स्त्री धन से खरीदी संपत्ति पर दावा मान्य नहीं : तेलंगाना उच्च न्यायालय
हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट करते हुए कहा कि विवाह से पूर्व, विवाह के बाद और संतान उत्पत्ति के समय महिला को प्राप्त स्त्री धन से कोई भी संपत्ति खरीदने का हवाला देना मात्र मान्य है, बल्कि स्त्री धन से खरीदी गई संपत्ति के संबंध में ठोस सबूत न रहने पर इस संपत्ति को अपनी संपत्ति बताते हुए क्लेम नहीं किया जा सकता। संपत्ति खरीदने के संबंध में ठोस सबूत और दस्तावेज न रहने पर इस पर अपना स्वामित्व जताना कानून के खिलाफ है।
इसके संदर्भ में सितंबर-2025 के दौरान एकल न्यायाधीश द्वारा दिए गए फैसले में हस्तक्षेप करने से उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अपरेश कुमार सिंह और जस्टिस जी.एम. मोहियुद्दीन की खण्डपीठ ने साफ इनकार कर दिया। खण्डपीठ ने कहा कि स्त्री धन का आशय विवाह से पूर्व, विवाह के समय अन्यथा विवाह के बाद किसी प्रकार बच्चों के जन्म पर या अन्य किसी रूप में एक महिला को प्राप्त धन संपत्ति (चल और अचल संपत्ति) स्त्री धन है। इस प्रकार प्राप्त संपत्ति का बिना किसी रोक-टोक के उपयोग करने, स्थानांतरित करने का महिला को पूर्ण अधिकार रहता है।
खंडपीठ ने भू-स्वामित्व याचिका खारिज की
वर्ष 2007 के दौरान अदालत द्वारा हसनपर्ती ज़िले के नागारम ग्राम स्थित 8 एकड़ विवादित भूमि को हासिल करने वाले निजी व्यक्तियों के अनुकूल भू-रिकॉर्ड का म्यूटेशन करने के लिए विगत में एकल न्यायाधीश ने आदेश जारी किए थे। वास्तव में अपीलकर्ता के पति से संबंधित इस भूमि की अदालत के जरिए नीलामी करने पर निजी व्यक्तियों ने इसे हासिल किया। संपत्ति को लेकर निजी व्यक्तियों द्वारा किए गए आवेदन को ध्यान में रखते हुए एकल न्यायाधीश ने इसके पूर्व अधिकारियों को आदेश दिए थे।
एकल न्यायाधीश के इस आदेश को चुनौती देते हुए महिला ने नीलाम की गई भूमि को कानून के अनुसार उसे प्राप्त स्त्री धन से खरीदने का हवाला दिया और म्यूटेशन संबंधी आदेश को रद्द करने के लिए अपील याचिका दायर की। इस याचिका पर सुनवाई पूर्ण करते हुए मुख्य न्यायाधीश की खण्डपीठ ने कहा कि अपील याचिका दायर करने वाली याचिकाकर्ता ने उन्हें भू संपत्ति पर स्वामित्व संबंधी दस्तावेज और सबूत पेश नहीं किए।
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वर्ष 2016 के दौरान वरंगल की निचली अदालत ने स्वामित्व संबंधी दलील को खारिज करने का खण्डपीठ ने उल्लेख किया। खण्डपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता के पति ने इसके पूर्व कई आपत्तियाँ दायर की, जिससे स्पष्ट हो रहा है कि कानून के तहत भू संपत्ति के हस्तांतरण में देरी करने के उद्देश्य से ही अपील याचिका दायर की गई। खण्डपीठ ने कहा कि अदालत के जरिए सार्वजनिक रूप से नीलामी की गई भू-संपत्ति पर स्वामित्व को लेकर याचिकाकर्ता के पास कोई सबूत नहीं है। खण्डपीठ ने याचिकाकर्ता को प्रतिवादियों में शामिल कर उसे नोटिस जारी न करते हुए अपना फैसला सुनाया।
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