भक्ति के साथ मनाया गया श्री गुरु तेग बहादुर साहिबजी का 350वाँ शहादत दिवस

हैदराबाद, गुरुद्वारा साहिब, सीताफलमंडी प्रबंधन समिति द्वारा सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर साहिबजी का 350वाँ शहादत दिवस शहीदी दिवस के रूप में श्रद्धा व भक्ति के साथ मनाया गया। समिति के चेयरमैन सरदार हरपाल सिंह, कंचन सिंह, अध्यक्ष प्रताप सिंह, महासचिव रणजीत सिंह ने बताया कि नौवें सिख गुरु ने धर्म की वेदी पर देश के लिए सबसे बड़ा बलिदान दिया। यह धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के लिए सबसे बड़े बलिदान का प्रतीक है। यह दिन गहरी श्रद्धा और आभार के साथ मनाया गया।

राज्य के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में सिख श्रद्धालुओं ने विशेष कीर्तन दरबार में भाग लिया और गुरु ग्रंथ साहिबजी (सिखों के पवित्र ग्रंथ) की पूजा-अर्चना की। समागम में शबद कीर्तन और कथाएँ (पवित्र उपदेश) प्रस्तुत किए गए। दमदमा साहिब, साबो की तलवंडी के भाई बिंदर सिंह तंतीसाज़, ज्ञानी हरनेक सिंहजी (माता साहेब वाले) और देश के अलग-अलग हिस्सों के रागी जत्थों ने शबद कीर्तन से भक्तों का मन मोह लिया। रागी जत्थों ने सिख गुरुओं की शिक्षाओं पर प्रकाश डाला, जो राष्ट्रीय एकता, शांति और आपसी भाईचारे के लिए खड़े थे।

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गुरु तेग बहादुरजी का जीवन हिम्मत और नेकी का उदाहरण

रागी जत्थों ने बताया कि गुरु तेग बहादुरजी का जीवन हिम्मत, बिना स्वार्थ के काम करने और नेकी का सबक है। उपदेशकों ने गुरु तेग बहादुर की शिक्षाओं के माध्यम से न्याय, शांति और इंसानी इज्ज़त के संदेश की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि यह सालाना कार्यक्रम न स़िर्फ गुरु साहिब की विरासत का सम्मान करता है, बल्कि इसका मकसद दया और आपसी भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना है। गुरु ने लोगों के धर्म को आजादी से मानने के अधिकारों का बचाव किया। उनके बलिदान और बहादुरी के लिए उन्हें बहुत सम्मान दिया जाता है। लोग उन्हें हिंद की चादर भी कहते हैं।

गुरुजी का दिल्ली के चाँदनी चौक में सिर काट दिया गया, क्योंकि उन्होंने धर्म बदलने से मना कर दिया था। इस तरह वह धर्म के लिए शहीद हो गए। 1675 में उनकी शहादत हिम्मत, दया और दुनिया भर में भाईचारे की हमेशा रहने वाली निशानी है। उनकी शिक्षाएँ आने वाली पीढ़ियों को सच्चाई, न्याय, सहनशीलता और सभी धर्मों का सम्मान करने की प्रेरणा देती हैं। यह ऐसे गुण हैं,जो भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान में शामिल हैं। भाई मतिदास, भाई सती दास और भाई दयाला को भक्ति और हिम्मत के लिए याद किया गया। समागम के समापन के पश्चात सभी को पारंपरिक गुरु का लंगर परोसा गया।

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