ट्रांसजेंडर व्यक्ति संशोधन विधेयक-2026 हंगामा क्यूं है बरपा!

यह संशोधन सिर्फ एक समुदाय (ट्रांसजेंडर) के विरुद्ध ही नहीं है बल्कि इसके भी खिलाफ है कि एक नागरिक के रूप में हम क्या हैं? इसे तो वापस लिया ही जाना चाहिए। हालांकि इस संशोधन को अदालत में चुनौती दी जा सकती है, लेकिन सरकारी यू-टर्न से मालूम होता है कि जो अधिकार कड़े संघर्ष के बाद अर्जित किये जाते हैं, उन पर भी सरकार अपनी मर्जी से जब जी चाहे विराम लगा देती है।

लगभग चार साल पहले अहमदाबाद की क्षमा बिंदु राष्ट्रीय सुर्ख़ियों में थीं। लाल लहंगे में वह एकदम परम्परागत भारतीय दुल्हन लग रही थीं। लेकिन इस कहानी में एक ट्विस्ट था। वह ख़ुद से ही शादी कर रही थीं ताकि लैंगिक प्रथा व पितृसत्तात्मकता से मुक्ति पा सकें। भारत में सोलोगेमी का यह पहला केस था। तब से अब तक बिंदु के लिए बहुत कुछ बदल गया है। अब वह ट्रांस-पुल्लिंग व्यक्ति हैं और उनका नाम मुकुंद है।

वर्षों तक अपनी मर्दानगी को दबाने के बाद, आख़िरकार उन्होंने साहस किया हॉरमोन रिप्लेसमेंट थैरेपी कराने का और अपनी पहचान कागज़ात पर लिंग बदलने का- पुरुष। लेकिन इस सब पर अचानक भयावह विराम लग गया है, संसद में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों की सुरक्षा) संशोधन विधेयक, 2026 के पारित होने की वजह से। मुझे कई दिन से नींद नहीं आयी है। इतना अधिक डर है… अपने अस्तित्व को ही खतरा महसूस होने लगा है, ऐसा 28-वर्षीय मुकुंद का कहना है।

विधेयक पारित होते ही ट्रांसजेंडर समुदाय में चिंता बढ़ी

इस विधेयक के पारित होने के कुछ मिनट बाद ही एक्स पर एक ट्वीट वायरल हुआ- मैं हर समय हिम्मत प्रदर्शित नहीं कर सकता। आज मैं जो हूं, वह बनने में मुझे वर्षों लगे हैं …और अब मुझे महसूस हो रहा है कि मुझसे सब कुछ छीना जा रहा है, मेरे अधिकार, मेरा सम्मान, मेरी निजता। किस्मत से इस व्यक्ति को लोकेट करके काउंसिल किया गया। संकट टल गया, िफलहाल के लिए। लेकिन यह एंग्जायटी व बेचैनी अकेले इस व्यक्ति की नहीं है।

तीन सौ से अधिक मानसिक स्वास्थ्य प्रोफेशनल्स ने हस्ताक्षर किये हैं कि जो ट्रांसजेंडर तनाव, अकेलेपन व अवसाद में हैं, उन्हें रियायती दरों पर काउंसिलिंग सत्र उपलब्ध कराये जायेंगे। क्योंकि जी जा रही सच्चाइयों और आत्म-पहचान को अमान्य करके, यह विधेयक एंग्जायटी उत्पन्न कर रहा है और लोगों में आत्महत्या करने के विचार पनपने लगे हैं। लोग इसके आकांक्षित कुप्रभावों को लेकर चिंतित हैं। क्या सड़क पर चलते हुए मैं सुरक्षित रहूंगा? यह अति वास्तविक प्रश्न हैं।

दरअसल, यह विधेयक 2019 के क़ानून से सबसे महत्वपूर्ण पहलू को हटा देता है- आत्म-पहचान का अधिकार। ट्रांसजेंडरों को सामाजिक-सांस्कृतिक समूह- हिजड़ा, किन्नर, अरावानी व जोगता, तक सीमित करके यह अनेक सवाल खड़े कर देता है। उनका क्या जो इन समूह में नहीं आते? नॉन-बाइनरी व्यक्तियों का क्या? उनका क्या जो परिवर्तन में लगे हुए हैं, लेकिन प्रक्रिया अभी पूर्ण नहीं हुई है?

लैंगिक पहचान को समझना आवश्यक: ट्रांसजेंडर परिभाषा

उन 35,000 पहचान सर्टिफिकेट्स का क्या होगा, जो जारी हो चुके हैं? इन प्रश्नों का उत्तर कहीं से नहीं मिल रहा है। आगे बहस करने से पहले आवश्यक है कि इस विषय से संबंधित लैंगिक पहचान के कुछ शब्दों को संक्षेप में समझा दिया जाये। ट्रांसजेंडर शब्द हर उस व्यक्ति के लिए बोला जाता है, जिसकी लैंगिक पहचान उसके जन्म के लिंग से भिन्न हो। ट्रांस-सेक्सुअल वह व्यक्ति होते हैं, जो अपने शरीर को हॉरमोन थैरेपी व अन्य मेडिकल हस्तक्षेपों के माध्यम से बदलते हैं।

