सरकती चूनर और दरकती नैतिकता 

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बॉलीवुड-कन्नड़ सिनेमा की जोड़ी नोरा फतेही और संजय दत्त की फिल्म के डी: द डेविल का आइटम सॉन्ग सरके चूनर तेरी सरके रिलीज होते ही नैतिकता और अश्लीलता के सवालों का केंद्र बन गया। डबल मीनिंग वाले बोल, उत्तेजक नृत्य और यौन संकेतों से भरी मुद्राओं को सोशल मीडिया पर तूफान का कारण बनना ही था।  

नाबालिगों पर असर, महिलाओं की गरिमा का अपमान और सार्वजनिक नैतिकता का हनन जैसे आरोप लगते ही एक जागरूक एडवोकेट की शिकायत, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का नोटिस, हरियाणा-कर्नाटक महिला आयोगों की माँग और कंगना रनौत-रवि किशन जैसी हस्तियों के बयान सामने आये। मेकर्स ने हिंदी वर्जन यूट्यूब से हटा लिया, नोरा ने सफाई दी कि तीन साल पहले कन्नड़ वर्जन शूट हुआ था और हिंदी डबिंग में उनकी कोई भूमिका नहीं। लेकिन विवाद यहीं नहीं रुका। संसद तक जा पहुँचा।

लोकसभा में एक सपा सांसद ने इस मुद्दे को उठाया। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने दोटूक जवाब दिया – इस गाने पर पहले ही प्रतिबंध लगाया जा चुका है। अभिव्यक्ति की आजादी पूरी तरह असीमित नहीं हो सकती। संविधान निर्माताओं द्वारा लगाई गई उचित पाबंदियों का पालन होना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज, संस्कृति, बच्चों, महिलाओं और वंचितों की सुरक्षा के लिए सरकार सख्त कदम उठाने को तैयार है। केंद्र सरकार ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के जरिए केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) को निर्देश दिया कि आरोप सत्य साबित होने पर गाना सभी प्लेटफॉर्म्स से हटा दिया जाए। सीबीएफसी ने भी स्वीकार किया कि मेकर्स ने गाने के लिए कोई सर्टिफिकेशन नहीं माँगा था। 

केवल हिंदी वर्जन हटाने पर उठे सवाल

पूछा जा सकता है कि, यह कार्रवाई कितनी पूरी और प्रभावी है? शुरुआत में केवल हिंदी वर्जन हटा गया, जबकि मूल कन्नड़, तेलुगु, तमिल और मलयालम वर्जन अभी भी यूट्यूब पर करोड़ों व्यूज बटोर रहे हैं। सरकार का सभी प्लेटफॉर्म्स वाला निर्देश हवाई लग रहा है। क्या भाषाई भेदभाव अभी भी बरकरार है? क्या दक्षिण भारतीय भाषा-भाषी दर्शकों की नैतिकता हिंदीभाषी दर्शकों जितनी महत्वपूर्ण नहीं? यह आधा-अधूरा ऐक्शन सेंसरशिप की दोहरी नीति और लीपापोती को उजागर करता है। 

अब बात कला, नैतिकता, बाजार और अश्लीलता के रिश्ते की। कला अभिव्यक्ति की आज़ादी का प्रतीक है। यह समाज को आईना दिखाती है, चुनौती देती है। लेकिन जब कला बाजार के चंगुल में फँस जाती है, तो नैतिकता की सीमाएँ दरकने लगती हैं। आइटम सॉन्ग्स की संस्कृति आज कमर्शियल रणनीति बन गई है। ट्रेंडिंग व्यूज, वायरल रील्स और बॉक्स ऑफिस का दबाव कलाकारों को बोल्ड (नग्न और अश्लील!) होने को मजबूर करता है। बाजार अश्लीलता को एंटरटेनमेंट कहकर बेचता है, जबकि नैतिकता कहती है कि कला समाज को ऊँचा उठाए, न कि गिराए। सिनेमा संस्कृति में कामुकता पहले ही चोली के पीछे और द्रिमम वेकअपम जैसे विवादों से गुजर चुकी है, लेकिन आज सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने इसे घर-घर पहुँचा दिया। 

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अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम सामाजिक जिम्मेदारी

बेशक, केंद्र सरकार और संसद अभिव्यक्ति की आजादी को समाज के संदर्भ में बाँधने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन, समस्या गहरी है। अगर बाजार नैतिकता को नजरअंदाज करेगा और मेकर्स जवाबदेही से मुँह मोड़ेंगे, तो सेंसरशिप कितनी भी सख्त हो, विवाद बार-बार लौटेंगे ही। कला को नैतिकता की कसौटी पर परखने की जरूरत है – बिना रचनात्मकता को कुचले। सीबीएफसी को मजबूत बनाना होगा, प्लेटफॉर्म्स पर निगरानी बढ़ानी होगी और कलाकारों को भी अपनी रचनाओं की जिम्मेदारी लेनी होगी। 

सरके चूनर तेरी सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि कला और नैतिकता के टकराव का प्रतीक है। इस पर त्वरित प्रतिक्रिया ने संदेश दिया कि अश्लीलता को सहन नहीं किया जाएगा। लेकिन अगर कार्रवाई सभी भाषाओं और प्लेटफॉर्म्स पर एकसमान नहीं हुई, तो यह सिर्फ दिखावा रहेगा। बाजार के लालच और कला की आज़ादी के बीच संतुलन तभी संभव है जब नैतिकता को प्राथमिकता दी जाए। अन्यथा भारतीय सिनेमा की गरिमा को बार-बार ठेस लगेगी। बेहतर होगा कि मेकर्स स्वयं संयम बरतें, ताकि सरकार को नैतिकता की निगरानी का अवांछनीय काम न करना पड़े !  

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