जैन धर्म के शिरोमणि व महापुरुष आचार्य श्री राजेंद्र सुरीश्वर म सा को मानवता का अग्रदूत माना जाता है। मोहनखेड़ा तीर्थ के जनक आचार्य श्रीराजेंद्र सूरीश्वर म.सा. का जीवन व उनके विचारों ने समस्त जगत को नई दिशा दी। विक्रम संवत 1883 में पौष सुदी 7 को जन्मे आचार्यश्री ने महज बारह वर्ष की उम्र में अपनी शिक्षा पूरी की। उन्होंने अल्पायु में संसार छोड़कर जैन यति के रूप में नए सिरे से जीवन की शुरुआत की। अपने शुद्ध यति धर्म का पालन करते हुए, आगम का अध्ययन किया।
संवत 1920 चैत्र शुक्ल तेरस को रणकपुर तीर्थ में भगवान आदिनाथ की साक्षी में आठम तप करने का संकल्प लिया। संयमी जीवन बिताते हुए सभी यतियों को शुद्ध श्रमण धर्म का पालन करने की प्रेरणा दी। आपके साधु जीवन की उत्कृष्ट साधना एवं श्रीसंघ के निवेदन से आचार्य देव प्रमोद सुरीश्वर म.सा. ने आपको पाम संवत 1924 वैशाख सुदी 5 को आहोर राजस्थान में महा महोत्सव पूर्वक अलंकृत किया। आपको श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वर म सा के नाम से संबोधन प्रदान किया गया।
आपने सुधारवादी नौ नियम लिखे। आपकी क्रांतिकारी विचारधारा के प्रभाव से जैन समाज में नवीन वातावरण निर्मित हुआ। आपने 14 वर्ष तक कठिन अध्ययन परिश्रम करके श्री अभिधान राजेंद्र कोष (प्राकृत भाषा का ग्रंथ) की रचना की, जो इतिहास की धरोहर है। आपने साधु जीवन में अनेक जैन तीर्थ व मंदिरों की प्रतिष्ठा करवाई। आपका जन्म एवं निर्वाण दिवस पौष सुदी 7 को ही है। प्रतिवर्ष इस दिन लाखों भक्त अपनी श्रद्धा और विनय भाव से नतमस्तक होकर आपके चरणों में वंदना करने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त करते हैं।
