एनसीईआरटी ने हटाई कक्षा 8 की पाठ्य पुस्तक

नई दिल्ली, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का उल्लेख करने वाले एक अध्याय को लेकर उच्चतम न्यायालय द्वारा कड़ी आपत्ति जताए जाने के बाद आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक को अपनी वेबसाइट से हटा दिया है।
एनसीईआरटी छापी जा चुकी पुस्तक से विवादित अंश को हटाने पर भी विचार कर रही है। हालाँकि, राष्ट्रीय राजधानी में कई स्कूलों ने कहा है कि उन्हें इस बारे में अभी कोई निर्देश नहीं दिया गया है कि पुस्तक के संबद्ध हिस्से को छात्रों को पटाया जाए या नहीं।अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक सिंघवी द्वारा मामले का, तत्काल विचार करने के लिए उल्लेख किए जाने के बाद, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की पीठ ने एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका के बारे में आपत्तिजनक सामग्री का स्वतः संज्ञान लिया।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में न्यायिक भ्रष्टाचार पर एक अध्याय को शामिल करने पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि धरती पर किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने और उसकी सत्यनिष्ठा को धूमिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
इस बीच, यह जानकारी मिली है कि एनसीईआरटी ने अध्याय से संबंधित विषय विशेषज्ञों और इसे मंजूरी देने वाले अधिकारियों की अनुशंसा की समीक्षा के लिए एक आंतरिक बैठक बुलाई है। एनसीईआरटी के अध्यक्ष दिनेश प्रसाद सकलानी ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया के लिए किए गए फोन और भेजे गए संदेशों का जवाब नहीं दिया।
62.40 लाख और जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में 4.70 करोड़ मामले लंबित
परिषद के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने यह कहते हुए टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है। सरकारी सूत्रों ने कहा कि हालाँकि, एनसीईआरटी एक स्वायत्त संस्था है, लेकिन अध्याय जोड़ने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए था। उन्होंने कहा कि यदि भ्रष्टाचार के मुद्दे को पाठ्यपुस्तक में शामिल करना ही था, तो इसे कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका तीनों से संबंधित होना चाहिए था।
पुस्तक के अनुसार, उच्चतम न्यायालय में लगभग 81,000, उच्च न्यायालयों में 62.40 लाख और जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं। यह न्यायपालिका के आंतरिक जवाबदेही तंत्र को रेखांकित करती है और केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण एवं निगरानी प्रणाली के माध्यम से शिकायतें प्राप्त करने की स्थापित प्रक्रिया का उल्लेख करती है। पुस्तक के अनुसार, 2017 और 2021 के बीच इस प्रणाली के माध्यम से 1,600 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुईं। पाठ्यपुस्तक में पूर्व प्रधान न्यायाधीश बी. आर. गवई का भी उल्लेख है, जिन्होंने जुलाई 2025 में कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार के मामलों का लोगों के विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। (भाषा )
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