विधानसभा : अभिभावक देखभाल विधेयक पारित

हैदराबाद, विधानसभा ने रविवार को कर्मचारियों की जवाबदेही और अभिभावकीय सहायता निगरानी अधिनियम-2026 विधेयक को मंजूरी दे दी। ज्ञातव्य है कि मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने हाल ही में सरकारी नौकरियों के लिए चयनित उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र सौंपने वाले कार्यक्रमों में कई बार कहा था कि अभिभावकों के देखभाल की जिम्मेदारी को नजरअंदाज करने वाले कर्मचारियों के वेतन से 10 से 15 प्रतिशत राशि सीधे माता-पिता को देने के लिए कानून लाया जाएगा।

विधानसभा में इस विधेयक पर हुई चर्चा में भाग लेते हुए मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कहा कि माता-पिता अपनी सारी ऊर्जा अपने बच्चों के भविष्य पर लगा देते हैं, लेकिन कुछ बच्चे बड़े होने के बाद अभिभावकों की परवाह नहीं करते। उन्होंने कहा कि यह कानून बुजुर्ग माता-पिता की मदद के लिए लाया गया है। उन्होंने आगे कहा कि समाज में कुछ बच्चे ऐसा बर्ताव कर रहे हैं, जिससे पूरे समाज का सिर शर्म से झुक जाता है।

रिश्तों पर कानून लाना समाज के लिए दुखद संकेत

इस कारण रिश्तों के मुद्दे पर कानून लाना पड़ रहा है, जो दुखद है। जो इंसान अपने माता-पिता की भलाई का ध्यान नहीं रखता, उसे समाज से अलग कर देना चाहिए। उन्होंने बताया कि यह कानून केवल सरकारी कर्मचारियों पर ही नहीं बल्कि निजी कर्मचारी व जनप्रतिनिधियों पर भी लागू होता है। उन्होंने कहा कि पुराणों में माता-पिता की भक्ति का दूसरा नाम श्रवण कुमार की कहानी है। अगर सभी बच्चे श्रवण कुमार को आदर्श मानेंगे, तो इस कानून को लाने की कोई आवश्यकता ही नहीं होती। यह विधेयक बड़ी जिम्मेदारी से लाया जा रहा है।

हम इसे उन लोगों में डर पैदा के लिए ला रहे हैं, जो अपने माता-पिता के प्रति समर्पित नहीं हैं। यह बुजुर्ग माता-पिता को सुरक्षा देने की दिशा में एक अहम कदम है। रेवंत ने कहा कि वर्तमान में कुछ लोग इंसानी रिश्ते और लगाव को भूलकर भौतिक सुख-सुविधाओं, आर्थिक लाभ और दौलत की चाहत में डूबे हुए हैं। उन्होंने कहा कि बुजुर्ग माता-पिता का आँसू बहाना इस समाज के लिए अच्छा नहीं है।

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माता-पिता की देखभाल को बनाया गया कानूनी दायित्व

हमारे देश में बच्चों की सामाजिक सुरक्षा, महिला की सुरक्षा और अधिकारों के लिए कई कानून हैं। देश में बुजुर्गों की सामाजिक सुरक्षा को लेकर भी कुछ कानून हैं। बच्चों के लिए अपने माता-पिता की देखभाल को एक कानूनी जिम्मेदारी करार देते हुए केंद्र सरकार ने वर्ष 2007 में एक कानून लाया था। इसके बावजूद समाज में माता-पिता की देखभाल नहीं करने की घटनाएँ देखी जा रहे हैं। एक जमाना था जब संयुक्त परिवार हुआ करता था।

परिवार में अधिक संतान होती थी। इस कारण बच्चों में से एक अपने माता-पिता की देखभाल करता था। इन दिनों चीजें बदल गई हैं। परिवार नियोजन के चलते जोड़े एक या दो बच्चे तक सीमित हो रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि परिवार में बेटा या एक बेटी दोनों समान है। किसी परिवार में केवल बच्ची है, तो विवाह होने के बाद भी अपने अभिभावकों की देखभाल की जिम्मेदारी उस पर है। उन्होंने सदन को बताया कि सरकार इस विधेयक को एक सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में ला रही है।

हमारी कोशिश यह है कि बुजुर्ग माता-पिता में यह विश्वास पैदा करना है कि इस कानून से उनके साथ न्याय होगा। हम इस विधेयक को इस लक्ष्य से ला रहे हैं कि समाज में कोई भी माता-पिता अनाथ न हों और उन्हें अपने अंतिम दिनों में अपने देखभाल के लिए पीड़ित नहीं होना चाहिए। इससे पूर्व चर्चा में भाग लेते हुए भाजपा, मजलिस व भाकपा के सदस्यों ने इस विधेयक का समर्थन किया।

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