बांग्लादेश चुनाव : लोकतंत्र बनाम कठमुल्लावाद के बीच संघर्ष

भारत के लिए यह चुनाव एक कूटनीतिक परीक्षा है। अब नीति व्यक्ति केंद्रित नहीं, बल्कि संस्था केंद्रित होनी चाहिए। रिश्ते सरकारों से नहीं, राज्यों से बनाए जाते हैं। यही परिपक्व कूटनीति का सिद्धांत है। भारत को बांग्लादेश के लोकतांत्रिक ढांचे, नागरिक समाज और संस्थानों के साथ संवाद बढ़ाना होगा, न कि केवल सत्ता संरचना के साथ। प्रश्न यह नहीं है कि चुनाव कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि लोकतंत्र जीतेगा या कट्टरवाद? यदि यह चुनाव संस्थागत सुधार, न्यायिक स्वतंत्रता, मीडिया स्वायत्तता और नागरिक अधिकारों की दिशा में ठोस कदम बनता है, तो यह बांग्लादेश के लोकतांत्रिक पुनर्जन्म की शुरुआत होगी।

बारह फरवरी 2026 को हुआ बांग्लादेश का आम चुनाव केवल एक संसदीय प्रक्रिया नहीं वरन् यह दक्षिण एशिया के राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने वाली ऐतिहासिक घटना है। यह चुनाव उस देश में हो रहा है जिसने पिछले दो दशकों में स्थिरता, विकास और दमन तीनों का स्वाद एक साथ चखा है। शेख हसीना युग के अंतः, छात्र आंदोलनों की आग, सत्ता परिवर्तन, अंतरिम व्यवस्था और संवैधानिक बहसों के बीच यह चुनाव एक सीधा सवाल खड़ा करता है कि बांग्लादेश लोकतंत्र की ओर बढ़ेगा या इस्लामिक कट्टरता का रास्ता पकड़ेगा या सत्ता का चेहरा बदलेगा या चरित्र? इससे भी बढ़कर वह जन आकांक्षाओं की पूर्ति कर भी पाएगा या नहीं?

केंद्रीकरण और नियंत्रण के बीच असहमति दबाई गई

छात्र आंदोलन के माध्यम से उखाड़ कर फेंक दिया जाने वाला शेख हसीना का शासन केवल सत्ता नहीं, एक पूरे राजनीतिक ढांचे का प्रतीक था। केंद्रीकरण, परिवारवाद, प्रशासनिक नियंत्रण और स्थिरता के बदले असहमति का दमन। आर्थिक विकास के आँकड़े भले प्रभावशाली रहे हों लेकिन लोकतांत्रिक स्पेस लगातार सिकुड़ता गया। विश्वविद्यालयों से लेकर मीडिया संस्थानों तक विरोध की आवाज़ें राष्ट्र विरोधी करार दी जाने लगीं। यही कारण था कि 2024-25 के दौरान उभरा जन आंदोलन केवल सरकार का विरोध नहीं, बल्कि एक पूरी राजनीतिक संस्कृति के खिलाफ विद्रोह था। या दूसरे शब्दों में कहे तो वह उच्छ्रंखल हो रहे सत्ता तंत्र के खिलाफ एक क्रांति थी।

यह विद्रोह केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहा; उसने व्यवस्था को हिला दिया। सत्ता बदली, अंतरिम सरकार बनी और जुलाई चार्टर 2025 जैसे सुधारवादी दस्तावेज़ सामने आए लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अंतरिम व्यवस्था लोकतंत्र की गारंटी नहीं होती। वह केवल संक्रमण की अवस्था होती है। संक्रमण या तो सुधार की ओर जाता है या फिर नए रूप के वर्चस्ववाद की ओर। 2026 का चुनाव इसी द्वंद्व की परिणति है और यह बांग्लादेश के भविष्य का रोड मैप तय करेगा राजनीतिक परिदृश्य में इस समय सबसे मजबूत शक्ति के रूप में उभर रहा है जमात-ए-इस्लामी गठबंधन।

सत्ता और समाज के ध्रुवीकरण का दीर्घकालिक प्रोजेक्ट जारी

यह गठबंधन केवल सत्ता की लड़ाई नहीं लड़ रहा, बल्कि वैचारिक पुनर्संरचना की कोशिश कर रहा है। जमात-ए-इस्लामी की सक्रिय भूमिका यह संकेत देती है कि धर्म आधारित राजनीति फिर से केंद्र में आने की कोशिश कर रही है। यह सिर्फ चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि समाज के ध्रुवीकरण का दीर्घकालिक प्रोजेक्ट है। इसके समानांतर बांग्लादेश नेशनल पार्टी जैसी शक्तियाँ लोकतांत्रिक सुधार, संस्थागत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की भाषा बोल रही हैं लेकिन संगठनात्मक मजबूती के अभाव में उनका प्रभाव सीमित दिखता है जबकि देश के सबसे प्रभावी राजनीतिक दल बांग्लादेश अवामी पार्टी को पहले ही चुनाव की रेस से बाहर कर दिया गया है, यह चुनाव दो धाराओं की टकराहट है।

