दान पुण्य कारक नहीं, बल्कि मुक्ति दायक : रमेशजी
हैदराबाद, दान देने वाला नहीं, बल्कि दान लेने वाला पुण्य पाता है, क्योंकि वह दान स्वीकार कर हमें उस वस्तु, धन आदि के मोह से मुक्त करता है। भौतिक वस्तुओं या धन आदि के दान से श्रेष्ठ है। ज्ञान का दान और उससे बेहतर है अभय दान, लेकिन अपने अहम का दान सर्वश्रेष्ठ है।
उक्त उद्गार सद्गुरु रमेशजी ने क्वालिटी इन रेजीडेंसी में आज आयोजित सत्संग में व्यक्त किए। रमेशजी ने कहा कि दान शब्द सुनते ही हमारे मन में सबसे पहले यह बात आती है कि हमारे पास कितना अतिरिक्त धन या वस्तुएँ हैं, जिनका हम दान कर सकते हैं। परमात्मा ने दान का लाभ केवल अमीर लोगों के लिए ही नहीं रखा। हर व्यक्ति जिसको परमात्मा ने स्वस्थ शरीर, मन, बुद्धि, इंद्रियाँ आदि दी हैं, वह अपनी सेवा, प्रार्थना, भावना द्वारा दान कर सकते हैं।
जो व्यक्ति दिल से अमीर है, वह हर परिस्थिति में खुश रहता है और यह सबसे बड़ी अमीरी है। पैसों की अमीरी होते हुए भी मन से खुश न होना सबसे बड़ी गरीबी है। यदि आपका दिल जरूरतमंदों की सहायता- सेवा करना चाहता है, तो ब्रह्मांड आपको अवश्य इसके लिए समर्थ बनाता है। हमारे दिल की भावनाएँ हमारे जीवन में धन को आकर्षित करती हैं और सर्वश्रेष्ठ धन है प्राण धन। जब किसी संत, ज्ञानी या गुरु की शरण में जाकर हमें यह ज्ञान हो जाता है कि इस ब्रह्मांड में सभी प्राणी उसी एकमात्र प्राण का परिवर्तित रूप हैं, तो हमारे राग-द्वेष मिट जाते हैं और अहंकार भी चला जाता है।
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ज्ञान का दान व्यक्ति की जिज्ञासा अनुसार किया जाना चाहिए
रमेशजी ने कहा कि यदि कोई लेने वाला है, तो हम वस्तुओं- धन आदि का दान इच्छा और अपनी शक्ति अनुसार कर सकते हैं, लेकिन ज्ञान का दान हमें सामने वाले की जिज्ञासा के अनुसार ही करना चाहिए। अभय दान तो सभी को दिया जा सकता है, लेकिन अहम का दान बिना गुरु की कृपा के संभव नहीं है। हम प्राणी का अर्थ केवल जीवों तक ही सीमित रखते हैं, जबकि प्रह्लाद की भक्ति भावना ने यह सिद्ध कर दिया कि खंबे में भी प्राण हैं, तभी तो उसमें से नरसिंह भगवान प्रकट हुए। रहस्य यह है कि संपूर्ण जड़-चेतन में प्राण का वास है, इसीलिए भगवान की मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा के बाद पूजा-अर्चना की जाती है। पूर्णानंद स्वामीजी भावना के दान द्वारा भी जगत का कल्याण करते रहे हैं।
अवसर पर गुरु माँ ने अपरिग्रह का ज्ञान देते हुए कहा कि हम जिस चीज का भी दान करते हैं, उसके बंधन से हमें तुरंत मुक्ति मिल जाती है। वास्तुओं, व्यक्तियों, धन, शरीर आदि में हमारा जो मोह है, वह दान करने से कम होता है और हमें मुक्ति की ओर ले जाता है। जैसे राजा जनक ने अपना तन-मन-धन सब कुछ ऋषि अष्टावक्र को समर्पित कर दिया था। फिर उनके एक प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने राजकाज चलाया। जब हम अपने परिवारजनों, सगे संबंधियों आदि को भी मन से गुरु या भगवान को समर्पित कर देते हैं, तो उनके जीवन की व हमारे जीवन की सबकी जिम्मेदारी परमात्मा या गुरु पर हो जाती है और हम जिम्मेदारियों के बोझ से मुक्त आनंद में स्थित रहते हैं। दान हमें हर प्रकार के मोह से मुक्त करता है और मुक्ति ही मोक्ष है।
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