माँ दुर्गा
जगजननी जगदंबा का ज्योतिर्मय जयकारा है। हर कण हर कोना शुद्ध होता माता का भंडारा है।।
सिंह पर सवार माता जल-थल-नभ से ललकारा है। दुर्गुणों पर चोट करता माता का हुंकारा है।
मंगल ही मंगल हों, दसों दिशाएँ गूंज रही हैं। मानव का उद्धार हो, आदि शक्ति को पूज रही हैं।।
माँ का वरदान रहे आठों चक्र शुद्ध रहे। अपेक्षा से उपेक्षित रहें, चित्त सबका एकाग्र रहे।।
सद्ज्ञान का संज्ञान लेती, संस्कारों पर केंद्रित करती। माता की वंदना, जीवन को आलोकित करती।।
दुष्टों पर संधान कर, दुष्टों का संहार करती। हर मलिनता नकारकर, नवप्रभात स्पंदित करती।।
डॉ. शैलजा भट्टड़
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