वेनेजुएला और ईरान के बाद अब क्यूबा : जारी हैं पागल ट्रंप की मनमर्जियां !
पागल ट्रंप की मनमर्ज़ियों ने अमेरिका को तो संकट में डाला ही है, पूरे विश्व को आर्थिक कठिनाइयों में झोंक दिया है और इस समय तीसरे विश्व युद्ध व परमाणु हमले का खतरा वास्तव में गंभीर हो गया है। दरअसल, एआई के युग में दुनिया सभ्य होने की बजाय जिसकी लाठी उसकी भैंस के दौर में पहुंच रही और वह भी केवल इसलिए कि पागल ट्रंप अपनी मर्जी चलाने के लिए नियम-आधारित व्यवस्था को पूर्णतः अनदेखा कर रहे हैं।
क्यूबा में इस समय अनिश्चितता, गुस्से व उम्मीद का मिश्रण है। क्यूबा में सरकार बदलने के उद्देश्य से अमेरिका ने उस तक पहुंचने वाले सभी तेल टैंकरों को रोक दिया है, जिससे यह पूरा द्वीप अंधेरे में डूब गया है, जबकि वहां पहले ही वर्षों से संकट है और गैसोलीन व बुनियादी संसाधनों के अभाव में अस्पताल, पब्लिक ट्रांसपोर्ट आदि पर मुसीबत के बादल छाये हुए हैं। क्यूबा पर किसी भी समय अमेरिका हमला कर सकता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का कहना है कि क्यूबा के साथ मैं जो चाहूं वह कर सकता हूं और उनका मानना है कि क्यूबा पर कब्ज़ा करने का मुझे सम्मान प्राप्त होगा।
हालांकि फिदेल कास्त्रा के समय से ही वामपंथी क्यूबा और कैपिटलिस्ट अमेरिका के बीच छत्तीस का आंकड़ा रहा है, लेकिन अमेरिका के किसी राष्ट्रपति ने ट्रंप जैसी हरकत का दुस्साहस नहीं किया है। ट्रंप ने वाइट हाउस में पत्रकारों से कहा, मैं उसे (क्यूबा को) आज़ाद करूं, उस पर कब्ज़ा करूं, मैं समझता हूं जो मैं चाहूं वह कर सकता हूं, मेरी मर्जी। इस समय वह बहुत ही कमज़ोर मुल्क है। दूसरी ओर ाढमलिन ने कहा है कि वह हवाना को हर संभव सहयोग प्रदान करने के लिए तैयार है और इस संदर्भ में क्यूबा से बातचीत चल रही है।
मादुरो को हिरासत में लेने का दावा
क्यूबा पर अपने नापाक इरादे व्यक्त करने से पहले नोबेल शांति पुरस्कार के स्वयंभू दावेदार ट्रंप ने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया लोरेंस, जो सत्य साई बाबा के भक्त हैं, को अगवा करके न्यूयॉर्क के डिटेंशन सेंटर (जिसे पृथ्वी पर नर्क कहते हैं) में रखने के बाद इस दक्षिण अमेरिकी देश, जिसके पास संसार का सबसे अधिक तेल रिज़र्व है, का प्रशासनिक संचालन अपने प्रॉक्सी को सौंप दिया था ताकि उसके तेल पर कब्ज़ा कर सकें।
इसके बाद ट्रंप ने इजराइल के साथ मिलकर 28 फरवरी 2026 को ईरान पर बेमकसद व बेमतलब का युद्ध थोप दिया, जबकि वाशिंगटन व तेहरान के बीच चल रही समझौता वार्ता सकारात्मक दिशा में बढ़ रही थी। यह दूसरा अवसर था जब वार्ता के बीच में ट्रंप ने इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया है। उन्होंने पिछले साल जून में भी यही हरकत की थी।
यह युद्ध, जिसकी वजह से पूरी दुनिया ईंधन व महंगाई के संकटों से जूझने लगी है, सिर्फ ट्रंप की सनक व पागलपन की वजह से हो रहा है, जैसा कि अमेरिका के नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर के निदेशक जो केंट ने अपने इस्तीफे में कहा, मैं ईरान के विरुद्ध युद्ध का समर्थन नहीं कर सकता। ईरान से हमारे देश को कोई खतरा नहीं था और यह एकदम स्पष्ट है कि हमने यह जंग इज़राइल और उसकी शक्तिशाली यहूदी लॉबी के दबाव में आरंभ की।
नाटो देशों ने ईरान युद्ध में शामिल होने से किया इंकार
अमेरिका में भी इस युद्ध का ज़बरदस्त विरोध हो रहा है और विरोध करने वालों में ट्रंप की अपनी पार्टी रिपब्लिकन के सदस्यों की भी बड़ी तादाद है। अमेरिका में आम ख्याल यह है कि ट्रंप यह जंग एपस्टीन फाइल्स से ध्यान भटकाने के लिए कर रहे है। ध्यान रहे कि एपस्टीन फाइल्स में सबसे ज़्यादा बार नाम ट्रंप का ही आया है।
