शांति अधिनियम से परमाणु विकास में मदद मिलेगी?

जिस तरह से आधुनिक आईफ़ोन बनाये जाते हैं कि एक पुर्जा यहां, दूसरा वहां और फिर एक जगह उनको एकत्र करना, ऐसे ही एसएमआर बनाये जाते हैं। वह बड़े रिएक्टर की तुलना में प्रति यूनिट कम बिजली का उत्पादन करते हैं। साथ ही वह परमाणु वेस्ट की समस्या का हल भी नहीं करते हैं, हालांकि कुछ में खतरे के समय स्वतः बंद होने के डिज़ाइन हैं। इनसे बिजली का उत्पादन तो हो जायेगा, लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि ईंधन के रूप में थोरियम इस्तेमाल करने की भारतीय तलाश में मदद मिले।

विपक्ष ने लोकसभा से वाकआउट करते हुए अनेक बार आग्रह किया कि शांति विधेयक (सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑ़फ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफोर्मिंग इंडिया बिल) को संसदीय समिति के पास समीक्षा के लिए भेज दिया जाये, लेकिन सरकार ने इसे जल्दबाज़ी में पारित करा दिया और अब यह परमाणु ऊर्जा क़ानून, 1962 व परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम, 2010 (सीएलएनडीए) की जगह परमाणु गतिविधि का संचालन करेगा।

शांति विधेयक के पारित किये जाने के दो दिन बाद यानी 18 दिसंबर 2025 को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने 3000 पन्नों से अधिक के नेशनल डिफेंस ऑथराइज़ेशन एक्ट (एनडीएए) पर हस्ताक्षर किये, जोकि हर साल (वित्तीय वर्ष अक्तूबर 2025 से सितंबर 2026) पेश की जाती है। इसमें अक्सर भारत का जि़क्र रक्षा व सुरक्षा मामलों के संदर्भ में किया जाता है, लेकिन 2016 के बाद पहली बार पृष्ठ 1912 पर 2008 के भारत-अमेरिका परमाणु समझौते और परमाणु नागरिक क्षतिपूर्ति नियमों का उल्लेख किया गया है।

शांति कानून में निजी कंपनियों की भागीदारी और देयता सीमा तय

एनडीएए में कहा गया है कि पोटरी ऑ़फ स्टेट …अमेरिका-भारत सुरक्षा संवाद के अंतर्गत भारत सरकार के साथ मिलकर एक संयुक्त परामर्श तंत्र स्थापित करेंगे व उसे बनाये रखेंगे 2008 के भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को लागू किये जाने का मूल्यांकन करने के लिए और …(भारत के) परमाणु क्षतिपूर्ति नियमों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप करने के लिए। गौरतलब है कि शांति क़ानून, जो भारत के परमाणु सेक्टर में निजी हिस्सेदारी की अनुमति देता है, में क्षतिपूर्ति नियमों को आसान कर दिया गया है और परमाणु घटना के लिए ऑपरेटर की देयता (लायबिलिटी) को आसान करते हुए उसकी सीमा 3,000 करोड़ रूपये निर्धारित की गई है।

हालांकि इस परिवर्तन से परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व के संदर्भ में भारत विएना कन्वेंशन के करीब हो गया है और परमाणु नुकसान के लिए पूरक मुआवजा कन्वेंशन के अनुरूप भी, लेकिन यह ऐसी व्यवस्था है जिसे एनडीएए 2026 प्रोत्साहित करता है, इसलिए विपक्ष ने भारत सरकार की आलोचना करते हुए शांति अधिनियम को पोता-संचालित बताया है। दूसरे शब्दों में सीएलएनडी एक्ट 2010 के मुख्य प्रावधानों की तिलांजलि देकर शांति विधेयक जल्दबाज़ी में इसलिए लाया गया, कांग्रेस सांसद जयराम रमेश के अनुसार, ताकि कभी अच्छे दोस्त रहे (ट्रंप) से पुन शांति स्थापित की जा सके यानी अमेरिका से व्यापार समझौता किया जा सके, जिसके बारे में कुछ दिन पहले ही अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने कहा था कि भारत द्वारा दिये गये प्रस्ताव अब तक अमेरिका को मिले सबसे अच्छे प्रस्ताव हैं।

