दुनिया के बाज़ार में भारत!
अपने अप्रैल 2025 के विश्व आर्थिक आउटलुक में, आईएमएफ ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए भारत के जीडीपी विकास पूर्वानुमान को, जनवरी 2025 में अनुमानित 6.5 प्रतिशत से घटाकर, 6.2 प्रतिशत कर दिया। बेशक, यह संशोधन भारत के आर्थिक विस्तार के लिए अपेक्षाओं में थोड़ी कमी का संकेत देता है। लेकिन अच्छी बात यह है कि इस समायोजन के बावजूद, 6.2 प्रतिशत की मजबूत विकास दर भारत को सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनाए रखने के लिए काफी है।
यह पूर्वानुमान भारत की घरेलू ताकत के बारे में आशावाद और वैश्विक प्रतिकूल परिस्थितियों के बारे में सावधानी के बीच संतुलन को दर्शाता है। इसे थोड़ी धीमी लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण विकास दर कहना उचित होगा। सयाने बता रहे हैं कि इस संशोधन की मुख्य वजह है अमेरिकी शुल्क नीतियों से पैदा हुए वैश्विक व्यापार तनाव। फरवरी और अप्रैल 2025 के बीच की गई राष्ट्रपति ट्रंप की शुल्क घोषणाओं ने बहुत बड़ी अनिश्चितताएँ पैदा की हैं।
भारत के लिए (जो कपड़ा, फार्मास्यूटिकल्स और आईटी सेवाओं का एक प्रमुख निर्यातक है) ये शुल्क अहम बाजारों में माँग को कम कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, आईएमएफ द्वारा अनुमानित विकसित अर्थव्यवस्थाओं और उभरते बाजारों में धीमी वृद्धि भी भारतीय वस्तुओं और सेवाओं की वैश्विक माँग को कम कर सकती है। घरेलू स्तर पर, मुद्रास्फीति और राजकोषीय नीति की बाधाएँ भी एक हद तक इसके लिए ज़िम्मेदार हैं, भले इस संशोधन में बाहरी तत्व ज़्यादा हावी हैं।
विकास में नरमी और भारत की नीतिगत रणनीतियाँ
महामारी से दबी हुई माँग के समाप्त होने का भी विकास में अपेक्षित नरमी में योगदान है। लेकिन आईएमएफ ने यह भी माना है कि मजबूत खपत और संरचनात्मक सुधारों से प्रेरित भारत का लचीलापन, इनमें से कुछ चुनौतियों को कम करने में समर्थ है। कहना न होगा कि इन हालात में भारत सरकार को व्यापार व्यवधानों के प्रभाव को कम करने वाली नीतियों की ओर रुख करने की ज़रूरत है।
इस वक़्त भारत का दक्षिण पूर्व एशिया या अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में निर्यात बाजारों में विविधता लाना, प्रोत्साहन के माध्यम से घरेलू खपत को बढ़ावा देना और मैन्युफैक्चर और डिजिटल बुनियादी ढाँचे में सुधारों में तेजी लाना सहायक हो सकता है। मेक इन इंडिया और उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना से आत्मनिर्भरता बढ़ाने में सहायता मिल सकती है।
यह ठीक है कि कम विकास पूर्वानुमान के कारण संभावित रूप से निवेश धीमा हो सकता है। लेकिन, भारत का मजबूत घरेलू बाजार, बढ़ता मध्यम वर्ग और व्यापार करने में आसानी के लिए किए गए सुधार निवेशकों की रुचि बनाए रखने में बड़ा योगदान कर सकते हैं। सेवा क्षेत्र (विशेष रूप से आईटी) संभावित रूप से निर्यात से संबंधित चुनौतियों की भरपाई कर सकता है।
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भारत की वृद्धि दर और बदलते वैश्विक हालात का प्रभाव
रोजगार और सामाजिक प्रभाव की बात करें तो, 6.2 प्रतिशत की सतत वृद्धि खासकर युवा कार्यबल के लिए रोजगार सृजन के लिहाज से काफी अहम है। सरकार को कपड़ा और निर्माण जैसे क्षेत्रों के साथ-साथ स्किल इंडिया जैसे कौशल विकास कार्पामों को समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए प्राथमिकता देनी चाहिए।
कहने का अभिप्राय यह है कि यह विकास दर, थोड़ी कम होने के बावजूद, अभी भी गरीबी में कमी और जीवन स्तर में सुधार का समर्थन करती है। साथ ही, संतोष की बात यह है कि संशोधन के बावजूद, भारत की वृद्धि अधिकांश प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं से आगे है, जो वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में हमारी स्थिति को मजबूत करती है।
रणनीतिक व्यापार समझौते और राजनयिक प्रयास इस बढ़त को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण होंगे। दरअसल, आईएमएफ का पूर्वानुमान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक आर्थिक परिदृश्य महत्वपूर्ण परिवर्तन से गुजर रहा है। बढ़ते संरक्षणवाद, भू-राजनीतिक तनाव और तकनीकी बदलाव व्यापार और निवेश प्रवाह को नया आकार दे रहे हैं।
भारत, अपने जनसांख्यिकीय लाभांश और डिजिटल कौशल के साथ, इन परिवर्तनों का लाभ उठाने के लिए अच्छी स्थिति में है। अंतत यह भी कि पहलगाम हमले के बाद बदलते हालात का असर अभी देखा जाना बाकी है!
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