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ध्यान दें! चेक से भुगतान करना एक कानूनी जिम्मेदारी भी है

चेक पर किया गया आपका हस्ताक्षर कानून की नजर में यह घोषणा होता है- आपके खाते में पर्याप्त धन है। आपने यह चेक किसी वैध देनदारी के बदले में दिया है। साथ ही यह भी कि समय पर भुगतान से पीछे हटने का आपका कोई इरादा नहीं है। ऐसे में यदि चेक बाउंस हो जाता है तो मामला सिर्फ बैंक तक सीमित नहीं रहता। यह अदालत, नोटिस, समन और जेल तक भी जा सकता है। इसमें यह मानकर ही चला जाता है कि गलती चेक देने वाले की है। नेगोशिएबल ऐक्ट की धारा 138 के तहत दिए हुए चेक का अगर भुगतान नहीं हो पाता, तो चेक देने वाला इसके लिए कानूनी रूप से दोषी होता है। बिना बैलेंस के चेक देना जोखिमभरा है यानी खाली चेक देना एक आत्मघाती गलती है।

गुजरी 5 फरवरी 2026 को अभिनेता राजपाल यादव को एक चेक बाउंस मामले में तिहाड़ जेल भेज दिया गया। गौरतलब है कि राजपाल यादव 2010 से इस चेक बाउंस मामले की कानूनी लड़ाई में उलझे हुए हैं। साल 2010 में उन्होंने अपनी पहली निर्देशित फिल्म अता, पता, लापता के लिए दिल्ली स्थित मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड से 5 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था, लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिर गई और इस तरह अभिनेता को लिया हुआ कर्ज वापस करना मुश्किल हो गया।

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मजिस्ट्रेट ने उन्हें और उनकी पत्नी राधा यादव को नेगोशिएबल ऐक्ट की धारा 138 के चलते दोषी ठहराया था और शिकायतकर्ता को जारी किये गये 7 चेक बाउंस के बाद 6 महीने की साधारण कारवास की सजा सुना दी।
भारत में चेक से जुड़े मामलों का मुख्य कानून नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट ऐक्ट 1881 है। ऐसे में इस बात को हमें गंभीरता से जान लेना चाहिए कि किसी को चेक देने के बाद कोई व्यक्ति किस-किस तरह के कानूनी दायरे में आ जाता है।

नोटिस से शुरू होती है चेक बाउंस की कानूनी प्रक्रिया

खाते में भुगतान के लिए जरूरी धनराशि नहीं है तो ऐसे में चेक जारी करना आपराधिक कृत्य माना जायेगा। अगर चेक में गलत सिग्नेचर, तारीख या रकम में गड़बड़ी है, जिससे चेक बाउंस हो जाता है, तो इससे हालांकि चेक जारी करने वाले को जेल नहीं होती, लेकिन इसके लिए उसे जिम्मेदार माना जाता है। चेक देना कानून की नज़र में यह घोषणा करना है कि आप भुगतान करने के लिए तैयार हैं और भविष्य में अगर इसके लिए मुकरे तो वह मुकरना आपको कानूनी जोखिम में डाल देगा।

ऊपर दिए गए जिन-जिन कारणों के चलते चेक बाउंस होता है, उस पर नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट ऐक्ट 1881 की धारा 138 के तहत किसी व्यक्ति को दो वर्ष की कैद की सजा या चेक राशि के दोगुने तक जुर्माना या फिर दोनों सजाएं एक साथ दी जा सकती हैं। कहने का मतलब यह कि चेक बाउंस होना वास्तव में सीधा-सीधा आपराधिक कृत्य है। चेक बाउंस होने पर केस की कानूनी प्रक्रिया कुछ इस तरह से चलती है। बैंक से चेक रिटर्न मैमो प्राप्त होता है। प्राप्तकर्ता 30 दिनों के भीतर कानूनी नोटिस भेजता है और नोटिस मिलने के बाद 15 दिन का समय भुगतान के लिए दिया जाता है।

धारा 139 के तहत देनदारी मान ली जाती है

यदि इन 15 दिनों में भी भुगतान नहीं होता, तो केस अदालत में दायर किया जाता है। यह नियम एकाउंटपेयी चेक पर लागू होता है, जिसका मतलब ये होता है कि पैसा केवल उसी के खाते में जायेगा, जिसके नाम पर चेक जारी किया गया है। एकाउंटपेयी चेक से संबंधित यह मामला इसलिए गंभीर होता है, क्योंकि एकाउंट पेयी चेक यह साबित करता है कि भुगतान उसी व्यक्ति के लिए था और कोई दूसरा व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि चेक किसी और को दिया गया था।

इसके लिए बैंक स्टेटमेंट, चेक कॉपी और डिपोजिट स्लिप मिलकर ठोस सबूत बन जाते हैं। इस तरह इन सबूतों के बाद धारा 139 की मदद ली जाती है, जो यह मानकर चलती है कि चेक कानूनी देनदारी के बदले में दिया गया था। जब तक कि चेक देने वाला इसके विपरीत न साबित कर दे। चेक बाउंस के मामले में नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट ऐक्ट की जो अन्य महत्वपूर्ण धाराएं लगती हैं, वो इस तरह हैं-

  • धारा 118, जिसके चलते मान लिया जाता है कि चेक उचित लेनदेन की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए दिया गया था।
  • इसकी धारा 141 यह मान लेती है कि कंपनी का चेक बाउंस हुआ था, तो डायरेक्टर और जिम्मेदार अधिकारी भी आरोपी बन सकते हैं।
  • नेगोशिएबल ऐक्ट के अलावा पूर्व की भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की कुछ धाराएं भी इसे आपराधिक कृत्य बनाती हैं। जैसे- धारा 420 जो कि चेक बाउंस को धोखाधड़ी साबित करती है और धारा 406 जिसके चलते यह आपराधिक विश्वासघात माना जाता है।

-प्रभाकांत कश्यप

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