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शांति अधिनियम से परमाणु क्षेत्र में निजी व विदेशी निवेश का रास्ता खुला

शांति, जैसा कि ऊपर बताया गया है, निजी कम्पनियों की हिस्सेदारी को प्रोत्साहित करता है, जिससे भारत के परमाणु सेक्टर में विदेशी फंड्स के निवेश की संभावना बढ़ जाती है। वर्तमान में सिर्फ पब्लिक सेक्टर ही भारत में परमाणु पॉवर प्लांट्स बना और चला सकता है। भारत की योजना अपनी वर्तमान परमाणु क्षमता 8.8 जीडब्लू (या कुल स्थापित का लगभग 1.5 प्रतिशत) को बढ़ाकर 2047 तक 100 जीडब्लू करने की है और इस तरह परमाणु शक्ति से अधिक बिजली बनानी है, जो िफलहाल 3 प्रतिशत है।

राज्य के स्वामित्व वाले परमाणु ऊर्जा सेवाओं ने प्रोजेक्ट किया है कि शेष के साथ वह लगभग 54 जीडब्लू जोड़ेंगे, संभवत प्राइवेट कम्पनियों से। चूंकि परमाणु ऊर्जा का उतार-चढ़ाव वाला इतिहास परमाणु बमों से भी जुड़ा हुआ है, इसलिए परमाणु ईंधन (यूरेनियम) को इधर से उधर ले जाने पर सख्त निगरानी रहती है; क्योंकि यह आशंका रहती है कि उसे हथियार-ग्रेड के प्लूटोनियम बनाने के लिए डिलीवर न कर दिया जाये।

परमाणु प्लांट्स चलाने के हर पहलू में अत्यधिक सावधानी व पाबंदी इसलिए भी बरती जाती है ताकि थ्री माइल आइलैंड (1979), चेर्नेबिल (1986), फुकुशीमा (2011) जैसी दुर्घटनाओं से बचा जा सके। वर्तमान में वैश्विक सहमति यह है अगर कोई दुर्घटना घटित होती है, तो प्लांट ऑपरेटर को नुकसान के समतुल्य पीड़ितों को मुआवजा आवश्यक रूप से देना होगा। सहमति यह है कि पीड़ितों को मुआवजा तुरंत देना होगा, बिना यह सुनिश्चित किये कि दुर्घटना का कारण क्या था और उसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? लेकिन इसके बाद अगर प्लांट ऑपरेटर यह स्थापित कर देता है कि गलती उसके प्रबंधकों की नहीं बल्कि खराब उपकरणों की थी, जिससे दुर्घटना हुई, तो वह सप्लायर से भरपाई कर सकता है।

भारत-अमेरिका परमाणु समझौते से जुड़ी पुरानी आपत्तियां हुईं कमजोर

सीएलएनडी एक्ट के तहत ऑपरेटर उपकरण के सप्लायर से तीन सूरतों में भरपाई कर सकता था- 1. अगर सप्लायर व ऑपरेटर के बीच स्पष्ट समझौता है, 2. अगर यह साबित हो जाये कि परमाणु दुर्घटना सप्लायर या उसके खराब उपकरणों के कारण हुई है, और 3. अगर परमाणु दुर्घटना जान-बूझकर परमाणु नुकसान करने का नतीजा है। शांति में दूसरे प्रावधान को निकाल दिया गया है।

