आरएसपी को ऐतिहासिक जीत दिलाकर इस हिमालयी देश के नये नेताओं को युवा नेपालियों ने एकदम स्पष्ट संदेश दिया है कि हमने तुम्हारे पक्ष में मतदान किया है, अब काम को अपने वायदों के अनुसार अंजाम दो। इस कामयाबी के जश्न में होली का जो गुलाल बचा था, उसे बरसा दिया गया, ढोल भी बजा दिये गये, पुरानी पार्टियों को सज़ा भी दे दी गई, लेकिन साथ ही कुछ गहरे मुद्दों- भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, कमज़ोर जन सेवाएं, भाई-भतीजावाद, राजनीतिक दंड मुक्ति और अवसरों का अभाव, का समाधान शेष है। नेपाल में इस समय भावना, विशेषकर युवाओं में, यह है कि जब तक 35-वर्षीय बालेन शाह इन समस्याओं का हल नहीं करेंगे, तब तक सितंबर क्रांति का कोई अर्थ नहीं है।
नेपाल में पुरानी राजनीतिक व्यवस्था ध्वस्त हो गई है। काठमांडू के मेयर व पूर्व रैपर बालेंद्र शाह, जो बालेन शाह के नाम से अधिक विख्यात हैं, के नेतृत्व वाली नव-निर्मित राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) की ज़बरदस्त आंधी में सभी पुरानी व स्थापित पार्टियां, जो नेपाल में राजशाही समाप्त होने के बाद सत्ता पर विभिन्न गठजोड़ों से अपना कब्ज़ा बनाये रखती थीं, सूखे पत्तों की तरह उड़ गई हैं।
इस लेख के लिखे जाने तक आरएसपी ने प्रतिनिधि सभा की 165 फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट सीटों में से 115 पर या तो जीत दर्ज कर ली थी या निर्णायक बढ़त बना ली थी, जबकि शेष 110 सीटें आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से भरी जायेंगी। नेपाल में 8-9 सितंबर 2025 को हुए ज़ेन-जी आंदोलन के बाद पहली बार आम चुनाव हुए थे और 5 मार्च 2026 को हुए मतदान में लगभग 65 प्रतिशत मतदान हुआ था, कार्यवाहक मुख्य निर्वाचन आयुक्त राम प्रसाद भंडारी के मुताबिक। ज़ेन-जी आंदोलन में 77 व्यक्तियों की मौत के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी ओली ने इस्त़ीफा दे दिया था और 12 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री की शपथ दिलायी गई थी, जोकि इस पद पर पहुंचने वाली नेपाल में पहली महिला हैं।
ज़ेन-जी आंदोलन की जीत से उभरे बालेन शाह
ज़ेन-जी आंदोलन को पुरानी राजनीतिक व्यवस्था पर चुनावी जीत में बदलने वाले बालेन शाह नेपाल के अगले प्रधानमंत्री होंगे। हिमालय देश के इस नये नेता से ज़ेन-जी ने कहा है, हमने तुम्हारे पक्ष में मतदान किया है, अब काम को सही से अंजाम दो। गौरतलब है कि नेपाल में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, महंगाई, बेरोज़गारी आदि से परेशान होकर ज़ेन-जी आंदोलन हुआ था। अब नेपाल की जनता चाहती है कि बालेन शाह उनकी उम्मीदों पर खरे उतरें और इन समस्याओं का समाधान करें। काम बहुत मुश्किल है, लेकिन असंभव नहीं है। बालेन शाह के पक्ष में मुख्य रूप से दो बातें जाती हैं।
एक, उन्हें स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ है, जिससे उनकी सरकार के अल्पमत में आने का खतरा नहीं रहेगा, जैसा कि पिछली सरकारों पर मंडराता रहता था। साथ ही उन्हें अपनी नीतियों को लागू करने व अपने वायदों को पूरा करने के लिए पूरे पांच वर्ष का समय मिलेगा। दूसरा यह कि मंझे हुए नेताओं जैसे केपी ओली, माधव कुमार, प्रचंड आदि की राजनीतिक चालों से काफी हद तक महफूज़ रहेंगे। लेकिन बालेन शाह के पास अनुभव की कमी है, बावजूद इसके कि वह काठमांडू के मेयर रहे हैं।
मेयर और प्रधानमंत्री के पद की जिम्मेदारियों में बड़ा अंतर
मेयर और प्रधानमंत्री के पदों में बहुत अंतर होता है। प्रधानमंत्री पर देश की ज़िम्मेदारी तो होती ही है, साथ ही दूसरे देशों से संबंधों में संतुलन बनाये रखने का भी दायित्व होता है। बालेन शाह के समक्ष तो सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि काठमांडू दोनों नई दिल्ली व बीजिंग से संबंधों में कैसे संतुलन बनाये रखें। आगे बढ़ने से पहले नेपाल की प्रशासनिक व्यवस्था को समझने की आवश्यकता है। नेपाल में संसदीय प्रणाली है, संघीय संसद नेपाल।
इसकी स्थापना 2018 (2074 बीएस) में हुई, जिसके दो सदन हैं- राष्ट्रीय सभा (नेशनल असेंबली) और प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑ़फ रिप्रेजेंटेटिव)। राष्ट्रीय सभा में 59 सदस्य होते हैं, जिनमें से एक-तिहाई हर दो साल पर रिटायर होते हैं यानी यह स्थायी सदन है, जिसके एक सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष तक का होता है। इस सदन के 8 सदस्यों को सात प्रांतों के इलेक्टोरल कॉलेज द्वारा चुना जाता है और तीन को सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है। इनमें से कम से कम तीन महिलाएं, एक दलित व एक सदस्य डिसेबल्ड समूह से होना ज़रूरी है।
