वाई-फाई की ताकत पर टिके हैं। कभी घरों में बाबा-दादी आ रहे हैं की खुशी होती थी पर अब कूरियर वाले को आता देख ज़्यादा खुशी होती है। पहले मोहल्ले-गलियों में दूधवाले और दर्जी तक का हिसाब मुंहजबानी चलता था पर अब तो हाथ की हाथ गूगल पे या पेटीएम होता है।

कभी घरों की खिड़कियां हवा के आने और दुनिया झांकने का जरिया होती थीं पर अब खिड़कियों पर मोटा पर्दा इतना कसकर जड़ा जाता है कि नज़ारा तो दूर हवा भी पासवर्ड मांगती है। नज़ारे अब पीन सेवर में हैं और हवा एयर प्यूरीफायर में।

एक बर की बात है अक सुरजे मास्टर नै बूज्झी- बताओ बारिश होण पै सबतै घणी खुशी किसनै होवै? नत्थू बोल्या- जी खिड़की दरवाज्यां नै। मास्टर बोल्या वा क्यूकर? नत्थू बोल्या- जी बरसात होण पै खुशी के मारे सारे खिड़की दरवाज्जे फूल ज्यै हैं।

-शमीम शर्मा

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