युद्ध का हासिल : काली बारिश और आग की नदियाँ

ईरान की धरती पर गिरती काली बारिश की बूँदें मनुष्य की मूढ़ता पर आकाश का रुदन हैं। तेल रिसाव से जन्मी आग की नदियाँ धरती को झुलसा रही हैं। इजराइली हमलों के बाद उभरी यह दृश्यावली न केवल एक पर्यावरणीय आपदा है, मानवता की गहरी पीड़ा का प्रतीक भी है। ये दृश्य ईरान-इजराइल के बीच चल रहे युद्ध की क्रूरता को उजागर करते हैं, जहाँ राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ मासूम ज़िंदगियों को राख में बदल रही हैं।

यह संघर्ष उन सिद्धांतों को खुली चुनौती है जो संयुक्त राष्ट्र चार्टर और जेनेवा कन्वेंशन में निहित हैं। सिविलियन सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और मानवीय गरिमा का सम्मान! सब तार-तार! बेशक, ईरान-इजराइल संघर्ष की जड़ें गहरी हैं। लेकिन, हालिया हमलों ने इसे नया अमानुषिक आयाम दिया है। इजराइली वायुसेना के हमलों ने ईरान के तेल क्षेत्रों को निशाना बनाया। परिणामस्वरूप तेल रिसाव हुआ। जो लावे की तरह आसपास के गाँवों को निगल रहा है।

काली बारिश से फसल, जल स्रोत और स्वास्थ्य प्रभावित

जलते तेल के धुएँ और रसायनों से बनी काली बारिश आकाश से गिरकर फसलों, जल स्रोतों और मानव स्वास्थ्य को विषाक्त कर रही है। मानव का क्रोध प्रकृति को भी अपना शिकार बना रहा है। लेकिन इसके पीछे छिपी है हजारों मासूम ग्रामीणों की कहानी। वे किसान, मजदूर और बच्चे इस युद्ध का कोलेटरल डैमेज बन गए हैं। माना कि मानवाधिकार संगठनों एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच ने इन हमलों को अनुपातहीन करार दिया है, लेकिन युद्धजीवी कौमें किसी की सुनती कब हैं ?

इस युद्ध की एक सबसे अधम त्रासदी है – जीवन के अधिकार का निधन। ईरान में हमलों से सैकड़ों नागरिक मारे गए हैं, जिनमें महिलाएँ और बच्चे शामिल हैं। इजराइल का दावा आत्मरक्षा का है। लेकिन जब हमले तेल रिफाइनरियों और बुनियादी ढाँचे पर होते हैं, तो यह सिविलियन जीवन को सीधे प्रभावित करता है। युद्ध में सिविलियन और सैन्य लक्ष्यों में भेद अनिवार्य है। यहाँ यह सीमा मिटा दी गई है। तेल रिसाव से उत्पन्न आग की नदियाँ न केवल संपत्ति को नष्ट कर रही हैं, बल्कि स्वास्थ्य संकट पैदा कर रही हैं। श्वसन रोग, कैंसर और जन्मजात दोषों का खतरा बढ़ रहा है। यह पर्यावरणीय अधिकार का घोर उल्लंघन है। काली बारिश की बूँदों में उन माताओं के आँसू भी ज़रूर होंगे, जिनके बच्चे इस विषाक्त वातावरण में मौत की साँस लेने को मजबूर हैं !

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महिलाओं और बच्चों की स्थिति युद्ध में सबसे दयनी

इस संघर्ष में महिलाओं और बच्चों की स्थिति विशेष रूप से दयनीय है। ईरान में, जहाँ पहले से ही आर्थिक प्रतिबंधों से जनजीवन प्रभावित है, युद्ध ने विस्थापन को बढ़ावा दिया है। हजारों परिवार घर छोड़कर भागने को मजबूर हैं, जो शरणार्थी संकट को जन्म दे रहा है। मानवीय सहायता पहुँचाना मुश्किल हो गया है। भुखमरी और चिकित्सा अभाव बढ़ रहा है। ईरान भी प्रतिहिंसा में, पहले ही, विवेक खो चुका है। इजराइल में ईरानी मिसाइल हमलों से भी सिविलियन ही तो प्रभावित हो रहे हैं। यह एक नारकीय स्थिति है। दोनों पक्षों की आक्रामकता निर्दोषों को पीस रही है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी यहाँ एक बड़ा सवाल है। क्या शक्तिशाली राष्ट्रों के हित मानवाधिकारों से ऊपर हैं? अमेरिका और उसके सहयोगियों का इजराइल को समर्थन और रूस-चीन का ईरान को समर्थन इस युद्ध को वैश्विक स्तर पर मानवता के खिलाफ साजिश बनाता है! कहना गलत न होगा कि यह युद्ध केवल सीमाओं का नहीं, दोनों ओर व्याप्त भीषण अविवेक का है। कल्पना कीजिए एक ईरानी बच्चे की, जो काली बारिश में भीगकर रो रहा है; या एक इजराइली परिवार की, जो सायरन की आवाजों के बीच छिपने को भाग रहा है। ये दृश्य दिलों को छलनी करते हैं।

मानवाधिकार का मूल सिद्धांत है कि हर जीवन मूल्यवान है, चाहे वह किसी भी राष्ट्र का हो। लेकिन यहाँ, राजनीतिक प्रतिशोध में जीवन सस्ते हो गए हैं। तेल रिसाव से बनी आग की नदियाँ प्रतीक हैं उस जलन की, जो घृणा की आग से फैल रही है। यह पर्यावरणीय क्षति लंबे समय तक रहेगी। ज़मीन बंजर हो जाएगी! जल स्रोत विषाक्त! और पीढ़ियां विकलांग! है कोई जो धरती के इन दुश्मनों को समझा सके कि- जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है/ जंग क्या मसअलों का हल देगी। (साहिर लुधियानवी)।

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