नेपाल की प्रतिनिधि सभा का कार्यकाल और संसदीय व्यवस्था
प्रतिनिधि सभा में 275 सदस्य होते हैं, जिनमें से 165 को एकल-सदस्य चुनाव क्षेत्र से फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट-वोटिंग के माध्यम से चुना जाता है यानी एक चुनाव क्षेत्र में जिस प्रत्याशी को सबसे अधिक मत मिलते हैं, उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है। शेष 110 सदस्यों को आनुपातिक चुनावी व्यवस्था से चुना जाता है, जिसमें मतदाता पूरे नेपाल को एक चुनावी क्षेत्र मानकर राजनीतिक पार्टियों के पक्ष में मतदान करते हैं। इस बार के आम चुनाव में 65 राजनीतिक पार्टियां मैदान में थीं।
प्रतिनिधि सभा के सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष के लिए होता है या जब तक मंत्रिमंडल की सलाह पर राष्ट्रपति प्रतिनिधि सभा को भंग न कर दें। नेपाल के संविधान के अनुसार संघीय संसद सहित सभी सार्वजनिक कार्यालयों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण है। इस गारंटी के बाद से नेपाल में हर जगह महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ गया है। बहरहाल, नेपाल में जिस तेज़ी से 50-वर्षीय रबी लामिछाने एक राजनेता के रूप में उभरे हैं, उतनी तेज़ प्रगति कम ही लोगों ने की है। सियासत में आने से पहले भी वह जाने-माने चेहरा थे कि एक उत्साही टीवी प्रेज़ेंटर के रूप में हर घर में उनको पहचाना जाता था और भ्रष्टाचार का विरोध करने की वजह से उनकी ख्याति में चार चांद लग गये थे।
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2022 चुनाव से पहले आरएसपी पार्टी का गठन
साल 2022 के चुनाव से पहले उन्होंने आरएसपी का गठन किया था। वह किसी दलगत संरचना की बजाय छोटे पर्दे से आगे आये। उन्होंने किसी विचारधारा को नहीं बल्कि भ्रष्टाचार की वजह से, जो जनता में बेचैनी थी, उसे बेचा। नवंबर 2022 के चुनाव में उनकी आरएसपी ने 20 सीटें जीती थीं और वह संसद में चौथी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थीं। गठबंधन की राजनीति के दौरान लामिछाने प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड की सरकार में उप-प्रधानमंत्री व गृह मंत्री बनने में कामयाब रहे।
फिर जनवरी 2023 में नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने अवैध नागरिकता कागज़ात के आधार पर उनकी सदस्यता पर विराम लगा दिया, लेकिन उन्होंने वापसी की और नई गठबंधन सरकार में फिर गृह मंत्री बने। जब सत्ता उनके करीब नज़र आयी तो वह व्यवस्था से सौदेबाज़ी करने के लिए तैयार रहे, लेकिन अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के चलते उन्होंने अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक चाल चली। जब सितंबर 2025 में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की वजह से ज़ेन-जी आंदोलन शुरू हुआ और भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी व दमन के विरोध में विद्रोह बन गया तसे लामिछाने संदिग्ध स्थितियों में नक्क्हू जेल से बाहर आये, जहां वह विवादित सहकारिता केस के तहत बंद थे।
लामिछाने और बालेन शाह की रणनीतिक राजनीतिक साझेदारी
इस समय वह आरोपी कम व जनता के गुस्से के प्रतीक अधिक नज़र आ रहे थे, तब उन्होंने बालेन शाह से हाथ मिलाने का फैसला किया। लामिछाने ने अपनी अपील की सीमाओं को पहचाना और दिसंबर 2025 में आरएसपी में शामिल हुए बालेन शाह को प्रधानमंत्री के चेहरे के रूप में पेश किया, जबकि वह स्वयं पार्टी के अध्यक्ष बने रहे। बालेन व उनके समर्थकों को आरएसपी में लाना लामिछाने की स्मार्ट व रणनीतिक चाल साबित हुई।
आरएसपी को ऐतिहासिक जीत दिलाकर इस हिमालयी देश के नये नेताओं को युवा नेपालियों ने एकदम स्पष्ट संदेश दिया है, हमने तुम्हारे पक्ष में मतदान किया है, अब काम को अपने वायदों के अनुसार अंजाम दो। इस कामयाबी के जश्न में होली का जो गुलाल बचा था, उसे बरसा दिया गया, ढोल भी बजा दिये गये, पुरानी पार्टियों को सज़ा भी दे दी गई, लेकिन साथ ही कुछ गहरे मुद्दों- भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, कमज़ोर जन सेवाएं, भाई-भतीजावाद, राजनीतिक दंड मुक्ति और अवसरों का अभाव, का समाधान शेष है। नेपाल में इस समय भावना, विशेषकर युवाओं में, यह है कि जब तक 35-वर्षीय बालेन शाह इन समस्याओं का हल नहीं करेंगे, तब तक सितंबर क्रांति का कोई अर्थ नहीं है।
