विक्रम पंचांग के अनुसार अंग्रेजी कैलंडर के आधार पर इस साल शाकंभरी नवरात्रि पर्व 28 दिसंबर, रविवार से शुरू हो रहा है, जो 3 जनवरी, शनिवार को समाप्त होगा। शाकंभरी नवरात्रि 9 नहीं, बल्कि 8 दिनों की होती है।
सनातन धर्म में एक वर्ष में चार बार नवरात्रि पर्व मनाया जाता है- चैत्र, आषाढ़, शारदीय और माघ। इनमें दो गुप्त नवरात्रि आषाढ़ और माघ माह में आते हैं, जिनमें दस महाविद्याओं के निमित्त तंत्र-मंत्र तथा साधना की जाती है और चैत्र तथा शारदीय नवरात्रि में माता नव दुर्गा की पूजा और व्रत किए जाते हैं।
इसी कड़ी में पौष माह में शाकंभरी नवरात्रि पर्व मनाया जाता है। शाकंभरी नवरात्रि का व्रत-पूजन पौष माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से पूर्णिमा तक किया जाता है। इसमें माँ शाकंभरी की पूजा की जाती है। माँ शाकंभरी को वनस्पति की देवी माना जाता है। माँ शाकंभरी माता भगवती का ही रूप मानी जाती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां भगवती धरती को अकाल और खाद्य संकट से बचाने के लिए देवी शाकंभरी के रूप में अवतरित हुईं थीं।
पूजा विधि
शाकंभरी नवरात्रि के प्रथम दिन कलश स्थापना करें। एक चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं। उस पर गंगाजल से भरा कलश रखें। उसे लाल रंग का वस्त्र पहनाएँ। इस कलश पर जटा वाला नारियल रखें। उस पर लाल चुनरी और कलावा जरूर बांधें। एक मिट्टी के पात्र में जौ बोएँ। समस्त नवरात्रि तक उन्हें जल से सींचें। इसके बाद मां शाकंभरी को फूल, फूल माला, अक्षत, रोली, चंदन आदि पूजा सामग्री अर्पित करें। इसी तरह 8 दिनों तक माँ शाकंभरी की पूजा करें।
महत्व
शाकंभरी नवरात्रि का पर्व जीवन के मूल तत्वों का स्मरण कराता है। भोजन, जल, पेड़-पौधे और हरियाली को माँ शांकभरी की कृपा का रूप बताया जाता है। पर्व के दौरान लोग प्रकृति के संरक्षण की शपथ लेते हैं। शाकंभरी नवरात्रि राजस्थान, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में लोकप्रिय है। कर्नाटक में शाकंभरी देवी को बाणशंकरी देवी के रूप में पूजा जाता है।