इंटरसेक्स वह व्यक्ति होते हैं, जो उन जैविक सेक्स गुणों के साथ जन्म लेते हैं, जो पुरुष या महिला की बाइनरी (द्विचर) परिभाषा में फिट नहीं बैठते। नॉन-बाइनरी एक ऐसी लैंगिक पहचान है, जो स्थिर नहीं है कि व्यक्ति खुद को पूरी तरह पुरुष या महिला के रूप में नहीं पहचानता है। इनमें से कुछ अपने आपको ट्रांसजेंडर समझते हैं, लेकिन सभी ऐसा नहीं सोचते हैं। यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि पिछली जनगणना में 4,87,803 ट्रांसजेंडर व्यक्ति रिकॉर्ड किये गये थे, जिनमें से सिर्फ 32,500 के पास सरकारी पहचान पत्र हैं।

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए प्रशासनिक सेवाओं में 1 प्रतिशत क्षितिज आरक्षण केवल कर्नाटक में लागू किया है। बहरहाल, यह विधेयक अचानक आया, न कोई पूर्व सूचना और न ही संबंधित समुदाय से कोई वार्ता। हद तो यह है कि नेशनल काउंसिल ऑ़फ ट्रांस पीपल से भी कोई मशविरा नहीं किया गया। रिटायर्ड न्यायाधीश आशा मेनन के नेतृत्व में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों पर जो सुप्रीम कोर्ट की कमेटी है, उसने सरकार से आग्रह किया है कि इस संशोधन को वापस ले लिया जाये; क्योंकि यह उन व्यक्तियों के अस्तित्व अधिकारों का इंकार है, जो जन्म के समय दी गई लिंग पहचान के अनुसार अपनी पहचान नहीं करते हैं।

डॉक्टर पहचान की बजाय शरीर की जांच पर केंद्रित होंगे

इस संशोधन में अन्य कमियां भी हैं। मेडिकल बोर्ड (यह तय करने के लिए कि कौन ट्रांसजेंडर है) को आवश्यक करने से सम्मान, गरिमा, स्वायत्तता व निजता के जो संवैधानिक सिद्धांत हैं, उनका कोई अर्थ नहीं रह जाता है। साथ ही इससे मेडिकल नौकरशाही की एक अतार्किक परत उत्पन्न होती है। डॉक्टर वास्तव में किस चीज़ की जांच करेगा, अगर लिंग का सवाल एनाटोमी की बजाय पहचान का है?

कांग्रेस की सांसद रेणुका चौधरी ने एकदम सही कहा, अगर पुरुष व महिला को अपने लिंग के बारे में मेडिकल बोर्ड को संतुष्ट नहीं करना पड़ता है, तो अन्यों को ऐसा क्यों करना चाहिए? सरकार का दावा है कि संशोधन से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की सुरक्षा होगी। इसके बावजूद वह मूल परिवार की हिंसा के बारे में कुछ नहीं कहती है, जोकि विशेषरूप से कुईर व ट्रांस व्यक्तियों के विरुद्ध हिंसक व व्याप्त है, जैसा कि अनेक रिपोर्ट्स से साबित है, जिनमें 2023 की अपनों का बहुत लगता है भी शामिल है।

मद्रास हाईकोर्ट ने 2015 में चुने गये परिवार को मान्यता दी थी, उसका क्या हुआ? वैसे सबसे चिंताजनक है राज्य का रेंगता हुआ हस्तक्षेप, जो अक्सर पैरेंट्स व समाज के स्वयंभू ठेकेदारों से सांठ-गांठ कर लेता है और उन व्यक्तियों के निजी जीवन को बर्बाद करने पर तुल जाता है जो अच्छे नागरिक की बहुसंख्यावादी परिभाषा पर खरे नहीं उतरते। भारत के 14 राज्य तो ऐसे हैं जिनमें व्यक्ति को सरकारी अधिकारी के समक्ष आस्था से संबंधित अपनी व्यक्तिगत पसंद को उचित ठहराना पड़ता है।

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उत्तराखंड में साथ रह रहे वयस्कों का सरकारी पंजीकरण जरूरी

इन राज्यों में गुजरात भी शामिल है, जिसकी विधानसभा ने आवश्यक कर दिया है कि आपस में सहमत वयस्कों को अपना विवाह पंजीकृत कराने के लिए अपने पैरेंट्स की मंजूरी लेना ज़रूरी होगा। उत्तराखंड में तो साथ रह रहे वयस्कों को भी सरकारी दफ्तर में पंजीकरण कराना आवश्यक है। सुरक्षा के नाम पर राज्य सर्टिफिकेशन की ज़रूरतों में वृद्धि कर दी गई है और हमारी अति आत्मीय चिंताओं में सरकारी अधिकारियों की शक्तियों का विस्तार कर दिया गया है। यह एक-एक करके लिए गये निर्णय नहीं हैं बल्कि शासन का विस्तृत पैटर्न है।

विजय कपूर
विजय कपूर

सरकार का फैसला यह है कि हम तय नहीं करेंगे कि हम कौन हैं बल्कि सरकार बतायेगी कि हम कौन हैं। इससे ज़ाहिर होता है कि सरकार नागरिकों को स्वायत्त प्राणियों के रूप में नहीं देखती है बल्कि उन्हें अपना ऐसा दास समझती हैं, जिन्हें रेगुलेट व सर्टिफाई किया जाना चाहिए। यह संशोधन सिर्फ एक समुदाय (ट्रांसजेंडर) के विरुद्ध ही नहीं है बल्कि इसके भी खिलाफ है कि एक नागरिक के रूप में हम क्या हैं? इसे तो वापस लिया ही जाना चाहिए। हालांकि इस संशोधन को अदालत में चुनौती दी जा सकती है, लेकिन सरकारी यू-टर्न से मालूम होता है कि जो अधिकार कड़े संघर्ष के बाद अर्जित किये जाते हैं, उन पर भी सरकार अपनी मर्जी से जब जी चाहे विराम लगा देती है।

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