युद्ध कहीं, झटका हर कहीं : पेट्रोल से प्लेट तक, जेब में लगती चिंगारी

भारत किसी भी तरह की लड़ाई के पक्ष में नहीं है इसलिए वह प्रत्यक्षत किसी के भी साथ खड़ा नहीं हो सकता। लेकिन अमेरिका और इजराइल को लगता है अगर हम किसी के साथ नहीं हैं, तो हम सबके साथ हैं। यही हमारी सबसे बड़ी दुविधा और चुनौती है क्योंकि सिर्फ ईरान के तेल कुएं ही नहीं जल रहे बल्कि भारत के आम लोगों की जेब में भी इस जंग की तपिश ने आग लगा दी है।

दुनिया के नक्शे पर युद्ध अकसर दूर लगते हैं, टीवी पीन पर चलते हुए, अखबार के किसी कोने में सिमटे हुए। लेकिन 2026 की ये सच्चाई कि अब दुनिया का कोई भी शख्स युद्ध से दूर नहीं है। पश्चिम एशिया में उठा जंग का धुआं सीधे भारत के रसोईघरों तक पहुंच रहा है। पेट्रोल की कीमतों, गैस सिलेंडर की बुकिंग और सब्जियों की खरीदारी में हर जगह खाड़ी युद्ध मौजूद है। हर जगह एक अनदेखी लड़ाई का जीवंत एहसास महसूस किया जा रहा है क्योंकि युद्ध अब सिर्फ मिसाइलों और ड्रोनों की डरावनी कलाबाजियों तक ही सीमित नहीं है।

यह हर एक जेब तक अपनी तपिश सप्लायी कर रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य यूं तो बंद है, लेकिन ईरान को फिरौती देकर जहाज आ-जा रहे हैं, क्योंकि दुनिया की सबसे मजबूत ऑयल सप्लायी चेन यही है। यहां से पूरी दुनिया का इस्तेमाल होने वाला 20 फीसदी तेल गुजरता है। इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, भारत जैसे देश के आयात बिल में भारी बढ़ोत्तरी और डॉलर के सामने रुपये के कमजोर होने में होता है क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी तेल इसी होर्मुज जलडमरूमध्य से आयात करता है।

पेट्रोल अब ईंधन नहीं, अर्थव्यवस्थाओं की नब्ज है। पेट्रोल और डीजल सिर्फ गाड़ियों को नहीं चलाते, पूरे देश की अर्थव्यवस्था को चलाते हैं। इसलिए इन्हें अर्थव्यवस्था की धड़कन कहा जाता है। जैसे ही तेल महंगा होता है, ट्रांसपोर्ट महंगा हो जाता है, खेती की लागत बढ़ जाती है, फैक्ट्रियों का खर्च बढ़ जाता है और नतीजा ये होता है कि हर चीज महंगी हो जाती है। जब तेल में प्रति बैरल 10 डॉलर की वृद्धि होती है, तो हिंदुस्तान में महंगाई आधा फीसदी तक बढ़ जाती है।

युद्ध के चलते वैश्विक बजट और सैन्य खर्च का उछाल

क्योंकि अभी तक जब से ईरान-अमेरिका-इजराइल जंग शुरु हुई है, तब से तेल की कीमतें 30 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ चुकी हैं। इसलिए डेढ़ फीसदी तक महंगाई में बढ़ोत्तरी तो स्वाभाविक ही है, मगर व्यावहारिक रूप में यह अभी भी ढाई से तीन प्रतिशत बढ़ चुकी हैं। दुनिया के अर्थशास्त्रियों और सैन्य विशेषज्ञों को आशंका है कि यह मंहगाई 5 से 6 फीसदी तक बढ़ सकती है। क्योंकि लगता नहीं है कि अगले एक सप्ताह के भीतर युद्ध विराम हो जाए।

