… ताकि अनार के दाने चिपके रहें !
खबर है कि चीन की राष्ट्रीय जन कांग्रेस (एनपीसी) जातीय एकता कानून (एथनिक यूनिटी लॉ) को मंजूरी दे रही है। यह कानून चीन की अल्पसंख्यक नीति को नया आयाम देगा। एनपीसी, जिसे रबर स्टैंप संसद कहा जाता है, कभी भी प्रस्तावित विधेयक को अस्वीकार नहीं करती। राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी की पॉलिटब्यूरो ने 2025 में ही इसके ड्राफ्ट पर चर्चा की थी। इस कानून की मुख्य धाराएँ स्पष्ट हैं – स्कूलों में मंदारिन को डिफॉल्ट भाषा बनाना, तिब्बती, उइगुर और मंगोलियन जैसी अल्पसंख्यक भाषाओं को गौण स्थान देना तथा सार्वजनिक साइनबोर्डों पर मंदारिन को प्रमुखता। शी जिनपिंग का यह कथन इसकी दार्शनिक नींव है कि चीन की जातियाँ अनार के दानों की तरह चिपकी रहें!
सयाने बता रहे हैं कि इस कानून में नया कुछ नहीं, बल्कि यह पहले से चले आ रहे चीनीकरण (सिनिसाइजेशन) को वैधता प्रदान करने भर के लिए लाया गया है। शिंजियांग में उइगुरों पर, तिब्बत में बौद्ध संस्कृति पर और इनर मंगोलिया में 2020 के विरोध प्रदर्शनों के बाद मंगोलियन भाषा पर हमले पहले ही हो चुके हैं। यह कानून इनके जबरन आत्मसातीकरण और राजनीतिक नियंत्रण को कानूनी जामा पहनाता है।
शी जिनपिंग का केंद्रीकृत शासन और अल्पसंख्यक दबाव
कहना न होगा कि यह शी जिनपिंग के केंद्रीकृत शासन का चरम है। 14 करोड़ से अधिक अल्पसंख्यक आबादी (हान बहुमत के सामने मात्र 8 प्रतिशत) को एक राष्ट्र, एक संस्कृति में घोलने की कोशिश चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थिरता की रणनीति है।इस कानून का सांस्कृतिक-सामाजिक पहलू बेहद चिंताजनक है। भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, पहचान का आधार है। यह कानून मंदारिन भाषा को अनिवार्य करने के बहाने तिब्बती बौद्ध दर्शन, उइगुर इस्लामिक परंपरा और मंगोलियन घुमंतू संस्कृति को विलुप्त कर देगा।
अनार के दाने वाली उपमा काव्यात्मक लगती है, लेकिन वास्तव में यह सांस्कृतिक नरसंहार की दिशा है। चीन की 56 जातियों में विविधता को संरक्षित करने के बजाय यह उसे मिटाने का चालाकीभरा मॉडल है। भारत को इसके भू-राजनीतिक प्रभाव के प्रति चिंतित होना चाहिए। हमारी उत्तरी सीमा पर तिब्बत है, जहाँ से निर्वासित दलाई लामा अपने अनुयायियों के साथ भारत में रह रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश पर चीन का दावा, लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव – ये सब अल्पसंख्यक दमन से जुड़े हैं। यदि तिब्बती संस्कृति मिट गई तो दलाई लामा उत्तराधिकारी विवाद में चीन का दबदबा बढ़ेगा।
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चीन का जबरन एकीकरण मॉडल लोकतंत्र के विपरीत
उइगुर मुद्दा भारत के मुस्लिम समुदाय को भी छूता है। साथ ही, भारत एकता में विविधता का वैश्विक उदाहरण है। हमारी संविधान सभा ने भाषाई राज्यों को मान्यता दी। पूर्वोत्तर राज्यों में आदिवासी परंपराओं को विशेष दर्जा दिया। इसके विपरीत चीन का चीनीकरण मॉडल दर्शाता है कि जबरन एकीकरण कितना खतरनाक हो सकता है! लोकतंत्र बहस की जगह देता है, उसमें दमन के लिए जगह नहीं होनी चाहिए।
दरअसल, अल्पसंख्यकों के जबरन चीनीकरण का यह कानून मानवाधिकार संगठनों के लिए नई चुनौती है। संयुक्त राष्ट्र या अमेरिका की ओर से इस पर कोई तीखी प्रतिक्रिया न आना चिंताजनक है। कहीं हम ऐसी दुनिया की ओर तो नहीं जा रहे, जिसमें मानवाधिकार हनन कोई मुद्दा ही न बने! अन्यथा सांस्कृतिक विलोपन की ऐसी कोशिशों को विश्व बिरादरी को बरदाश्त नहीं करना चाहिए।
निष्कर्षत, चीन का यह कानून एकता का नारा देकर विविधता का दमन करता है। लोकतंत्र में एकता स्वैच्छिक होती है, जबरन नहीं। यदि चीन सरकार अनार के दाने की नीति पर अड़ी रही तो आंतरिक अस्थिरता बढ़ेगी और क्षेत्रीय शांति प्रभावित होगी। काश शी जिनपिंग बहुलता के लोकतांत्रिक दर्शन को समझ पाते!
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