कर्मों का विधान

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युगों-युगों से संत-महात्मा और सभी धर्मों के संस्थापक शाकाहार पर जोर देते रहे हैं, जिसका मुख्य कारण है कि वे कर्मों का विधान जानते हैं। भौतिक विज्ञान के तीसरे सिद्धांत हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है के नैतिक दृष्टिकोण से हम कर्मों के विधान को समझ सकते हैं। वैज्ञानिक हमारे मस्तिष्क से निकलने वाली तरंगों की शक्ति पर जाँच कर रहे हैं। इन तरंगों की ताकत हमारी खोपड़ी के अंदर तक ही सीमित नहीं रहती है, बल्कि उससे बाहर निकलती है। इसीलिए हम दूसरों की नाराज़गी और प्यार की तरंगों को पकड़ सकते हैं।

यह तरंगें विचारों, वचनों और कार्यों की प्रतिक्रिया के रूप में हमारे अंदर से प्रकट होती हैं। यही कर्मों का विधान कहता है कि जब भी कोई कार्य किया जाता है तो उसकी प्रतिक्रिया होती है। प्राचीन हिन्दू, बौद्ध, सिख और जैन धर्मों के मूल सिद्धांतों में से एक है-कर्मों का विधान, जो हमारी आत्मा के स्तर पर हमें प्रभावित करता है। कर्मों का विधान कहता है कि हमारे विचारों, वचनों और कर्मों को दर्ज किया जाता है।

कर्मों का फल: अच्छे कर्म से अच्छा परिणाम

जब हमारे विचार, वचन और कर्म अच्छे होते हैं तो हमें उसका अच्छा फल मिलता है और जब हमारे विचार, वचन और कर्म बुरे होते हैं तब हमें उसका भुगतान करना पड़ता है। यह इस दुनियावी इंसान के कानून की तरह है, जो सज़ा और पुरस्कार पर आधारित है। कुछ धर्मग्रंथों में यह भी आया है कि हमारे जीवन के कर्मों के आधार पर हमें स्वर्ग या नरक में स्थान दिया जाता है।

संत-महात्मा, जिन्होंने परमात्मा को पाया है, आंतरिक मंडलों के राज़ खोले हैं, वे अपने अनुभव के आधार पर हमें कर्मों के विधान के बारे में समझाते हैं। इसीलिए जो लोग उनसे ज्योति और श्रुति का निज अनुभव लेना चाहते हैं, उन्हें शाकाहार का पालन करना होता है। आध्यात्मिक गुरु नहीं चाहते कि हम नए कर्म बनाएं और उन्हें भुगतने के लिए दुबारा इस धरा पर आना पड़े। वे कर्मों के सिद्धांत के बारे में हमें समझाते हैं कि यदि हम किसी जीव की हत्या करते हैं तो उस कर्म का भुगतान हमें करना ही पड़ता है।

बौद्ध धर्म में भी ऐसी कई कहानियाँ हैं जिनमें लोगों ने पिछले जन्म में ऐसा कुछ किया था, जिससे भविष्य में उन्हें उस कर्म के लिए नतीजा भुगतना पड़ा था। हम चाहे कर्मों के विधान में विश्वास करें या न करें, यह बात विचार करने योग्य है कि संत-महापुरुष, जिन्होंने परमात्मा को पाया है, वे अपने अनुभव के आधार पर कर्मों का विधान सिखाते हैं।

ध्यान और अनुभव से समझ आता है कर्मों का सच

जो लोग इस सिद्धांत की पुष्टि करना चाहते हैं, वे संतों-महात्माओं की तरह परीक्षण करके यानी इस शरीर से ऊपर उठकर अंतर के मंडलों में जा सकते हैं। वहाँ जाकर वे कर्मों के विधान की सत्यता का पता लगा सकते हैं।

महापुरुषों ने बयान किया है कि वे रोशनी से भरपूर क्षेत्र में गए। वहाँ अपने जीवन की समीक्षा करके अपने अच्छे-बुरे सभी कर्मों को देखा है। उन्होंने दूसरे लोगों को नहीं देखा। उन्होंने महसूस किया कि जब वे उनसे अच्छा या बुरा बर्ताव करते थे, तब उन्हें कैसा लगता था? इन अनुभवों से वे प्रेम के मुख्य सिद्धांत को समझ पाए।

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संत राजिन्दर सिंह महाराज

वे वापस धरती पर आकर अपने जीवन में अधिक प्रेममय और दूसरों का ख्याल रखने वाले बन गए, क्योंकि उन्होंने लोगों की प्रतिक्रिया को महसूस किया था। इस प्रकार वे कर्मों के विधान को समझ पाए। उन्होंने सदाचारी जीवन जीते हुए, अपना ध्यान परमेश्वर की ओर लगाया। तो आईये, हम भी ध्यान-अभ्यास द्वारा परमेश्वर के प्रेम व शांति का अनुभव करें और कर्मों के विधान को समझते हुए, जन्म-मरण के चक्कर से इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करें।

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