महिला वोटर : केरलम चुनाव का एक्स फैक्टर
नौ अप्रैल, 2026 को केरलम विधानसभा चुनाव में 140 सीटों पर मतदान होगा। इस चुनाव का सबसे बड़ा एक्स फैक्टर महिला मतदाता हैं। चुनाव आयोग के मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार, कुल 2.71 करोड़ मतदाताओं में 1.39 करोड़ महिलाएं हैं – पुरुषों (1.32 करोड़) से 7 लाख अधिक। उच्च साक्षरता दर (94 प्रतिशत से ऊपर) और सामाजिक जागरूकता के कारण महिलाओं की मतदान भागीदारी पुरुषों के बराबर या ज्यादा रही है।
2016 में 88 सीटों पर महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा वोट डाले थे। 2021 में यह संख्या 73 सीटों पर रह गई और राज्यव्यापी लिंग-गैप लगभग शून्य हो गया, लेकिन महिलाएं अब भी निर्णायक बनी हुई हैं। चुनाव के नजरिए से यह साइलेंट फोर्स न केवल मतदान प्रतिशत बढ़ाती है, बल्कि परिणाम भी तय करती है। जगज़ाहिर है कि तीनों मुख्य गठबंधन – सत्तारूढ़ एलडीएफ (सीपीआईएम के नेतृत्व में), विपक्षी यूडीएफ (कांग्रेस के नेतृत्व में) और एनडीए (भाजपा के नेतृत्व में) – महिलाओं को लुभाने के लिए खास रणनीति बना रहे हैं।
एलडीएफ: महिलाओं की भागीदारी 50% और 20 लाख रोजगार
एलडीएफ ने घोषणा-पत्र में महिलाओं की कार्यबल भागीदारी 50 प्रतिशत करने, 20 लाख गृहिणियों को रोजगार देने, कुटुंबश्री को 20 हजार करोड़ का ऋण लिंकेज देने जैसी योजनाएं प्रस्तुत की हैं। यूडीएफ ने इंदिरा गारंटी के तहत केएसआरटीसी बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा, कॉलेज छात्राओं को 1,000 रुपये मासिक, गरीब महिलाओं और विधवाओं को 3,000 रुपये पेंशन और कुटुंबश्री के माध्यम से स्वरोजगार ऋण का ऐलान किया है।
इसी तरह, एनडीए ने भक्ष्य-आरोग्य सुरक्षा कार्ड के तहत गरीब परिवार की महिलाओं को मासिक 2,500 रुपये का रिचार्ज (राशन और दवा), दो मुफ्त एलपीजी सिलेंडर, सुरक्षित राज्य और पेंशन वृद्धि के वादे किए हैं। मतलब यह कि तीनों गठबंधन महिलाओं को कल्याण योजनाओं, पेंशन और आर्थिक सहायता से जोड़ने की होड़ में हैं। क्योंकि तीनों जानते हैं कि केरलम जैसे राज्य में जीत की चाबी महिला वोटरों के हाथ में है।
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33% आरक्षण लागू न होने से पार्टियाँ पुरुष-प्रधान बनीं
फिर भी विरोधाभास साफ है। वह यह कि प्रमुख गठबंधनों ने कुल 420 उम्मीदवारों में केवल 46 महिलाओं को टिकट दिया है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के बावजूद राज्य स्तर पर 33 प्रतिशत आरक्षण लागू नहीं होने और विनेबिलिटी का बहाना देकर पार्टियाँ पुरुष-प्रधान बनी हुई हैं। कहना शायद गलत न हो कि भले ही नारे महिला कल्याण के लग रहे हों, असल प्रतिनिधित्व में महिलाओं को हाशिये पर ही रखा जा रहा है। महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा भी हथियार बना है। एलडीएफ शासन में 2025 तक रेप के 2,952 मामले दर्ज हुए, जो महिलाओं के बीच चिंता का विषय है।
सयाने कह रहे हैं कि केरलम राज्य की महिलाएं जागरूक हैं। वे अब सिर्फ वादों पर नहीं, प्रदर्शन पर वोट करती हैं। इस बार एलडीएफ के कुटुंबश्री ट्रैक रिकॉर्ड, यूडीएफ की नई गारंटियों और एनडीए की केंद्रपोषित योजनाओं (जल जीवन मिशन और पीएम आवास योजना) के बीच त्रिकोणीय लड़ाई है। अगर महिलाएं रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा में ठोस बदलाव देखेंगी, तो एलडीएफ तीसरी बार सत्ता बचा सकता है। लेकिन बेरोजगारी, महंगाई और अपराध बढ़ने की ओर ध्यान गया, तो यूडीएफ को मौका मिल सकता है। एनडीए डबल इंजन सरकार के फायदे गिनवाकर कुछ सीटों पर कब्ज़ा कर सकता है।
अंततः, केरलम का चुनाव राष्ट्रीय संदेश देगा। जहाँ महिलाएं मतदाता के रूप में सबसे मजबूत हैं, वहाँ उन्हें उम्मीदवार के रूप में कमजोर रखना लोकतंत्र की विडंबना है! पार्टियाँ अगर वास्तविक सशक्तिकरण (रोजगार, सुरक्षा और प्रतिनिधित्व) पर ध्यान देंगी, तो ही साइलेंट फोर्स उन्हें पुरस्कृत करेगी; वरना वादे तो हवा में उड़ भी सकते हैं!
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