आध्यात्मिक युग का प्रारंभ है उगादि : रमेशजी
हैदराबाद, उगादि पर अपने भीतर आध्यात्मिक युग का प्रारंभ कर हम मानव जीवन सार्थक कर सकते हैं। जीवन-मरण और पुनर्जन्म से ऊपर उठकर आध्यात्मिक यात्रा प्रारंभ करने के लिए यह उगादि बहुत बड़ा सुअवसर है। लौकिक रूप से भले ही हम किसी भी युग में हों, लेकिन जब हम भीतर से आध्यात्मिक योग में जीवन जीते हैं, तब हमारा जीवन आदि और अंत से रहित होकर अनंत हो जाता है।
उक्त उद्गार पूर्णानंद आश्रम, जनवाड़ा के स्थापना दिवस तथा नवरात्रि के उपलक्ष में आयोजित सत्संग में सद्गुरु रमेशजी ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि श्रीशैलम निवासी पूर्णानंद स्वामीजी के संकल्प और उनके शिल्पारामम् की तरह आश्रम की कल्पना का यह साकार रूप है। आश्रय और आश्रम का अंतर यह है कि हम परिवार के साथ और अपने संबंधियों साथ जिस स्थान पर रहते हैं उसे घर या आश्रय कहते हैं, लेकिन जहाँ दिव्य तरंगे, गुरु सान्निध्य और ज्ञान का प्रवाह होता है, उसे आश्रम कहते हैं।
आश्रम का अर्थ ही है जहाँ हमारे मन को किसी प्रकार का कोई श्रम न करना पड़े। जहाँ मन को शांति, बुद्धि को दिशा और आत्मा को परमात्मा मिले, वही आश्रम है। जब मन श्रम नहीं करता, तब वह शांत रहता है और शांत मन में बुद्धि को सही दिशा मिलती है। तब हमें जीवन का उद्देश्य स्पष्ट होता है। हमारे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है आत्म कल्याण। इसीलिए इतने त्यौहार आदि बनाए गए हैं, ताकि हम त्यौहारों के आध्यात्मिक रहस्यों पर ध्यान देकर आत्म कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ सकें। लेकिन हम त्यौहारों को केवल कर्मकांड, पूजा-पाठ, व्रत -उपवास तक ही सीमित रखते हैं और उसी में उलझे रहते हैं। अब भी देर नहीं हुई है, हमें जागना है और सभी में केवल चेतन या ब्रह्मा को ही देखना है।
मोह छोड़कर निस्वार्थ प्रेम अपनाने का संदेश
रमेशजी ने कहा कि आध्यात्मिकता हमें जीवन से भागना नहीं, अपितु जीवन को गहराई से जानना सिखाती है। यह हमारी गलत धारणा है कि आध्यात्मिकता से संसार और परिवार छूट जाएगा। वास्तविकता यह है कि यदि हम सबको अपने समान ही देखने और समझने लगते हैं, तो हमें किसी से भी मोह या लगाव नहीं रहता, लेकिन सबके प्रति हमारे हृदय में प्रेम उमड़ता है और निस्वार्थ प्रेम हर समस्या का समाधान तथा आनंद की चाभी है।
रमेशजी ने कहा कि किसी गुरु या संत की कृपा से जब हमें यह ज्ञान हो जाता है कि जीवन में कुछ भी छोड़ना नहीं है, लेकिन हमें किसी भी चीज से मोह नहीं करना है, तब हमारा मन व्यक्तियों, वस्तुओं और परिस्थिति की जकड़न से छूट जाता है और मुक्ति का अनुभव करता है ।
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अवसर पर गुरु माँ ने कहा कि नवरात्रि में कन्या के हर रूप की पूजा की जाती है। कन्या रूप में, सुवासिनी रूप में, सुहासिनी रूप में। इसका अर्थ यही है कि शक्ति हमारे चारों ओर हर रूप में सदा से विराजमान है, हमें केवल इस सत्य को स्वीकारना है और आदर-सत्कार करते हुए उसका आभार प्रकट करना है। सृष्टि में व्याप्त संपूर्ण प्रकृति शक्ति का मायका है और सबको अपने परमात्मा रूपी ससुराल में खुशी-खुशी जाना है। आत्मा के परमात्मा से मिलन के लिए प्रयास करना ही हमारे आध्यात्मिक युग का प्रारंभ है।
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