बाजे अयोध्या में बधाई देखो जन्मे प्रभु राम

अयोध्या के राजा दशरथ के कोई संतान नहीं थी, जिससे वे बहुत चिंतित रहते थे। उन्होंने अपने गुरु महर्षि वशिष्ठ से इस समस्या का समाधान पूछा। गुरु वशिष्ठ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति के लिए विशेष यज्ञ कराने की सलाह दी। राजा दशरथ ने विधि-विधान से पुत्रकामेष्टि यज्ञ का आयोजन करवाया, जिसमें कई त्रषि-मुनि और विद्वान आमंत्रित किए गए।

यज्ञ पूर्ण होने के बाद अग्निदेव प्रकट हुए। उन्होंने राजा दशरथ को प्रसाद के रूप में खीर प्रदान की। राजा दशरथ ने वह प्रसाद अपनी तीनों रानियों (कौशल्या, कैकयी और सुमित्रा) में बांट दिया। उस प्रसाद के प्रभाव से तीनों रानियों ने गर्भधारण किया। समय आने पर चैत्र मास की शुक्ल नवमी तिथि को माता कौशल्या ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिनका नाम राम रखा गया।

इसके बाद माता कैकयी ने भरत को और माता सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया। चारों राजकुमारों के जन्म से अयोध्या में खुशी की लहर दौड़ गई और पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया। बड़े होने पर भगवान श्रीराम ने गुरु वशिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की और वे शस्त्र-विद्या, नीति और धर्म में निपुण हो गए। उन्होंने सीता स्वयंवर में भगवान शिव का धनुष तोड़कर माता सीता से विवाह किया।

भगवान राम ने अपने जीवन में हमेशा धर्म और सत्य का पालन किया। पिता की आज्ञा का सम्मान करते हुए उन्होंने चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया और वन में रहते हुए रावण का वध करके धर्म की स्थापना की। भगवान श्रीराम ने अपने जीवन से आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति और आदर्श राजा बनने का उदाहरण प्रस्तुत किया। यही कारण है कि उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है।

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