सम्राट चौधरी के नया चेहरा और नया नारा से प.बंगाल में चलेगी भाजपा की लहर !

बिहार के मुख्यमंत्री होने के नाते सम्राट चौधरी ने बिहार मूल के मतदाताओं (खासकर हावड़ा और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले मजदूर, व्यापारी, कामगार) को निशाना बनाया हैं, जहां बिहारी समुदाय की संख्या अधिक मानी जाती है। उन्होंने बिहार में नौकरी वाला मॉडल (लगभग 50 लाख लोगों को नौकरी/रोज़गार के अवसर) का उदाहरण देकर यह वादा किया है कि बंगाल में भी उसी तरह का रोज़गार आधारित विकास सोनार बंगाल के नाम से लाया जाएगा।

बिहार में नए मुख्यमंत्री पद पर सम्राट चौधरी के चयन ने भाजपा को एक नया चेहरा और नया नारा दिया है जिसे पार्टी पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में केंद्र में लेकर चल रही है। इसी वजह से बिहार के नए प्रमुख चेहरे के इस चयन से बंगाल में भी भाजपा की लहर की बात तेज़ी से चलने लगी है। चूंकि बिहार में सम्राट चौधरी का महत्व निर्द्वन्द्व है, इसलिए पश्चिम बंगाल के लोगों में भाजपा के प्रति विश्वास और गहरा हुआ।

उल्लेखनीय है कि बिहार में नीतीश कुमार के बाद भाजपा ने पहली बार अपने प्रत्यक्ष नेता को मुख्यमंत्री बनाकर संकेत दिया है कि पार्टी अब एनडीए के नेतृत्व को भी भाजपा के नाम से ही बेचेगी। बता दें कि तारापुर की सियासत को लोक कल्याणकारी दिशा देने वाले पूर्व स्वास्थ्य मंत्री शकुनि चौधरी के यशस्वी पुत्र सम्राट चौधरी कुशवाहा (कोईरी/ओबीसी) समाज से हैं लेकिन सवर्णों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं।

लव-कुश समीकरण को साधने की भाजपा की कोशिश

तारापुर से परवत्ता के लोग इसकी गवाही देते हैं। इससे भाजपा ने बिहार के लव कुश (कुर्मी-कुशवाहा) समीकरण को अपने पक्ष में खींचने की कोशिश की है, जो राज्य की 50-60 सीटों पर असर डालता माना जाता है। साथ ही पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की तरह कोई भी बड़ा सवर्ण नेता व्यक्तिगत रूप से इनका विरोधी नहीं हो सकता।

इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की पूर्वी भारत की राजनीति को असम के मुख्यमंत्री हेमंता बिस्व सर्मा से भी बड़ा चेहरा बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के रूप में मिल गया है जिन्हें दिल्ली में भाजपा की लहर चलवाने और यूपी में भाजपा को मजबूत बनवाने के नजरिए से आगे बढ़ाया गया है। इसके पीछे बिहार के नौकरशाही की फीडबैक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, क्योंकि उनकी राजनीतिक छवि बेदाग है, इस मीडिया और राजनीतिक प्रायोजित मामलों को छोड़ दिया जाए तो।

पश्चिम बंगाल में कैसे बनी लहर

सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री पद ग्रहण करने के बाद पश्चिम बंगाल में भाजपा के प्रमुख प्रचारक के रूप में सक्रिय हुए; उन्होंने बंगाल के चुनावी दौर में बार-बार दावा किया है कि बंगाल में लोग बदलाव के लिए तैयार हैं और यहाँ भाजपा की सरकार ही बनेगी। चौधरी ने बर्बरता, घुसपैठ, रोज़गार और सोनार बंगाल की वापसी जैसे मुद्दे उठाकर बिहार मॉडल के नाम पर एक नयी राजनीतिक कहानी बंगाल में बेचनी शुरू की; इससे भाजपा को एक नया नारा और एक नया चेहरा मिल गया है, जिसे मीडिया व जनता ने भाजपा की लहर की तरह पेश किया है।

