सार्वजनिक बैंक क्यों नहीं देते बेहतर ब्याज?

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एलआईसी में मौजूद क्रमिक नामांकन की अवधारणा से संकेत लेते हुए, भारत सरकार ने 15.04.2025 के भारत के राजपत्र के माध्यम से बैंकिंग लॉज़ एमेंडमेंट एक्ट 2025 अधिसूचित किया, जिसमें धारा 10 से 13 के तहत बैंकों के सभी खातों और लॉकरों में चार तक क्रमिक नामांकन की सुविधा दी गई है। यह सुविधा बहुत उपयोगी है; क्योंकि यदि खाता धारक के निधन से पहले पहला नामांकित व्यक्ति मर जाए, तो स्वत दूसरा नामांकित बन जाएगा और इसी प्रकार चौथे तक बिना बार-बार बैंक जाकर नामांकन बदलवाए। यह सुविधा अब सभी सरकारी बचत योजनाओं में भी लागू की जानी चाहिए।

बेहतर ब्याज देने वाली सरकारी बचत योजनाएं बैंकों के माध्यम से भी उपलब्ध होनी चाहिएं क्योंकि सरकार की कई ऐसी बचत योजनाएं हैं, जो बैंकों की फिक्स्ड डिपॉज़िट की तुलना में अधिक ब्याज देती हैं। लेकिन इनमें से केवल दो योजनाएं ही सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में उपलब्ध हैं- एक वरिष्ठ नागरिक बचत योजना और दूसरी पब्लिक प्रोविडेंट फंड। ये भी क्रमिक नामांकन जैसी हाल में शुरू हुई महत्वपूर्ण सुविधा के बिना, जो अब निजी व सरकारी दोनों प्रकार के बैंकों के खातों और लॉकरों में लागू की गई है। जबकि अन्य कई सरकारी योजनाएं जैसे- सुकन्या समृद्धि योजना, राष्ट्रीय बचत पत्र, किसान विकास पत्र, महिला सम्मान बचत प्रमाणपत्र और पोस्ट ऑफिस मासिक आय योजना बैंकों की एफडी से बेहतर ब्याज देती हैं, पर ये फिलहाल केवल डाकघरों में ही उपलब्ध हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का हो बेहतर उपयोग

जनहित में यह आवश्यक है कि ये सभी सरकारी बचत योजनाएं- सुकन्या समृद्धि योजना, महिला सम्मान बचत प्रमाणपत्र और मासिक आय योजना भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की सभी शाखाओं में उसी प्रकार उपलब्ध हों जैसे सुकन्या समृद्धि योजना और पीपीएफ उपलब्ध हैं। इसके बाद बैंकों को इन योजनाओं के माध्यम से अधिक जमा (डिपॉज़िट) लाने हेतु पुरस्कार/प्रोत्साहन देकर प्रेरित किया जा सकता है। चूंकि डाकघरों की संख्या घट रही है। इसलिए बैंकों में योजनाएं और जरूरी हैं। कई क्षेत्रों में डाकघरों की संख्या तेज़ी से घट रही है।

उदाहरण के लिए, पुरानी दिल्ली (पिन 110006) जैसे व्यावसायिक केंद्र में चांदनी चौक, दरीबा, चावड़ी बाजार आदि के पोस्ट ऑफिस बंद हो चुके हैं। इससे लोगों को अपनी डाक-संबंधी आवश्यकताओं और सरकारी बचत योजनाओं में निवेश हेतु कश्मीरी गेट स्थित मुख्य डाकघर (जीपीओ) में भागना पड़ता है। ऐसी स्थिति में सभी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की शाखाओं में सरकारी बचत योजनाएं उपलब्ध कराना और भी जरूरी हो गया है। इसके अतिरिक्त, आरबीआई बांड भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की सभी शाखाओं के माध्यम से उपलब्ध होने चाहिए।

एलआईसी और सामान्य बीमा काउंटर भी हों

कई सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक निजी बीमा कंपनियों के साथ जुड़कर उनकी पॉलिसियां बेच रहे हैं, जो उचित नीति नहीं है जबकि देश में सार्वजनिक क्षेत्र की एलआईसी उपलब्ध है। प्रत्येक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक की हर शाखा को एलआईसी की किसी इकाई से अनिवार्य रूप से संबद्ध किया जाना चाहिए। इसी प्रकार सामान्य बीमा में भी सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों से अनिवार्य संबद्धता होनी चाहिए।

उद्देश्य सुरक्षित व भरोसेमंद सार्वजनिक क्षेत्र को बढ़ावा देना होना चाहिए जो आरटीआई के तहत जनता के प्रति जवाबदेह हो। साथ ही बैंक शाखाओं में स्पीड पोस्ट बुकिंग काउंटर भी होने चाहिए। वास्तव में डाक सेवाओं की गुणवत्ता में कमी और पोस्ट ऑफिसों की संख्या घटने से लोग व व्यवसायिक संस्थान निजी कूरियर सेवाओं की ओर जा रहे हैं। कम से कम बड़ी/विशाल बैंक शाखाओं में स्पीड पोस्ट बुकिंग काउंटर बनाए जा सकते हैं, जहां डाक विभाग बुकिंग पर कुछ कमीशन दे। इससे- डाक विभाग का कार्यभार घटेगा और राजस्व बढ़ेगा, जनता को पास में सुविधा मिलेगी, बैंक को भी कमीशन मिलेगा इसलिए नुकसान नहीं होगा।

