मन का फ़िल्टर साफ़ करो

हम सभी बचपन से ही पसंद और नापसंद की मजबूत भावनाओं के साथ पैदा होते हैं, जो हमारे व्यक्तित्व को आकार देने में बहुत बड़ी भूमिका अदा करती हैं। यही कारण है कि आज माताएं अपने बच्चों के स्वभाव को वर्णित करने के लिए विभिन्न वक्तव्यों का सहारा लेती हैं, मसलन ‘मेरे बेटे को हरे रंग की सब्जी बिल्कुल पसंद नहीं है।’,
‘मेरी बेटी दूध पीते ही उलटी कर देती है।’, ‘मेरे बच्चे को उसकी स्कूल यूनिफोर्म का रंग पसंद ही नहीं है।’ आदि वक्तव्यों को देखते हुए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि एक-दूसरों के लिए नापसंद की भावना हमारे जीवन में संघर्ष और तनाव का सबसे बड़ा कारण है।
दृष्टिकोण बदलें, जीवन बदल जाएगा
इससे नकारात्मकता की मजबूत भावना हमारे दिल और दिमाग को अपने काबू में कर लेती है। अतः इससे बचकर रहना अति आवश्यक है। क्या हमने कभी इस बात पर गंभीरता से विचार किया है कि हममें से कितने लोग दूसरों के दोष और गलतियों के बारे में सोच-सोचकर अपना बहुमूल्य समय बर्बाद करते हैं? यकीनन हममें से अधिकांश ऐसी गतिविधि में माहिर होते हैं। कुछ लोग इस गतिविधि में इतने उलझे रहते हैं कि उनकी रातों की नींद और दिन का चैन भी गायब हो जाता है। क्या मनुष्य जन्म हमने यह सब खेल करने के लिए लिया है?
क्यों हम अपने दृष्टिकोण में ऐसा परिवर्तन नहीं लाते हैं, जो हमारे भीतर की प्रतिक्रिया में नकारात्मक से सकारात्मक परिवर्तन आ जाए? क्या यह इतना कठिन कार्य है? नहीं! इसके लिए ज़रूरत है तो केवल अपने दृष्टिकोण रूपी चश्मे को बदलने की, जिससे हम सभी के प्रति एक सकारात्मक दृष्टि बनाए रखने में सक्षम बनें। यदि हम अपने जीवन के बीते कुछ वर्षों की ओर झांककर देखेंगे तो हमें बड़ी आसानी से महसूस होगा कि हम दूसरों के साथ सबसे अधिक दुःखी तभी रहे हैं, जब आप से असंतुष्ट रहे हैं।
खुद से नाखुशी ही असली समस्या
अतः यह स्पष्ट रूप से सिद्ध होता है कि जब हम भीतर से असंतुष्ट होते हैं, तब उस असंतोष का वास्तविक कारण जानने के बिना ही हम स्वतः हर किसी से परेशान और दुःखी हो जाते हैं। स्वयं के प्रति हमारे स्पष्ट नजरिए व दृष्टिकोण के अभाव में असंतोष, परेशानी और दुःख का यह चक्र निरंतर चलता रहता है, इसलिए इसे रोकने के लिए हमें कुछ क्षणों के लिए आत्म अवलोकन करके अपने आपसे यह पूछना चाहिए कि मैं खुद को मन-दर्पण में कैसे देखता हूँ?
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खुद के बारे में मेरा दृष्टिकोण क्या है? द्वारा मनोवैज्ञानिकों इस तथ्य को सिद्ध किया गया है कि आम तौर पर लोगों को ‘वे कौन है?’, ‘वे कैसे है?’, ‘इस बात की बड़ी परेशानी या नाखुशी रहती है।’ अर्थात अधिकांश लोग अपने आप से ही नाखुश रहते हैं, न की दूसरों से। तो इसका सीधा मतलब यही हुआ कि यदि हम अपने बारे में सकारात्मक मनोदृष्टि नहीं रखते हैं, तो किस आधार पर दूसरों के बारे में सकारात्मक बन सकते हैं? अतः इस समस्या का एकमात्र समाधान यही है कि हम यह सुनिश्चित करें कि हमारा खुद के प्रति सकारात्मक नजरिया बना रहे।
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