आखिर इस बंपर वोटिंग के मायने क्या हैं ?
इस बार के इन तीनों विधानसभा चुनावों में पूरी तरह से स्थानीय मुद्दे हावी थे, जैसे असम में विकास के साथ एनआरसी और बाहरी और भीतरी राजनीति का मुद्दा। इसी तरह केरलम में रोजगार और कल्याण योजनाएं तथा पुड्डुचेरी में स्थानीय प्रशासन और स्थिर सत्ता या सत्ता की स्थिरता चुनाव के केंद्र में थी, जिससे पता चलता है कि इन तीन राज्यों के चुनाव पूरी तरह से स्थानीय मुद्दों पर आधारित थे। इस बार के इन तीनों विधानसभा चुनावों के नतीजों का एक भावी असर 2029 के लोकसभा चुनावों की दिशा संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि पांच विधानसभाओं के लिए हो रहे चुनाव दरअसल, कहीं न कहीं 2029 के चुनावों का सेमीफाइनल हैं। अगर इन चुनावों में बीजेपी का विस्तार जारी रहता है, तो इसका मतलब है कि 2029 का लोकसभा चुनावों का नतीजा भी इसके खाते में जा सकता है। कुल मिलाकर तीन राज्यों में जो ज्यादा वोटिंग हुई हैं, कहीं न कहीं उसके नतीजे बिल्कुल निर्णायक और अपने आपमें राजनीतिक संदेश लिए होंगे।
असम, केरलम व पुड्डुचेरी की 296 विधानसभा सीटों के लिए 9 अप्रैल 2026 को सम्पन्न चुनावों में जबर्दस्त वोटिंग हुई है। इस बंपर वोटिंग के ट्रेंड को इस बात से जाना जा सकता है कि वैसे तो इन दोनों राज्यों और पुड्डुचेरी जैसे केंद्र शासित राज्य में हमेशा से वोटिंग ज्यादा होती रही है। लेकिन ज्यादा मतदान वाले इन प्रदेशों में इस बार उससे भी ज्यादा वोटिंग हुई है, तो आखिर इस बंपर मतदान के मायने क्या हैं?
असम में पिछली बार यानी 2021 में 82.42 फीसदी, 2016 में 84.72 फीसदी और उसके पहले 2011 में 75 फीसदी मतदान हुआ था। लेकिन इस बार मतदान का प्रतिशत 85.38 फीसदी रहा, जो कि 2021 के मुकाबले लगभग 3 फीसदी, 2016 के मुकाबले लगभग 1 फीसदी और 2011 के मुकाबले मतलब 10 फीसदी ज्यादा रहा। जब 2011 के मुकाबले 2016 में भाजपा को 10 फीसदी बड़ा जंप मिला था, तब कांग्रेस हार गई थी और बीजेपी पहली बार सत्ता में आयी थी।
बंपर मतदान के बीच भाजपा के प्रदर्शन पर नजर
हालांकि 2021 में यह बंपर वोटिंग का फीसदी भाजपा के खाते में सिर्फ 2.3 फीसदी ही रह गया या दूसरे शब्दों में कहें तो 2016 के मुकाबले भाजपा के पक्ष में गिरे मत 2.3 फीसदी कम हो गये। फिर भी भाजपा की सरकार बनी रही, तो क्या इस बार जबकि पिछले 20 सालों में सबसे ज्यादा मतदान हुआ है, तो इसके कुछ खास संकेत हैं। अंतिम नतीजे तो 4 मई 2026 को ही आएंगे, लेकिन इस बंपर मतदान को देखकर सभी पार्टियां अपने-अपने ढंग से इनका विश्लेषण करने में लगी हैं।
कुछ का मानना है कि 2021 के मुकाबले 3 फीसदी ज्यादा मतों का मतलब है मतदाता भाजपा की सरकार को हटाना चाहते हैं, इसलिए अब तक के चुनावों का यह ऐतिहासिक मत प्रतिशत सामने आया है। दूसरी तरफ भाजपा और उसके सहयोगियों का मानना है कि लगातार दो टर्म सत्ता में रहने के बाद भी अगर मत प्रतिशत बढ़ा है, तो उसका मतलब है मतदाता हिमंता बिस्व सरमा की सरकार वापस चाहते हैं, इसलिए जबर्दस्त मतदान हुआ है।
अब दोनों में से किसका आंकलन सही होगा, पक्ष का या विपक्ष का यह तो 4 मई को ही पता चलेगा। लेकिन यह बात तो तय है कि असम में कुछ आर-पार होने जा रहा है। कम सीटें जीतकर तो शायद भाजपा दोबारा सत्ता में नहीं लौट रही या तो भाजपा चकित करते हुए भारी बहुमत से जीतेगी या फिर कांग्रेस और उसके सहयोगी मिलकर सरकार बनाएंगे। मतदान के हिसाब से देखें तो कुछ ऐसा ही केरलम में भी नजर आता है।
कम वोटिंग के बावजूद 2021 में एलडीएफ की मजबूत जीत
हालांकि केरलम में महज 1 फीसदी मतदान में वृद्धि हुई है। 2021 में जहां 77.27 प्रतिशत मतदान हुआ था, वहीं इस बार 78.27 प्रतिशत मतदान रहा यानी दोनों बार के मतदान में सिर्फ एक फीसदी का फर्क है और केरलम के मामले में एक फीसदी मतदान भी इधर से उधर होने पर बड़े बदलाव हो जाते हैं। हालांकि इसका अपवाद भी है। 2021 में 2 से 3 प्रतिशत वोटिंग कम होने के बावजूद एलडीएफ न केवल जीता था बल्कि मजबूत भी हुआ था। लेकिन यह हर बार ऐसा नहीं होता।