बिहार और बंगाल के बीच : खास रणनीतिक तालमेल

बिहार में ओबीसी केंद्रित और सवर्ण, दलित, अल्पसंख्यक समर्थित मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के उभार के बाद भाजपा तर्क दे रही है कि अब यह गैर सांस्कृतिक (संयुक्त तरह के राष्ट्रवादी ओबीसी) चेहरा बंगाल में भी विपक्षी भावनाओं को एकजुट कर सकता है। दोनों राज्यों में भाजपा एक ही नारा बेच रही है: पुरानी सत्ता संरचना का अंत और नई नेतृत्व पीढ़ी की शुरुआत; इसी जोड़ को देखते हुए बिहार में सम्राट के चयन को पश्चिम बंगाल में भाजपा की लहर का प्रतीक माना जा रहा है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भाजपा के प्रमुख स्टार प्रचारक के रूप में उभरे सम्राट चौधरी

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में सम्राट चौधरी भाजपा के एक प्रमुख स्टार प्रचारक और मिशन बंगाल के आगे बढ़ते चेहरे के रूप में उभरते हुए नजर आए। उनकी भूमिका मुख्यतः तीन तरह की है: नारा निर्माता, बिहारी-बंगाल जुड़ाव बनाने वाला चेहरा और ममता सरकार की आलोचना के लिए उग्र आवाज़।

उन्हें स्टार प्रचारक के रूप में जिम्मेदारी मिली, क्योंकि भाजपा ने पश्चिम बंगाल के लिए 40 स्टार प्रचारकों की सूची जारी की, जिसमें बिहार से सम्राट चौधरी को विशेष प्राथमिकता दी गई; वे बिहार के उन चुनिंदा नेताओं में हैं जिन्हें बंगाल में बड़ा चुनावी जिम्मा सौंपा गया है। उन्हें बंगाल के कई चरणों में रैलियों और चुनावी सभाओं के लिए तैयार किया गया, जहां भाजपा जीत सुनिश्चित करने की तैयारी कर रही है। वैसे आज पश्चिम बंगाल में दूसरे दौर के चुनाव होने जा रहे हैं, जहां पहले चरण में बंपर वोटिंग दर्ज की गई वहीं आज क्या और कैसे होता है, यह भी देखने वाली बात होगी।

बिहार-बंगाल कनेक्शन को भुनाना

बिहार के मुख्यमंत्री होने के नाते सम्राट चौधरी ने बिहार मूल के मतदाताओं (खासकर हावड़ा और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले मजदूर, व्यापारी, कामगार) को निशाना बनाया हैं, जहां बिहारी समुदाय की संख्या अधिक मानी जाती है। उन्होंने बिहार में नौकरी वाला मॉडल (लगभग 50 लाख लोगों को नौकरी/रोज़गार के अवसर) का उदाहरण देकर यह वादा किया है कि बंगाल में भी उसी तरह का रोज़गार आधारित विकास सोनार बंगाल के नाम से लाया जाएगा। इसके बाद बंगाल के युवाओं को नौकरी के लिए कहीं और जाने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी।

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नारा और विचारधारा संबंधी भूमिका

सम्राट चौधरी ने घुसपैठ, एनआरसी, बंगाली अस्मिता और हिंदू उत्पीड़न जैसे मुद्दों पर खुले आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा सत्ता में आकर घुसपैठियों को बाहर करेगी और बंगाली पहचान को फिर से स्थापित करेगी। वे ममता बनर्जी सरकार को अराजक, हिन्दू विरोधी और घुसपैठियों की हिमायती कहकर जनता में बदलाव की भावना जगाने की कोशिश करते नजर आए और बार-बार दावा भी किया कि इस बार बंगाल में भाजपा की ही सरकार बनेगी।

कमलेश पांडेय
कमलेश पांडेय

संक्षेप में कहें तो, सम्राट चौधरी पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए बिहार मॉडल व बदलाव की आवाज़ बनकर आगे बढ़ते दिखाई दिये, जिससे पार्टी को गैर बंगाली (खासकर बिहारी) मतदाताओं से जुड़ने और राष्ट्रवाद, घुसपैठ, रोज़गार के मुद्दे पर एकीकृत नारा बेचने में मदद मिली। सम्राट चौधरी को बंगाल चुनाव के प्रचार का जिम्मा सौंपने का यह फार्मूला कितना हिट रहा यह तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा। पर इतना तो कहा जा सकता है कि इस बार बंगाल को जीतने के लिए भाजपा ने कोई कसर बाकी नहीं रखी। पीएम मोदी से लेकर गृहमंत्री और बिहार का दांव चलने के लिए सम्राट चौधरी सबने अपने तई सब कुछ किया, अब देखना यह है कि यहाँ कमल खिल भी पाता है या नहीं।

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