सभी सरकारी बचत योजनाओं में भी क्रमिक नामांकन लागू हो-

एलआईसी में मौजूद क्रमिक नामांकन की अवधारणा से संकेत लेते हुए, भारत सरकार ने 15.04.2025 के भारत के राजपत्र के माध्यम से बैंकिंग लॉज़ एमेंडमेंट एक्ट 2025 अधिसूचित किया, जिसमें धारा 10 से 13 के तहत बैंकों के सभी खातों और लॉकरों में चार तक क्रमिक नामांकन की सुविधा दी गई है। यह सुविधा बहुत उपयोगी है; क्योंकि यदि खाता धारक के निधन से पहले पहला नामांकित व्यक्ति मर जाए, तो स्वतः दूसरा नामांकित बन जाएगा और इसी प्रकार चौथे तक बिना बार-बार बैंक जाकर नामांकन बदलवाए। यह सुविधा अब सभी सरकारी बचत योजनाओं में भी लागू की जानी चाहिए।

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डिमैट एकाउंट की सुविधा

सभी सार्वजनिक क्षेत्र बैंक शाखाओं में डिमैट अकाउंट खोलने की सुविधा-क्रमिक नामांकन सहित होनी चाहिए। कम से कम चुनिंदा शाखाओं में (यदि सभी में नहीं) डिमैट अकाउंट खोलने की सुविधा तो होनी चाहिए, क्रमिक नामांकन के साथ। दुर्भाग्यपूर्ण है कि सेबी निवेशकों की भारी मांग के बावजूद डिमैट अकाउंट में क्रमिक नामांकन लागू करने से हिचक रहा है। सेबी द्वारा जिन चार संस्थाओं से सुझाव मांगे गए थे, उनमें से दो ने डिमैट में क्रमिक नामांकन के पक्ष में राय दी थी। निजी कंपनियों/फर्मों में जमा राशि पर भी क्रमिक नामांकन अनिवार्य हो।

अब समय आ गया है कि निजी कंपनियों/फर्मों आदि में की गई सभी जमाओं पर भी क्रमिक नामांकन अनिवार्य किया जाए। नामांकन फॉर्म की प्रति ऑडिट रिपोर्ट के साथ अनिवार्य रूप से जुड़नी चाहिए। आयकर रिटर्न फॉर्म में ऐसी घोषणा का कॉलम होना चाहिए कि जमाकर्ताओं से नामांकन फॉर्म लिया गया है। यह व्यवस्था जमाकर्ताओं के धन की सुरक्षा करेगी। साथ ही यह नामांकन पुराने/मौजूदा डिपॉज़िट पर भी अनिवार्य किया जाए। क्रमिक नामांकन से कोर्ट केस घटेंगे- समय और पैसा बचेगा। यदि क्रमिक नामांकन को बैंक खातों के साथ-साथ डिमैट खातों, सरकारी बचत योजनाओं और निजी फर्मों/कंपनियों के डिपॉज़िट में भी लागू/अनिवार्य किया जाए, तो अदालतों में मुकदमों की संख्या काफी घटेगी। इससे लोगों का समय, पैसा और संसाधन अनावश्यक मुकदमेबाज़ी में खर्च होने से बचेंगे।

जरूरत पड़े तो नया कानून भी बनाया जाए

यदि डिमैट, सरकारी बचत योजनाओं और निजी जमा योजनाओं में क्रमिक नामांकन लागू करने हेतु नए कानून की आवश्यकता हो, तो वह बनाया जाए। यह सभी संबंधित पक्षों के हित में होगा, क्योंकि नामांकित के मृत्यु होने पर बार-बार नामांकन बदलवाने की औपचारिकताओं में जो सरकारी/बैंकिंग मानव-घंटे खर्च होते हैं, वे बचेंगे। क्रमिक नामांकन को लेकर आशंकाएं उचित नहीं हैं।

कुछ अपवाद मामलों की व्यावहारिक कठिनाइयां बड़े जनहित में इस सुविधा को रोकने का कारण नहीं बननी चाहिए। उदाहरण के लिए बहुत दुर्लभ स्थिति में पहला नामांकित व्यक्ति डिमेंशिया जैसी गंभीर समस्या से पीड़ित हो तो वह धन प्राप्त करने में अक्षम हो सकता है। पर ऐसा जोखिम वर्तमान व्यवस्था में भी हो सकता है। इसका समाधान यह है कि जमाकर्ता को विकल्प दिया जाए या क्रमिक नामांकन अपनाएं या पुरानी व्यवस्था में रहें, जहां विभिन्न नामांकितों को धन/संपत्ति का प्रतिशत दिया जा सकता है।

सुभाष चंद्र अग्रवाल
सुभाष चंद्र अग्रवाल

नॉमिनी और कानूनी उत्तराधिकारी में अंतर

नामित और कानूनी उत्तराधिकारी में अंतर के विषय में कानून की स्थिति स्पष्ट है- नामित व्यक्ति ट्रस्टी होता है, चाहे क्रमिक नामांकन हो या पुरानी व्यवस्था। यह जमाकर्ता की जिम्मेदारी है कि वह ऐसे व्यक्ति/लोगों को नामांकित करे जिन पर वह भरोसा करता है कि मृत्यु के बाद वे धन/संपत्ति कानूनी उत्तराधिकारियों तक पहुंचाएंगे। बैंकों या संस्थाओं पर यह जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती कि वे नामांकित से धन लेकर कानूनी उत्तराधिकारियों तक पहुंचाने को सुनिश्चित करें।

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