यदि युद्ध विराम हो भी जाता है तो अभी तक सिर्फ अमेरिका इस जंग में 20 अरब डॉलर से ज्यादा स्वाहा कर चुका है और इजराइल का आलम तो यह है कि वह इस साल के अपने समूचे बजट के बराबर का गोला-बारूद दुश्मन के ऊपर झोंक चुका है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस तरह से ईरान ने अभी तक अपने दुश्मन देशों को पटखनी दी है, अगर वैसी पटखनी अगले एक हफ्ते तक और जारी रहती है, तो इस जंग का बहुत बड़ा असर हम भारतीयों को भी चुकाना पड़ेगा। अभी तक जंग के कारण देश के आयात बिल में एक बिलियन डॉलर से ज्यादा की वृद्धि हो चुकी है।

रसोई गैस और खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़ने के संकेत

फिर भी कोई आसार नहीं दिखते कि जल्द से जल्द रसोई पर हमले को लेकर अमेरिका और ईरान ने जो मनसूबे बांधे हैं, उन पर किसी तरह का असर पड़े। एलपीजी सिलेंडर महंगा हो चुका है, सब्जियों के दाम बढ़ चुके हैं, दूध,आटा तेल 5 से 10 फीसदी इस संकट के कारण और इतना ही आपदा में अवसर तलाशने वालों की खूबसूरती के कारण महंगे हो चुके हैं। एक मोटा-मोटी अनुमान ये है कि इस जंग के शुरु होने के 8वें दिन के बाद से ही दुनिया के हर मध्यवर्गीय परिवार का मासिक बजट भारतीय रुपयों में 5,000 से 7,000 रुपये प्रतिमाह तक बढ़ चुका है।

अगर ये लड़ाई अगले दो से तीन महीने तक जारी रहती है, तो दुनिया एक साथ महंगाई और मंदी के चलते 5 साल पीछे हो जायेगी। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि मौजूदा मध्य पूर्व की जंग किस कदर वैश्विक और पूरी दुनिया को अपने असर की चपेट में लेने वाली है। मध्यू पूर्व में जारी जंग के चलते उद्योगों पर दबाव बढ़ गया है। भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की सबसे बड़ी ताकत एमएसएमई सेक्टर की सांसें फूलने लगी हैं। लघु और कुटीर उद्योग भारत जैसी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन ये सुचारू रूप से चलें, इसके लिए ये कच्चा माल, ईंधन, ट्रांसपोर्ट और निर्यात जैसी सभी चीजों के लिए दूसरों पर आश्रित रहती हैं।

भारत में एमएसएमई और कूटनीति पर दबाव

यही कारण है कि जब से यह खाड़ी जंग शुरु हुई है, अब तक भारत में एमएसएमई के उत्पादन में 5 से 7 फीसदी तक की गिरावट आ चुकी है। नतीजतन कई लाख कामगारों की रोजी-रोटी पर तलवार लटक रही है और बड़े पैमाने पर छोटे उद्योग बंद होने की कगार पर हैं, खासकर ऑटो टेक्सटाइल और केमिकल सेक्टर के छोटे उद्योग। सबसे बड़ी बात ये है कि बिना कोई पक्ष होते हुए भी भारत को इस युद्ध से दूरी बनाने में जबर्दस्त कूटनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि एक तरफ ईरान है, जो हमारी ऊर्जा जरूरतें पूरी करता है और दूसरी तरफ इजराइल है, जो हमारी रक्षा और तकनीक संबंधी जरूरतों को पूरी करता है।

भारत इनमें से किसी को नहीं खोना चाहता और शायद इस समय भारत जैसे देश में तटस्थ लोगों की यही सबसे बड़ी खामी बन गई है। भारत की कूटनीति है कि प्रत्यक्षत न तो अमेरिका के हित में शामिल होना चाहता है और न ही वह ईरान के गुट का हिस्सा है। इसी कारण भारत को इस सबकी अतिरिक्त कीमत चुकानी पड़ रही है।

-एन.के.अरोड़ा

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