भगवान और भक्त में एकत्व की मर्यादा

लंका विजय के बाद जब श्रीराम, सीता और वानर सेना सहित अयोध्या लौटे तो वहां उनके स्वागत में भव्य-भोज का आयोजन किया गया। हनुमान जी ने सब वानरों के बैठकर भोजन करने की व्यवस्था कर दी। जब सब बैठ गए तो वे प्रभु के पास पहुंचे।
श्रीराम ने प्रेमपूर्वक कहा, हनुमान, तुम भी साथ बैठकर भोजन करो।
हनुमान जी दुविधा में पड़ गए, क्योंकि वे स्वयं को प्रभु का सेवक मानते थे और प्रभु के साथ बैठकर भोजन करना उन्हें उचित नहीं लगा। प्रभु उनके मन की भावना समझ गए। उन्होंने अपने केले के पत्ते में ही मध्यमा अंगुली से एक रेखा खींच दी, जिससे वह पत्ता एक भी रहा और दो भी हो गया। एक भाग में श्रीराम ने भोजन किया और दूसरे भाग में हनुमान को कराया।
इस प्रसंग में गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा है। प्रभु का संकेत था कि भक्त और भगवान में एकत्व भी है, जबकि हनुमान का भाव यह था कि जीव और परमात्मा के बीच सेवा और मर्यादा का संबंध है। यही द्वैत में अद्वैत का सिद्धांत है, जहां भक्ति, प्रेम और समर्पण से जीव परमात्मा के निकट पहुंचता है। यही जीवन का वास्तविक आत्मिक कल्याण है।
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-राजेन्द्र कुमार शर्मा
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