परिसीमन दक्षिण के लिए घातक : रेवंत रेड्डी
हैदराबाद, मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने शुक्रवार को परिसीमन का जोरदार विरोध करते हुए कहा कि इससे दक्षिणी राज्य अप्रासंगिक हो जाएँगे। उन्होंने इस पर एक नया फार्मूला बनाने की मांग करते हुए कहा कि यदि जनसंख्या को भी आधार बनाया जाता है, तो दक्षिणी राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण की सजा मिलेगा और उत्तरी राज्य दक्षिण पर हावी हो जाएंगे। उन्होंने केंद्र की भाजपा नीत सरकार के उस प्रस्ताव पर अपनी गहरी चिंता जताई है, जिसमें निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के ज़रिए सभी राज्यों में लोकसभा सीटों में एक समान 50 प्रतिशत की वृद्धि करने की बात कही गई है।
नई दिल्ली में हुई कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में बोलते हुए रेवंत रेड्डी ने कहा कि ऐसा कदम दक्षिणी राज्यों के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदायक हो सकता है। सीडब्ल्यूसी की बैठक के बाद मीडियाकर्मियों के साथ एक अनौपचारिक बातचीत में रेवंत रेड्डी ने इस प्रस्ताव को दक्षिण भारत-विरोधी करार दिया और आगाह किया कि इससे गैर-दक्षिणी राज्यों को यह तय करने का मौका मिल सकता है कि केंद्र में सत्ता किसके हाथ में होगी, जिससे दक्षिणी राज्यों की भूमिका कमज़ोर पड़ जाएगी।
रेवंत रेड्डी ने कहा कि केंद्र से मिलने वाले अनुदान में कटौती के कारण दक्षिणी राज्य पहले से ही आर्थिक रूप से जूझ रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि परिसीमन का यह नया फ़ॉर्मूला राजनीतिक नुकसान भी पहुँचाएगा। उन्होंने आगाह करते हुए कहा कि परिसीमन का यह फ़ॉर्मूला भेदभावपूर्ण है। यह बड़े राज्यों के पक्ष में है और तेलंगाना जैसे छोटे राज्यों के खिल़ाफ है। इससे बड़े और छोटे राज्यों के बीच टकराव पैदा हो सकता है।
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सीट बढ़ोतरी को जीडीपी और अर्थव्यवस्था से जोड़ने का सुझाव
मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या में वृद्धि संबंधित राज्य की अर्थव्यवस्था और जीडीपी विकास दर के आधार पर की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी मांग की कि परिसीमन की प्रक्रिया मार्च 2027 में जनगणना 2027 का कार्य पूरा होने के बाद ही शुरू की जाए। रेवंत रेड्डी ने राय ज़ाहिर की कि सभी राज्यों में सीटों में एक समान 50 प्रतिशत की वृद्धि का यह प्रस्ताव भाजपा की एक साज़िश प्रतीत होता है, जिसका मकसद दक्षिणी राज्यों पर निर्भर हुए बिना केंद्र में सत्ता हासिल करना है, क्योंकि दक्षिणी राज्यों में भाजपा की ज़मीनी पकड़ कमज़ोर है।
रेवंत रेड्डी ने कहा कि इस प्रस्ताव से उत्तर और दक्षिण के बीच की खाई और गहरी होगी। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे उत्तरी राज्यों में पहले से ही लोकसभा सीटों की संख्या अधिक है और इस प्रस्ताव के लागू होने पर उन्हें दक्षिणी राज्यों की तुलना में कहीं ज़्यादा सीटें मिलेंगी। उन्होंने यह भी बताया कि लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 543 से बढ़कर 816 हो जाएगी और इसके साथ-साथ सभी राज्यों की विधानसभाओं में भी सीटों की संख्या में आनुपातिक वृद्धि होगी।
रेवंत रेड्डी ने बताया कि अभी 543 लोकसभा सीटों में से दक्षिणी राज्यों के पास स़िर्फ 130 सीटें हैं, जबकि गैर-दक्षिणी राज्यों के पास 413 सीटें हैं। 50 फ़ीसदी की बढ़ोतरी के साथ दक्षिणी राज्यों के पास 816 सीटों में से 195 सीटें होंगी, जबकि गैर-दक्षिणी राज्यों के पास 620 सीटें होंगी। उन्होंने कहा कि इस हालात में दक्षिणी राज्यों को कौन अहमियत देगा? 50 फ़ीसदी सीटों की बढ़ोतरी से दक्षिणी राज्य राजनीतिक तौर पर बेमानी हो जाएँगे।
लोकसभा सीट बढ़ाने पर संतुलन का फॉर्मूला जरूरी
इस असमानता को समझाते हुए उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में सीटें 80 से बढ़कर 120 हो जाएँगी, जबकि तमिलनाडु और पुडुचेरी की कुल सीटें स़िर्फ 40 से बढ़कर 60 होंगी, जिससे सीटों का अंतर 40 से बढ़कर 60 हो जाएगा। मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि अगर केंद्र सरकार लोकसभा सीटें बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ती है, तो उसे उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच मौजूदा संतुलन बनाए रखने के लिए एक फ़ॉर्मूला बनाना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि अगर सीटों का बँटवारा (परिसीमन) पूरी तरह से आबादी के आधार पर भी किया जाता है, तो भी दक्षिणी राज्यों को ही नुकसान होगा, क्योंकि उन्होंने केंद्र के निर्देशों के मुताबिक आबादी पर असरदार तरीके से काबू पाया है और अब उन्हें परिवार नियोजन के उपायों को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए सज़ा मिलेगी।
रेवंत रेड्डी ने पार्टी आलाकमान से अपील की कि वे संसद में समान विचारधारा वाली पार्टियों के साथ मिलकर प्रस्तावित परिसीमन मॉडल के ख़िल़ाफ एकजुट होकर लड़ाई लड़ें। मुख्यमंत्री ने कहा कि अगर दक्षिणी राज्य एकजुट होकर प्रस्तावित परिसीमन का सामूहिक विरोध करते हैं, तो मोदी सरकार को पीछे हटना पड़ेगा, ठीक वैसे ही जैसे किसानों के ज़ोरदार विरोध के बाद उसे विवादित कृषि क़ानूनों के मामले में पीछे हटना पड़ा था।
रेवंत रेड्डी ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार दक्षिणी राज्यों के साथ देश में दूसरे दर्जे के राज्यों जैसा बर्ताव कर रही है। उन्होंने दावा किया कि केंद्र ने 16 से 18 अप्रैल तक संसद का एक विशेष सत्र बुलाने की योजना बनाई है, ताकि 33 फ़ीसदी महिला आरक्षण बिल पास करके तमिलनाडु (जहाँ 23 अप्रैल को चुनाव होने हैं) और पश्चिम बंगाल (जहाँ 23 और 29 अप्रैल को वोटिंग होनी है) में चुनावों से पहले राजनीतिक फ़ायदा उठाया जा सके।
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