आमतौर पर केरलम में 3 प्रतिशत तक बढ़ा मतदान निर्णायक होता है, लेकिन इस बार केरलम में बदलाव महज 1 फीसदी का हुआ है। इस बार केरलम में पिछले बार के मुकाबले 1 फीसदी मतदान ज्यादा हुआ है। इसलिए अगर पिछले बार के ट्रेंड को ध्यान में रखें तो लगता है केरलम में मौजूदा सरकार ही सत्ता में लौट रही है। अगर ऐसा हुआ तो केरलम के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन फिर से सत्ता में आ सकते हैं और अगर ये हुआ तो केरलम में पिछले 70 सालों में यह पहली हैट्रिक होगी।
जबकि पुड्डुचेरी में जो ट्रेंड देखने को मिल रहे हैं, उससे लगता है कांग्रेस से निकले एन. रंगास्वामी पांचवीं बार सत्ता में काबिज हो सकते हैं। केरलम में कुल 140 विधानसभा सीटें हैं और 2.7 करोड़ कुल मतदाता हैं, जिनके बीच विभिन्न पार्टियों के 833 प्रत्याशी मैदान में थे, अब 4 मई को पता चलेगा कि इनमें से किन-किन प्रत्याशियों की किस्मत चमकेगी और किनकी डूब जायेगी।
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पुड्डुचेरी में 294 प्रत्याशियों की किस्मत दांव पर
पुड्डुचेरी में कुल 30 विधानसभा सीटें हैं और यहां कुल मतदाता 9.5 लाख हैं। इन मतदाताओं के बीच 294 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे थे। अब पता चलेगा उनमें से कितनों को जीत नसीब होती है। इस तरह तीनों राज्यों के 1899 विधानसभा चुनाव के प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम में बंद है और जब तक अंतिम रूप से वास्तविक नतीजे नहीं आ जाते, तब तक यही कयास लगाये जाते रहेंगे कि आखिर इस साल तीनों प्रदेशों में जो पिछले चुनावों से ज्यादा मतदान हुआ है, उसका क्या होगा?
क्या यह भारी मतदान एंटी इंकम्बेंसी की तरफ संकेत कर रहा है या फिर सत्ता में काबिज सितारों को ही फिर से चमकने वाला बनाने की ओर इशारे कर रहा है। क्योंकि जब भी मतदान सामान्य से ज्यादा होता है, तो इसके दो ही संकेत माने जाते हैं या तो मतदाता सरकार से संतुष्ट नहीं है और वह उसे बदलने के लिए ज्यादा से ज्यादा वोटिंग कर रहे हैं या फिर ये सरकार से संतुष्ट हैं और ज्यादा मतदान करके उसे सत्ता में बनाये रखना चाहते हैं।
हालांकि ज्यादा मतदान के कुछ भी नतीजे हो सकते हैं, लेकिन आमतौर पर ये होता है कि नतीजे निर्णायक होते हैं, चाहे वह सत्ता के पक्ष में हो या विरोध में। इसलिए जब ज्यादा मतदान हो तो या तो यह मजबूत ध्रुवीकरण का संकेत होता है अथवा मतदाताओं की जागरुकता का संकेत होता है कि वह हर हाल में परिवर्तन चाहते हैं। कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि हाल के महीनों में जिस तरह चुनाव आयोग की गतिविधियां सुर्खियों में रही हैं, उससे मतदाताओं का चाहे पॉजीटिव शिक्षण हुआ हो या निगेटिव, लेकिन हाल के महीनों में मतदाता अपने मताधिकार को लेकर काफी हद तक शिक्षित हुए हैं।
अपने मत की कीमत समझकर बढ़ा मतदान प्रतिशत
जिस तरह राजनीतिक पार्टियों ने मतदाताओं के नामों को मतदाता सूची से काटने या जोड़ने को लेकर राजनीतिक आंदोलन किया है, उससे चाहे वो हुआ हो, पर मतदाता तो यह समझे ही हैं कि उनका मत कीमती है और शायद इसलिए 9 अप्रैल 2026 को इन तीन राज्यों में सम्पन्न विधानसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया है।
केरलम में विशेषकर महिलाओं और शहरी वोटरों की बढ़ी भागीदारी में इसे चिन्हित किया जा सकता है। एक बात यह भी हो सकती है कि इस बार के इन तीनों विधानसभा चुनावों में पूरी तरह से स्थानीय मुद्दे हावी थे, जैसे असम में विकास के साथ एनआरसी और बाहरी और भीतरी राजनीति का मुद्दा। इसी तरह केरलम में रोजगार और कल्याण योजनाएं तथा पुड्डुचेरी में स्थानीय प्रशासन और स्थिर सत्ता या सत्ता की स्थिरता चुनाव के केंद्र में थी, जिससे पता चलता है कि इन तीन राज्यों के चुनाव पूरी तरह से स्थानीय मुद्दों पर आधारित थे।

इस बार के इन तीनों विधानसभा चुनावों के नतीजों का एक भावी असर 2029 के लोकसभा चुनावों की दिशा संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि पांच विधानसभाओं के लिए हो रहे चुनाव दरअसल, कहीं न कहीं 2029 के चुनावों का सेमीफाइनल हैं। अगर इन चुनावों में बीजेपी का विस्तार जारी रहता है, तो इसका मतलब है कि 2029 का लोकसभा चुनावों का नतीजा भी इसके खाते में जा सकता है। कुल मिलाकर तीन राज्यों में जो ज्यादा वोटिंग हुई हैं, कहीं न कहीं उसके नतीजे बिल्कुल निर्णायक और अपने आपमें राजनीतिक संदेश लिए होंगे।
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