भारत-अमेरिका 2008 समझौते के तहत भारत को यूरेनियम व अंतरराष्ट्रीय परमाणु टेक्नोलॉजी हासिल करने की अनुमति थी, लेकिन इसके बावजूद 1974 व 1998 के परमाणु परीक्षणों के कारण अमेरिका व फ्रांस के रिएक्टर निर्माता संकोच करते थे क्योंकि सप्लायर के रूप में (आशंकित दुर्घटना की स्थिति में) उन्हें अरबों डॉलर मुआवज़े में देने पड़ सकते थे। दूसरे प्रावधान और शब्द सप्लायर को हटाने से यह समस्या लुप्त हो जाती है।

विरोधाभास देखिये कि 2000 में जब बीजेपी विपक्ष में थी तो उसने इस दूसरे प्रावधान को शामिल करने पर बल दिया था, जिसका उल्लेख कांग्रेस सांसदों ने बहस के दौरान किया। इस पर बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार की संक्षिप्त प्रतिक्रिया यह थी कि परमाणु टेक्नोलॉजी बदल गई है और बदलते समय की ज़रूरत नई सच्चाइयों के अनुरूप ढलना होता है। सीएलएनडी एक्ट के तहत परमाणु दुर्घटना के पीड़ित परमाणु प्लांट ऑपरेटर से 1,500 करोड़ रूपये तक का मुआवजा ले सकते थे।

भारत की परमाणु रणनीति में एसएमआर पर बढ़ती निर्भरता

इससे अधिक नुकसान की सूरत में केंद्र बीमा पूल के ज़रिये 4,000 करोड़ रूपये तक का सहयोग देता। शांति ने ग्रेड आधारित दृष्टिकोण अपनाया है। सिर्फ 3,600 एमडब्लू से ऊपर वाले प्लांट ऑपरेटर्स पर 3,000 करोड़ रूपये तक का जुर्माना हो सकता है, लेकिन 3,600 एमडब्लू से 1,500 एमडब्लू तक यह राशि 1,500 करोड़ रूपये है; 1,500 एमडब्लू-750 एमडब्लू के लिए 750 करोड़ रूपये; 750 एमडब्लू-150 एमडब्लू के लिए 300 करोड़ रूपये और 150 एमडब्लू से नीचे वाले प्लांट्स के लिए 100 करोड़ रूपये।

भारत के सभी प्लांट्स वर्तमान में 3,000 एमडब्लू या उससे कम के हैं। यह कैप या सीमा चिंताजनक है; क्योंकि मुआवजा अक्सर अरबों डॉलर में जाता है, लेकिन सरकार ने यह ग्रेडिंग निजी कम्पनियों को आकर्षित करने के लिए की है। ऐसा प्रतीत होता है कि अपने परमाणु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए भारत स्माल मॉड्युलर रिएक्टर्स (एसएमआर) पर निर्भर होना चाहता है। फ्रांस व अमेरिका में जो रिएक्टर्स हैं यह उसका छोटा रूप हैं जिनमें एनरिच्ड यूरेनियम-235 की ज़रूरत होती है (जिसका भारत में अभाव है) और वह सभी रेडियोएक्टिव तत्व उत्पन्न करता है- प्लूटोनियम, स्ट्रोंटियम आदि।

नरेंद्र शर्मा
नरेंद्र शर्मा

जिस तरह से आधुनिक आईफ़ोन बनाये जाते हैं कि एक पुर्जा यहां, दूसरा वहां और फिर एक जगह उनको एकत्र करना, ऐसे ही एसएमआर बनाये जाते हैं। वह बड़े रिएक्टर की तुलना में प्रति यूनिट कम बिजली का उत्पादन करते हैं। साथ ही वह परमाणु वेस्ट की समस्या का हल भी नहीं करते हैं, हालांकि कुछ में खतरे के समय स्वतः बंद होने के डिज़ाइन हैं। इनसे बिजली का उत्पादन तो हो जायेगा, लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि ईंधन के रूप में थोरियम इस्तेमाल करने की भारतीय तलाश में मदद मिले।

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