महिलाएँ : भारत में विशालतम अल्पसंख्यक !
महिलाएँ भारत में विशालतम अल्पसंख्यक हैं – सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बी.वी.नागरत्ना की यह टिप्पणी भारतीय समाज की कड़वी सच्चाई को उजागर करती है। उन्होंने यह टिप्पणी संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने में हो रही देरी पर केंद्र सरकार से जवाब माँगते हुए की। ग़ौरतलब है कि भारत की 48 प्रतिशत अर्थात लगभग आधी आबादी महिलाओं की है। फिर भी, राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन में उनकी आवाज दबी हुई क्यों है?
इसी विडंबना का आईना है – विशालतम अल्पसंख्यक। संख्या में बहुमत, लेकिन अधिकारों, अवसरों और सम्मान में अल्पसंख्यक! यह असंगति है; अंतर्विरोध है! अल्पसंख्यक समुदायों को संविधान विशेष सुरक्षा देता है, लेकिन महिलाओं के लिए ऐसी कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं। लिंग-आधारित भेदभाव इतना गहरा है कि आधी आबादी होकर भी महिलाएँ अल्पसंख्यक बनकर रह गई हैं।
लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व केवल 14% क्यों?
उदाहरणस्वरूप, लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 14 प्रतिशत है, जबकि वैश्विक औसत इससे कहीं अधिक – 27 प्रतिशत है। क्या यह हमारे लोकतंत्र की नींव के ही कमजोर होने का प्रतीक नहीं? यदि आधी आबादी की आवाज संसद तक न पहुँचे, तो नीतियाँ कैसे समावेशी होंगी? आशंका स्वाभाविक है कि 2023 में पारित महिला आरक्षण विधेयक को कहीं जान-बूझकर तो निलंबित नहीं रखा गया है!
कहना न होगा कि महिलाओं की स्थिति को विकसित भारत के हमारे स्वप्न की तरह होना चाहिए। सयानों की मानें तो भारत में हर घंटे कम से कम दो महिलाओं के साथ बलात्कार होता है। शिक्षा में लड़कियों का नामांकन बढ़ा है, लेकिन ड्रॉपआउट दर ऊँची है। रोजगार में भी महिलाओं की भागीदारी अपेक्षा से कम है। राजनीति में तो हालात और भी दयनीय हैं। पंचायतों में 50 प्रतिशत आरक्षण के बावजूद, उच्च स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व सीमित है।
ऐसे में न्यायमूर्ति नागरत्ना का लिंग असमानता को अल्पसंख्यक समस्या के रूप में चिह्नित करना बेहद मानीखेज़ है। महिलाओं के इस हाशियाकरण के बीज समाज की पितृसत्तात्मक संरचना में हैं, जिसने महिलाओं को बहुमत से वंचित कर दिया है। याद करें, विश्वमारी कोरोना ने किस तरह इस असमानता की कुरूपता दर्शाई थी। घरेलू हिंसा के मामले दोगुने हो गए थे! मतलब कि समानता का अधिकार आधी आबादी के लिए अधूरा ही है। यह न केवल राजनीतिक आरक्षण का मुद्दा है, बल्कि सामाजिक न्याय का सवाल है।
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वोट बैंक नहीं, वास्तविक अधिकार चाहिए महिलाओं को
दरअसल सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी तभी कारगर मानी जा सकती है जब यह महिला अधिकार जागरूकता के प्रसार का आधार बने। पारंपरिक से लेकर सोशल मीडिया तक को इस विषय पर मंथन की ज़रूरत है। ताकि युवा पीढ़ी को स्त्री अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके। नीति-निर्माताओं को भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे रहना चाहिए। महिलाओं को आख़िर कब तक वोट बैंक बनाए रखा जाएगा?
चुनाव आए तो सिर पर बिठा लिया; वरना टोकरी में भी जगह नहीं! 33 प्रतिशत आरक्षण को यथाशीघ्र अमल में लाया जाना चाहिए। तभी तो लिंग-संवेदनशील कानूनों का जन्म हो सकेगा न! इससे वैश्विक स्तर पर भी भारत की छवि निखरेगी। ध्यान रहे कि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में लैंगिक समानता के लिहाज से भारत बहुत नीचे है! अंतत, सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी अपने आपमें एक आह्वान है – महिलाओं को विशालतम अल्पसंख्यक से बहुमत की मुख्यधारा में लाएँ। हमारा संविधान समानता का वादा करता है, लेकिन उसे अमल में लाना हमारी जिम्मेदारी है। महिलाएँ न केवल माताएँ और बहनें हैं, बल्कि राष्ट्र-निर्माता हैं। यदि वे सशक्त होंगी, तो भारत सशक्त होगा। नारी शक्ति जागे, तभी भारत जागेगा।
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