अराजकता का बंधक लोकतंत्र !
इस खबर पर किसी का भी चौंकना स्वाभाविक है कि पश्चिम बंगाल के मालदा में 1 अप्रैल, 2026 को अराजक भीड़ ने 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया। यह केवल स्थानीय कानून-व्यवस्था भर का मसला नहीं, भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ – न्यायपालिका और चुनाव प्रक्रिया- दोनों पर एक साथ किया गया अभूतपूर्व हमला है। कानून के शासन पर लगा गंभीर प्रश्नचिह्न है।
घटना का तात्कालिक कारण मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़ा बताया गया है। कथित रूप से नाम हटाए जाने से नाराज़ लोगों ने न्यायिक अधिकारियों को घेर लिया और लगभग 9-10 घंटे तक उन्हें बाहर नहीं निकलने दिया। यह तथ्य अपने आपमें भयावह है कि चुनाव प्रक्रिया की वैधानिक जिम्मेदारी निभा रहे न्यायिक अधिकारी – जिनमें महिलाएँ भी शामिल थीं – भीड़ के दबाव में बंधक बन गए।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह घटना चुनावी माहौल में हुई, जब प्रशासनिक सतर्कता अपने चरम पर होनी चाहिए। बल्कि इसके उलट, सुरक्षा व्यवस्था ध्वस्त होती दिखाई दी। यही कारण है कि देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इसे कानून-व्यवस्था के गंभीर संकट का संकेत माना और राज्य के शीर्ष अधिकारियों से जवाब तलब किया। इस घटना को केवल भीड़ की नाराज़गी कहकर टालना न तो उचित होगा, न ही न्यायसंगत।
असहमति का अधिकार, पर हिंसा संविधान के विरुद्ध
लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, परंतु न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालना, अधिकारियों को बंधक बनाना और हिंसात्मक दबाव बनाना – यह सब संविधान की आत्मा के प्रतिकूल है। यदि मतदाता सूची में त्रुटियाँ थीं, तो उनके समाधान के लिए वैधानिक अपील तंत्र पहले से मौजूद है। दरअसल, चुनाव आयोग ने इसी उद्देश्य से अपीलीय न्यायाधिकरण भी गठित किए हैं।इस पूरे प्रकरण का दूसरा आयाम राजनीतिक है।
चुनावी राज्य में इस प्रकार की घटना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का कारण बनी। एक ओर विपक्ष ने इसे राज्य सरकार की विफलता बताया, तो दूसरी ओर राज्य सरकार ने इसे साजिश करार दिया। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को चुनावी लाभ-हानि की तराजू पर तौलने लगे हैं? क्या यह स्वीकार्य है?तीसरा और सबसे गंभीर आयाम आंतरिक सुरक्षा का है।
भीड़ का न्यायिक अधिकारियों को घंटों तक बंधक बनाए रखने का साफ मतलब है कि स्थानीय प्रशासन या तो असमर्थ था या निष्क्रिय! यही कारण है कि चुनाव आयोग ने मामले की जाँच के लिए राष्ट्रीय स्तर की एजेंसियों को शामिल करने का निर्णय लिया है।। यह कदम बताता है कि मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि व्यापक सुरक्षा और संस्थागत विश्वसनीयता का भी है।
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न्यायिक अधिकारियों में भय का माहौल, निष्पक्षता पर
इस घटना के दूरगामी प्रभाव अत्यंत चिंताजनक हो सकते हैं। पहला, इससे न्यायिक अधिकारियों में भय का वातावरण पैदा होगा, जिससे वे निष्पक्ष निर्णय लेने में हिचक सकते हैं। दूसरा, यह संदेश जाएगा कि संगठित भीड़ दबाव बनाकर प्रशासनिक निर्णय बदलवा सकती है। तीसरा, इससे लोकतंत्र की आधारशिला अर्थात चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी आँच आएगी।पूछा जा सकता है कि समाधान क्या है।
तो सबसे पहले तो, न्यायिक और चुनावी अधिकारियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी – चाहे इसके लिए केंद्रीय बलों की स्थायी तैनाती क्यों न करनी पड़े। दूसरा, भीड़तंत्र के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति अपनानी होगी, जिसमें दोषियों की त्वरित पहचान और कठोर दंड सुनिश्चित हो। तीसरा, राजनीतिक दलों को भी आत्मसंयम दिखाना होगा और अपने समर्थकों को कानून के दायरे में रहने के लिए प्रेरित करना होगा।
अंततः मालदा की यह अराजक घटना एक चेतावनी है कि यदि अभी भी राज्य और केंद्र, दोनों स्तरों पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो लोकतंत्र की संस्थाएं भीड़ के दबाव में कमजोर पड़ सकती हैं। न्यायपालिका की गरिमा और चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता, दोनों की रक्षा करना केवल सरकार का नहीं, पूरे समाज का दायित्व है।
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