दिल्ली 2025: निशाने पर महिलाएँ

लो जी, आ गए दिल्ली के विधानसभा चुनाव भी। देश भर के अनुभवों का यह सबक सब पार्टियों ने कंठस्थ कर लिया है कि हर सफल पार्टी के पीछे महिलाएँ होती हैं। इसलिए कम से कम चुनाव प्रचार में तो सारे दिग्गज महिलाओं को ही आगे करके चलेंगे। बिगड़ैलों को भी कभी किसी के गाल और कभी हिरनी-सी चाल याद आने की वजह भी शायद यही है! तय है कि दिल्ली का राजनीतिक भविष्य तय करने में लगभग 70 लाख महिला मतदाताओं का रोल अहम रहने वाला है।

सयाने ध्यान दिला रहे हैं कि अतीत में पितृसत्तात्मक मानदंडों और सामाजिक बाधाओं के चलते दिल्ली की चुनावी प्रािढया में महिलाओं की भागीदारी काफी सीमित थी। लेकिन हाल के वर्षों में इस स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। महिलाओं के बीच साक्षरता दर में वृद्धि ने सीधे तौर पर उच्च मतदान में योगदान दिया है।इस तथ्य को समझने की ज़रूरत है कि महिला साक्षरता में 1 प्रतिशत की वृद्धि होने से महिलाओं की मतदाता भागीदारी में 25 प्रतिशत तक वृद्धि होती है! यह उछाल उन मुद्दों को भी दर्शाता है जो सीधे महिलाओं के जीवन को प्रभावित करते हैं, जैसे सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार के अवसर। महिला मतदाता अब अधिक जानकारी प्राप्त कर रही हैं, अधिक आत्मविश्वासी हो रही हैं और सियासी पार्टियों को उनके वादों के लिए जवाबदेह ठहराने को तैयार हैं।

इस बदलते परिदृश्य के जवाब में, दिल्ली दंगल के प्रमुख सियासी पहलवान – आम आदमी पार्टी (आप), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) – महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए लक्षित रणनीतियाँ अपना रहे हैं। आप ने अपने शासनकाल में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा पर ज़ोर दिया है। वर्तमान अभियान में उसने महिलाओं की सुरक्षा पर केंद्रित पहलें पेश की हैं। इनमें शहर भर में सीसीटीवी कैमरे लगाने और महिलाओं के लिए मुफ्त सार्वजनिक परिवहन प्रदान करने के वादे शामिल हैं।ये उपाय दिल्ली में महिलाओं को एक सुरक्षित और बेहतर वातावरण मुहैया करा सकते हैं। भाजपा ने महिला मतदाताओं को जुटाने के लिए, डेटा-चालित नज़रिया अपनाया है। कहा जाता है कि 2024 के आम चुनावों में नई दिल्ली में चलाए गए एक गुप्त चुनाव युद्ध कक्ष ने भारत भर में 1 करोड़ 25 लाख महिला मतदाताओं को जुटाने में अहम भूमिका निभाई थी। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा आयोजित बैठकों की निगरानी सरल ऐप के माध्यम से करता है। उसे उम्मीद है कि यह ऐप महिला मतदाताओं को आकर्षित करने में अहम रोल अदा करेगा। कांग्रेस पार्टी ने परिवारों की महिला प्रमुखों को नकद धनराशि का वादा किया है। इस पहल का उद्देश्य उन्हें आर्थिक सशक्तीकरण प्रदान कर समानता पर लाना है।

कहना न होगा कि ये तमाम रणनीतियाँ महिलाओं के बढ़ते चुनावी महत्व की स्वीकृति का प्रतीक हैं। लेकिन इन रणनीतिकारों को यह भी न भूलना चाहिए कि महिला मतदाता भी अब अधिक विवेकपूर्ण हो चुकी हैं। वे प्रतीकात्मक इशारों की तुलना में सार्थक नीतिगत परिवर्तनों को प्राथमिकता देती हैं। अत असंभव नहीं कि जो पार्टियाँ महिलाओं के दैनिक जीवन में ठोस सुधार का विश्वास दिला सकेंगी, वे ही बदले में महिलाओं का विश्वास और वोट पा सकेंगी।

यहाँ यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि नेताओं के तमाम ज़बानी जमा-खर्च के बावजूद दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा दयनीय स्थिति में है। वक़्त आ गया है कि पार्टियों को न केवल समाधान प्रस्तावित करने चाहिए, बल्कि कानूनों को लागू करने और एक सुरक्षित वातावरण बनाने के लिए प्रतिबद्धता भी प्रदर्शित करनी चाहिए। इसी तरह, माना कि नकद भुगतान से तत्काल राहत मिलती है; लेकिन नौकरी के अवसरों, कौशल विकास और महिला उद्यमियों के समर्थन के माध्यम से सतत आर्थिक सशक्तीकरण का अधिक स्थायी प्रभाव हो सकता है। पर पार्टियाँ हैं कि समस्याओं के स्थायी समाधान के बजाय लुभाने-रिझाने की पैंतरेबाज़ी पर ज़्यादा यकीन करती दिखाई दे रही है। चुनावी लोकतंत्र की इस विडंबना को क्या कहा जाए?
काश, सियासी पार्टियाँ सतही वादों से आगे बढ़कर कभी तो महिलाओं के साथ सार्थक संवाद में शामिल होतीं, उनकी बहुआयामी चिंताओं को समझ और सुलझा सकतीं!

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