होलिका-दहन में दिव्य पेड़ों का न करें उपयोग

होलिका दहन ऐसी परंपरा है, जो हमें प्रकृति का सम्मान करना भी सिखाता है। इसलिए सही लकड़ी का चयन करना हमारी जिम्मेदारी है। अगर हम धार्मिक नियमों का पालन करते हुए सूखी लकड़ियों का उपयोग करेंगे, तो पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा। यही होलिका-दहन का सही संदेश है।

लकड़ी को भी जलाने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार, आम, पीपल, बरगद और नीम जैसे फल एवं पूजनीय पेड़ों की लकड़ी को होलिका-दहन में जलाने से बचना चाहिए। ये पेड़ पवित्र माने जाते हैं और लोगों को जीवन देने वाले होते हैं। इनमें देवी-देवताओं का वास माना जाता है। इन पेड़ों की लकड़ी को जलाने से नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए भूलवश भी इन पेड़ों की लकड़ियों को नहीं जलाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त गंदी या अशुद्ध लकड़ी का भी होलिका दहन में नहीं करना चाहिए। होलिका दहन में गंदी, सड़ी-गली या कूड़े में पड़ी लकड़ियों का प्रयोग भी नहीं करना चाहिए। ऐसी लकड़ियां अशुद्ध मानी जाती हैं और पूजा की पवित्रता को कम करती हैं। प्लास्टिक, रबर, कपड़ा या किसी भी तरह का कचरा भी अग्नि में नहीं डालना चाहिए। इससे वातावरण प्रदूषित होता है और धार्मिक नियमों का भी उल्लंघन होता है।

होलिका दहन के लिए सूखी, साफ और प्राकृतिक रूप से गिरी हुई लकड़ियों का ही उपयोग करना सबसे अच्छा माना जाता है। सूखी लकड़ी आसानी से जलती है और इसे शुद्ध माना जाता है। इससे पर्यावरण को भी नुकसान नहीं होता है। गोबर के उपलों का होलिका दहन में उपयोग शुभ माना गया है।

होलिका दहन ऐसी परंपरा है, जो हमें प्रकृति का सम्मान करना भी सिखाती है। इसलिए सही लकड़ी का चयन करना हमारी जिम्मेदारी है। अगर हम धार्मिक नियमों का पालन करते हुए सूखी लकड़ियों का उपयोग करेंगे, तो पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा। यही होलिका-दहन का सही संदेश है।

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