एक महिला ने सार्वजनिक तौरपर आरोप लगाया है कि जब वह मात्र 13 साल की थी तो एपस्टीन के द्वीप पर ट्रंप ने उसके साथ जबरन दुष्कर्म किया था। एक रिपब्लिकन सीनेटर थॉमस मेस्सी ने कहा है कि युद्ध और अंतरराष्ट्रीय टकराव एपस्टीन अपराधों पर पर्दा नहीं डाल सकते हैं। यहां यह बताना भी आवश्यक है कि ट्रंप ने ईरान युद्ध में नाटो के सदस्यों से शामिल होने व मदद करने का आग्रह किया, लेकिन सभी ने इंकार कर दिया। इन सदस्यों का कहना है कि ईरान पर युद्ध थोपना बेवकूफी थी, उनसे इस संदर्भ में कोई सलाह नहीं की गई और इस युद्ध की कोई आवश्यकता नहीं थी, इसलिए वह इसमें शामिल नहीं होंगे।
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नाटो के इंकार पर ट्रंप का तीखा रुख
बहरहाल, ट्रंप के पागलपन का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब नाटो सदस्यों व अन्यों ने युद्ध में शामिल होने से इंकार कर दिया तो उन्होंने कहा, हमें किसी की मदद नहीं चाहिए। दरअसल, ट्रंप इतने सनक गये हैं कि कभी कुछ बोलते हैं तो कभी कुछ। कभी वह दावा करते हैं कि ईरान की सेना, नौ सेना और उसकी मिसाइलों को पूर्णतः खत्म कर दिया गया है, वह युद्ध जीत चुके हैं और कभी कहते हैं कि ईरान बहुत शक्तिशाली राष्ट्र है।
ऐसा प्रतीत होता है कि ट्रंप को मालूम ही नहीं कि वह क्या कह रहे हैं, क्या चाहते हैं और जो कुछ कर रहे हैं, वह क्यों कर रहे हैं। बस, जिस दिन जिस चीज़ की मर्जी होती है, वह कर बैठते हैं। ट्रंप ने इस साल के शुरू में धमकी दी थी कि वह सैन्य शक्ति का प्रयोग करके ग्रीनलैंड पर कब्जा कर लेंगे। अब मार्च में वह कह रहे हैं कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण के लिए वह सैन्य बल का इस्तेमाल नहीं करेंगे बल्कि उन्होंने इसके लिए एक फ्रेमवर्क तैयार किया है, जबकि ग्रीनलैंड के अधिकारियों ने इन प्रयासों को ठुकरा दिया है। ट्रंप का फ्रेमवर्क क्या है, यह किसी को मालूम नहीं है।
राष्ट्रपति बनने के बाद वादे अधूरे रहे
ट्रंप जब अमेरिका के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने का प्रयास कर रहे थे, तो उन्होंने अपने चुनाव अभियान में अमेरिका को फिर से महान बनाने (मागा) के लिए वायदा किया था कि वह अमेरिकी सेना को किसी दूसरे देश के लिए युद्ध करने हेतु नहीं भेजेंगे और जहां-जहां युद्ध चल रहे हैं, उनको समाप्त करायेंगे। इसलिए पुनः राष्ट्रपति बनने के बाद वह नोबेल शांति पुरस्कार पर दावेदारी करने लगे। लेकिन यह सब चुनावी जुमले ही साबित हुए, जिससे अब उनके मागा समर्थक भी नाराज़ हो गये हैं।
ट्रंप की स्थिति अब ह़फीज़ मेरठी के इस शेर की तरह हो गई है- उससे ख़ूंरेज़ी की लत भी नहीं छोड़ी जाती/और तमग़ा-ए-अमन भी चाहे वो सितमगर रखना। ट्रंप किसी नियम की बजाय अपनी मनमर्जी से दुनिया पर राज करने की कोशिश कर रहे हैं। मिसाइल चलाने से पहले उन्होंने पूरी दुनिया के खिलाफ टैरिफ युद्ध छेड़ दिया था। फिर बेतुकी शर्तों के साथ उलटे-सीधे व्यापार समझौते करने लगे।

भारत सहित हर किसी से कहने लगे कि रूस से तेल न खरीदें। लेकिन जब ईरान युद्ध बैकफायर कर गया कि तेहरान ने स्ट्रेट ऑ़फ होर्मुज बंद कर दिया तो सबको रूस से तेल खरीदने की अनुमति देने लगे और वह भी ऐसे समय जब कच्चे तेल का दाम प्रति बैरल 120 डॉलर होने जा रहा है। पागल ट्रंप की मनमर्ज़ियों ने अमेरिका को तो संकट में डाला ही है, पूरे विश्व को आर्थिक कठिनाइयों में झोंक दिया है और इस समय तीसरे विश्व युद्ध व परमाणु हमले का खतरा वास्तव में गंभीर हो गया है। दरअसल, एआई के युग में दुनिया सभ्य होने की बजाय जिसकी लाठी उसकी भैंस के दौर में पहुंच रही और वह भी केवल इसलिए कि पागल ट्रंप अपनी मर्जी चलाने के लिए नियम-आधारित व्यवस्था को पूर्णतः अनदेखा कर रहे हैं।
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