मृत्यु से नजरें न चुरायें

इंसानी प्रवृत्ति है कि वह बहुत जल्दी सब कुछ भूल जाता है या अनदेखा कर देता है। समय बीतते-बीतते उसके घावों पर मलहम लग जाता है। वह भली-भाँति जानता है कि जन्म और मृत्यु के बीच की कड़ी है जीवन, जिसे हम सब यत्नपूर्वक जीते हैं, परिश्रम करते हैं और अपनी सुख-सुविधा के सभी साधन जुटाते हैं। कदम-कदम पर अपनी जीत के जश्न मनाते हुए, हमारी प्रसन्नता का किसी प्रकार का कोई पारावार नहीं रहता।

उस समय हम चाहते हैं कि सारी कायनात हमारी ही खुशी में शामिल हो जाए और जब हम दुःखी हों, तब सारा ब्रह्मांड हमारे दुःख में दुःखी होता नजर आता है। दिन-दिन करके मनुष्य जन्म के बाद बचपन से जवानी फिर वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ाता है। तदुपरांत मृत्यु उसका वरण कर लेती है।

वह हर वर्ष अपने बंधु-बांधवों के साथ अपना जन्मदिन मनाकर आनंदित होता है, पर वह भूल जाता है कि उसके जीवन का एक वर्ष और कम हो गया और मृत्यु तक पहुँचने की एक साल की दूरी उसने तय कर ली है। यह इस जीवन की सच्चाई है। हम लोग इस अटल सत्य से नजरें चुराते हैं। बस यही सोचते हैं कि हम आयु प्राप्त हो रहे हैं तथा अधिक अनुभवी बनते जा रहे हैं। महाराज भर्तृहरि ने श्वैराग्यशतकम् ग्रंथ में जीवन के इस सत्य को बहुत ही सुंदर शब्दों में उदाहरण सहित बताया है-

व्याघ्रीव तिष्ठति जरापरितर्जयन्ति।
रोगाश्च शत्रव इव प्रहरन्ति देहम
आयुरू परिस्त्रवतिभिन्नघटादिवाम्भो।
लोकस्तथाप्यहितमाचरतीति चित्रम

शरीर की क्षयशीलता और आयु के नित्य क्षय का ज्ञान

अर्थात् बुढ़ापा बाघ की तरह गुर्राता हुआ सामने खड़ा है, शत्रु की तरह रोग शरीर पर नित्य प्रहार करते हैं, छेद युक्त घट की तरह आयु का नित्य क्षय हो रहा है, लेकिन आश्चर्य है कि फिर भी लोग अहित आचरण कर रहे हैं। इस श्लोक द्वारा यह समझाने का प्रयास किया गया है कि वृद्धावस्था बाघ की तरह गुर्राते हुए, मुँह बाये हमारी ओर बढ़ रही है। हमें इस बाघ से इसलिए डर नहीं लगता, क्योंकि वह सिर्फ गुर्रा रहा है, हमें खाने नहीं आ रहा।

इसलिए उस बाघ को हम अनदेखा करके चैन की बाँसुरी बजाते हैं। उस समय अपने झूठे अहं के कारण हम यह सोचते हैं कि जब वह हमें खाने के लिए आएगा, तब हम उसे भी देख लेंगे। ज्यों-ज्यों आयु बीत रही है और हम वृद्धावस्था की ओर जा रहे हैं, हमारा शरीर रोगों का घर बनता जा रहा है। वह अशक्त हो रहा है। जिस प्रकार घड़े में छेद होने पर पानी बूँद-बूँद करके समाप्त होने लगता है, उसी प्रकार एक-एक दिन करके मनुष्य मृत्यु की ओर कदम बढ़ाता रहता है।

क्षणिक वैराग्य और संसार के आकर्षणों का संघर्ष

फिर भी मृत्यु की गोद में समा जाने के भय को छोड़कर मनुष्य हर प्रकार के अच्छे-बुरे कर्मों को करने में व्यस्त रहते हैं। न उन्हें वृद्ध होने का भय होता है और न ही मृत्यु का डर। इसीलिए करणीय-अकरणीय कार्यों को करके वे प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। किसी की मृत्यु होने पर किसी मृत-शरीर को देखकर क्षणिक वैराग्य मनुष्य के मन में आता है। कभी श्मशान घाट जाने पर संसार की असारता का ज्ञान मन में कुछ पल के लिए अवश्य आता है, पर वह क्षणिक वैराग्य दूसरे ही पल संसार के आकर्षणों से आवेष्टित हो जाता है।

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फिर आरंभ हो जाते हैं, वही दुनिया के आडंबर और ढकोसले। यह सब लिखने का यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि मनुष्य दीन-दुनिया को भूलकर जंगलों में तप करने के नाम पर उसे छोड़ जाए यानी पलायनवादी बन जाए। दुनिया में रहते हुए, मनुष्य को सभी सुख-सुविधाओं का उपभोग करते हुए, जल में कमल की तरह रहना चाहिए।

-चन्द्र प्रभा सूद

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