एक ओर सत्ता केंद्रित, गठबंधन आधारित, पहचान राजनीति; दूसरी ओर सुधारवादी, संस्थागत और नागरिक अधिकार आधारित राजनीति। लेकिन इतिहास बताता है कि भावनात्मक राजनीति अक्सर संस्थागत राजनीति पर भारी पड़ती है। यही कारण है कि वर्तमान राजनीतिक गणित जमात-ए-इस्लामी गठबंधन को बढ़त देता दिखाई दे रहा है। यदि यह गठबंधन सत्ता में आता है, तो वह केवल सरकार नहीं बनाएगा, बल्कि बांग्लादेश की वैचारिक दिशा भी बदलेगा। इससे भले ही वहां के अवाम के एक बड़े वर्ग की आकांक्षाओं की पूर्ति हो जाए लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश के आगे एक बड़ा प्रश्न वाचक चिन्ह भी लगने की पूरी आशंका है।

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बांग्लादेश बदलाव की गूंज दक्षिण एशिया में महसूस होगी

यह बदलाव केवल ढाका तक सीमित नहीं रहेगा। इसकी गूंज दिल्ली, बीजिंग, वाशिंगटन और इस्लामाबाद तक सुनाई देगी। भारत बांग्लादेश संबंधों का पूरा ढांचा शेख हसीना के दौर में विश्वास, सुरक्षा सहयोग और आर्थिक साझेदारी पर टिका था। सीमा प्रबंधन, आतंकवाद निरोध, व्यापारिक गलियारे और कनेक्टिविटी परियोजनाएँ- इन सबकी नींव राजनीतिक विश्वास पर रखी गई थी। अब यदि सत्ता समीकरण बदलता है, तो यह विश्वास संरचना कमजोर होगी।

यदि जमात-ए-इस्लामी सत्ता में आता है तो भारत के लिए तीन स्तरों पर चुनौती खड़ी होगी- रणनीतिक, सुरक्षा और कूटनीतिक। रणनीतिक रूप से चीन की भूमिका बढ़ेगी, क्योंकि नई सरकार बहुध्रुवीय संतुलन की नीति अपनाएगी ऐसा अंदेशा है। सुरक्षा स्तर पर सीमा प्रबंधन, कट्टरपंथी नेटवर्क और अवैध गतिविधियों का जोखिम बढ़ेगा। कूटनीतिक स्तर पर भारत-बांग्लादेश संबंध सहयोग से संतुलन की ओर खिसक सकते हैं। यानी रणनीतिक साझेदारी से रणनीतिक प्रबंधन की राजनीति।

लेकिन यह भी सच है कि आधुनिक राज्य केवल विचारधाराओं से नहीं चलते, हितों से चलते हैं। व्यापार, ऊर्जा, ट्रांजिट और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ किसी भी सरकार को भारत से दूरी बनाकर चलना कठिन होगा। यही कारण है कि संभावित नई सरकार भले ही राजनीतिक बयानबाज़ी में तीखी हो, लेकिन नीतिगत स्तर पर पूर्ण टकराव की नीति अपनाना उसके लिए व्यावहारिक नहीं होगा।

नीति अब व्यक्ति केंद्रित नहीं, बल्कि संस्था केंद्रित होनी चाहिए

भारत के लिए यह चुनाव एक कूटनीतिक परीक्षा है। अब नीति व्यक्ति केंद्रित नहीं, बल्कि संस्था केंद्रित होनी चाहिए। रिश्ते सरकारों से नहीं, राज्यों से बनाए जाते हैं। यही परिपक्व कूटनीति का सिद्धांत है। भारत को बांग्लादेश के लोकतांत्रिक ढांचे, नागरिक समाज और संस्थानों के साथ संवाद बढ़ाना होगा, न कि केवल सत्ता संरचना के साथ। प्रश्न यह नहीं है कि चुनाव कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि लोकतंत्र जीतेगा या कट्टरवाद? यदि यह चुनाव संस्थागत सुधार, न्यायिक स्वतंत्रता, मीडिया स्वायत्तता और नागरिक अधिकारों की दिशा में ठोस कदम बनता है, तो यह बांग्लादेश के लोकतांत्रिक पुनर्जन्म की शुरुआत होगी।

डॉ घनश्याम बादल

बांग्लादेश का यह चुनाव इसलिए ऐतिहासिक है, क्योंकि अब यही तय करेगा कि वह राष्ट्र लोकतंत्र को एक व्यवस्था मानता है या केवल एक प्रक्रिया। भारत के लिए भी यह चुनाव एक आईना है। क्षेत्रीय राजनीति में नैतिकता, हित और यथार्थवाद के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। यह चुनाव दक्षिण एशिया के लोकतंत्र का तापमान मापने वाला थर्मामीटर सिद्ध होने जा रहा है और इस थर्मामीटर का परिणाम केवल ढाका में नहीं पढ़ा जाएगा-दिल्ली भी उसे ध्यान से पढ़ेगी। इन चुनाव के परिणाम केवल पढ़े ही नहीं जाएंगे बल्कि बांग्लादेश की भविष्य की दशा-दिशा और वहां की प्रगति एवं विकास की नई इमारत भी लिखेंगे। प्रबल संभावना है कि इन चुनाव के साथ मोहम्मद यूनुस की विदाई हो जाएगी लेकिन यदि चुनाव परिणाम स्पष्ट नहीं रहे तो फिर बांग्लादेश में प्रतिवादी एवं कंजरवेटिव ताकतों में एक नए संघर्ष की शुरुआत भी हो सकती है।

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