जीवन के अधिकार में शांतिपूर्ण अंत का समावेश

ग्यारह मार्च, 2026 का दिन भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में न केवल एक कानूनी मील के पत्थर के रूप में, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और गरिमा के सर्वोच्च सम्मान के रूप में याद रखा जाएगा। इस दिन सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.बी.पारदीवाला और जस्टिस के.वी.विश्वनाथन की पीठ ने हरीश राणा के मामले में जो फैसला सुनाया है, वह जीवन के उस अधिकार को परिभाषित करता है जो मृत्यु के द्वार पर खड़ा होकर गरिमा की माँग करता है।

गौरतलब है कि पिछले 13 वर्षों से बिस्तर पर अचेत पड़े 32 वर्षीय हरीश राणा के लिए जीवन केवल एक जैविक प्रक्रिया बनकर रह गया था। वर्ष 2013 में एक दुखद हादसे के बाद परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट (पीवीएस) में पहुँचे हरीश न तो बोल सकते थे, न देख सकते थे और न ही अपनी पीड़ा व्यक्त कर सकते थे। उनके माता-पिता ने एक दशक से अधिक समय तक न केवल उनकी दिन-रात सेवा की, बल्कि अपने बेटे को उस मूक पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए एक लंबी और थका देने वाली कानूनी लड़ाई भी लड़ी।

कानूनी अस्पष्टताओं को दूर कर परिवारों की राहत सुनिश्चित

सयाने बता रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कई मायनों में कॉमन कॉज (2018) के ऐतिहासिक फैसले का विस्तार है और उन गंभीर कानूनी अस्पष्टताओं को दूर करता है जिन्होंने वर्षों से ऐसे कई परिवारों को अधर में लटका रखा था। अदालत ने इस मामले में एक बेहद अहम कानूनी स्पष्टीकरण दिया है कि क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन यानी ट्यूब के जरिए दिया जाने वाला भोजन कोई बुनियादी मानवीय देखभाल नहीं बल्कि एक चिकित्सीय हस्तक्षेप है।

इसे हटाने की अनुमति देना सक्रिय हत्या नहीं, बल्कि निष्क्रिय इच्छामृत्यु के दायरे में आता है। यह अंतर समझना अनिवार्य है क्योंकि अब तक चिकित्सा जगत और निचली अदालतें इस मुद्दे पर उलझी हुई थीं। कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस पुराने रुख को भी पलट दिया है जिसमें कहा गया था कि इच्छामृत्यु के लिए मरीज का टर्मिनल इलनेस यानी अंतिम चरण की बीमारी से जूझना अनिवार्य है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि यदि कोई व्यक्ति स्थायी रूप से अचेत अवस्था में है और उसके ठीक होने की कोई वैज्ञानिक संभावना शेष नहीं है, तो वह भी गरिमापूर्ण विदाई का उतना ही ह़कदार है जितना कि कैंसर जैसा कोई अंतिम चरण का मरीज।

इस फैसले की दार्शनिक गहराई तब और स्पष्ट हुई जब जस्टिस पारदीवाला ने शेक्सपियर के नाटक हैमलेट के प्रसिद्ध संवाद टु बी ऑर नॉट टु बी का उल्लेख करते हुए इस जटिलता को रेखांकित किया कि कब जीवन को कृत्रिम रूप से खींचना उस व्यक्ति के प्रति क्रूरता बन जाता है। अदालत ने हरीश के माता-पिता के अदम्य धैर्य की सराहना करते हुए जो टिप्पणी की, वह समाज के लिए एक पाठ है।

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अपने बच्चे को जाने देना परित्याग नहीं, सर्वोच्च प्रेम और साहस

कोर्ट ने कहा कि अपने बच्चे को जाने देना परित्याग नहीं, बल्कि सर्वोच्च प्रेम और साहस का प्रतीक है। कानून जब अपनी कठोरता त्यागकर करुणा का चोला पहनता है, तभी वह वास्तव में न्याय कहलाता है। साथ ही, कोर्ट ने प्रक्रियागत जटिलताओं को कम करते हुए 30 दिनों की अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि को समाप्त कर दिया और जिला स्तर पर मेडिकल बोर्ड के गठन को सुव्यवस्थित करने का निर्देश दिया, ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को हरीश के माता-पिता जितनी लंबी और पीड़ादायक प्रतीक्षा न करनी पड़े।

परंतु, यह फैसला एक बार फिर उस कानूनी शून्यता की ओर भी कड़ा इशारा करता है, जिसे भरने की जिम्मेदारी विधायिका की है। बार-बार सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाना हर उस परिवार के लिए संभव नहीं है जो पहले से ही भावनात्मक, शारीरिक और आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट चुका है। समय आ गया है कि विड्रॉल ऑफ लाइफ सपोर्ट पर केंद्र सरकार एक स्पष्ट और व्यापक कानून बनाए, ताकि चिकित्सा विज्ञान और नैतिकता के बीच का यह द्वंद्व किसी व्यक्ति की अंतिम गरिमा को धूल धूसरित न करे।

अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार करके देश को यह संदेश दिया है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल साँसों के चलने की गारंटी नहीं देता, बल्कि इसमें शांति, गरिमा और सम्मान के साथ विदा होने का अधिकार भी समाहित है।

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