आदिशक्ति और हम

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चैत्र नवरात्र सर्वव्यापी आदिशक्ति से एक होने का सर्वश्रेष्ठ अवसर है, क्योंकि अष्ट सिद्धियां, नव निधियां और नवदुर्गा सब का स्रोत आदिशक्ति ही है। नवरात्रि में कई बार हमारे मन में प्रश्न उठता है कि हम शक्ति के किस स्वरूप की पूजा करें और कैसे करें? शास्त्रां में नवरात्रि के उपवास, पूजा-पाठ, घट-स्थापना, मंत्र-जाप, हवन, भोग आदि का विस्तार से वर्णन है और जितना हमसे संभव होता है, उतना हम यंत्रवत करते हैं, लेकिन इस सबसे न तो हमारे मन को शांति मिलती है और न ही शरीर को सुकून।

यदि हमें वास्तव में आदिशक्ति के योग का आनंद उठाना है तो उसकी सर्वव्यापकता को जान व पहचानकर हर पल आदिशक्ति की तरह मस्ती में रहना है। सृष्टि के आधार स्थिर तत्व शिव और चलायमान शक्ति के योग से सृष्टि प्रकट हुई और संचालित हो रही है। शक्ति चंचल है, प्राणदायनी है। इसीलिए हम सबके भीतर इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति के रूप में विद्यमान है। जगत के प्रत्येक कण, प्रत्येक स्थान, प्रत्येक काल में जगत जननी स्वयं उपस्थित है।

पंच भूतों, पंचकर्मेंद्रियों, पंच ज्ञानेंद्रियों, मन और अहंकार सबमें केवल आदिशक्ति ही क्रियाशील है, लेकिन अज्ञानतावश हम समझ लेते हैं कि कोई कार्य या तो हम कर रहे हैं या कोई दूसरा। आध्यात्मिक रहस्य यह है कि आदिशक्ति ही विविध माध्यमों से स्वयं हर कार्य व व्यवहार करती है। हम कुछ देखते हैं तब वहां स्थित दृश्य आदिशक्ति द्वारा प्रकट किया होता है।

खुद में ईश्वर को महसूस करने का मार्ग

हमारे भीतर भी वही सूक्ष्म रूप में बैठी है तथा नेत्रों के माध्यम से वही देख रही है। इसी प्रकार जब हम कुछ सुनते हैं तो हर ध्वनि आदिशक्ति का ही व्यक्त रूप है और श्रवण शक्ति के रूप में वही आदिशक्ति सुनती है। बिना आदिशक्ति की उपस्थिति के न तो नेत्र देख सकते हैं, न कान सुन सकते हैं। जीभ में स्वाद ग्रंथियों के माध्यम से वही सब रसों का स्वाद लेती है और पाचन-शक्ति उन रसों का पाचन करती है।

सभी पुष्पों व मसालों में सुगंध आदिशक्ति ने ही भरी है और घ्राण शक्ति के माध्यम से वही उनको ग्रहण करती है। इसका अर्थ हुआ कि हम कहीं हैं ही नहीं। हर रूप, रंग, स्थान, काल, सूक्ष्म, स्थूल, आकार, निराकार, सगुन, निर्गुण, आचार, व्यवहार, विचार, भाव, जड़, चेतन में आदिशक्ति व्याप्त है। आदिशक्ति अनंत रूपों में हम सबके भीतर व बाहर सर्वदा स्थित है।

इस ज्ञान में स्थित रहकर घर, परिवार, समाज, व्यापार में व्यवहार करना आदिशक्ति की सच्ची पूजा और उपासना है, क्योंकि जठराग्नि के रूप में भी वही विद्यमान है। इसलिए हम अनजाने में आदिशक्ति के उस रूप की अवहेलना करते हैं। सृष्टि में चारों ओर आदिशक्ति के अनंत रूप, रंग और आकार हैं फिर हम इसको कुछ आकारों या नव आकारों तक ही क्यों सीमित करें?

आदिशक्ति नित-नूतन आकार या निराकार रूप में है। हमें केवल सबसे निस्वार्थ प्रेम करते हुए, सबको जैसे का तैसा स्वीकारते हुए और प्रशंसा करते हुए, प्रकृति का आभार प्रकट करते हुए जीवन जीना है। आदिशक्ति ने हमसे योग किया हुआ ही है केवल हमें अपने भाव, विचार और व्यवहार से उनसे योग करना है। यह योग केवल योग नहीं महायोग है। इसी में सारी सिद्धियां और शक्तियां छुपी हुई हैं। इस रूप में नवरात्रि मनाने से आपका उद्धार निश्चित है।

सद्गुरु रमेश

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